विश्वविख्यात हिमालय नाम का एक पर्वत है उसकी सुंदर चोटिया आकाश को चुनती हैं। अत्यधिक बर्फ से ढके हुए उसके शिखर इस प्रकार शोभायमान होते हैं मानो वह पर्वत अपने सिर पर कुंद के फूलों के मुकुट पहने हुए हो।
हिमालय पर्वत की हरी-भरी तलहटी तरह तरह के वृक्षों लताओं और त्रणों से शभायमान होकर बड़ी अच्छी लगती है। वहां तरह-तरह के पशु पक्षी मुक्त रूप से बिहार करते हैं और इधर उधर घूमते हुए सुंदर मीठी बोली बोलते हैं
उसी स्थान पर कपिलवस्तु नाम का एक जनपद था। और उसी नाम की उसकी राजधानी भी थी उस जनपद में शुद्धोधन नाम के राजा थे जो सचिवों की राय से शासन करते थे राजा शुद्धोधन के महामाया नाम की बड़ी रानी थी जो रूप शील और गुण रूपी मणियों की खान थी उस से छोटी प्रजापति दूसरी रानी थी जिसकी कंचन के समान काया शीला और सुगंधित थी अर्थात वह जितनी रूपवती थी उतनी ही शील वती थी ।
वे दोनों एक दूसरे की बहन लगती थी दोनों शील स्नेह से परिपूर्ण थी उसे मन वचन और कर्म से एक रूप थी केवल उनके शरीर अलग अलग थे।
जब बड़ी रानी गर्भवती हुई तब राजा को इतना हर्ष हुआ जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता उन्होंने राज पुरोहित को बुलवाकर विधिपूर्वक गर्भ मंगल संस्कार करवाया
राजा ने कुशल दसियों को रानी के चारों ओर लगा दिया उसे आंख की पुतली की तरह उसकी रखवाली करती थी उसके खाने-पीने सोने नहाने आदि की व्यवस्था करती थी तथा विधिपूर्वक उससे शमन दमन दान आदि शुभ कर्म करवा ती थी ।
वे दिन रात उसकी सेवा टहल कर दी थी उसे कोई परिश्रम का काम नहीं करने देती थी रानी भी सदैव निर्धारित नियमों का पालन करती थी उत्तम खानपान ही लेती थी ।
मन वचन और कर्म से धर्म में चित्र लगाए रहती थी सभी भोग विलास उसे विमुख होकर सभी दूषित मनोविकार ओं को जीतकर पुत्र की आशा लगाए हुए 9 महीने बीत गए अपने पहले प्रसव का समय नजदीक देखकर रानी कुछ भयभीत हो गई एक दिन वह हाथ जोड़कर राजा से विनम्र वचन बोली
हे स्वामी आपके चरणों की दासी पूर्वजों की पवित्र प्रथा का पालन करना चाहती है अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं पहले प्रसव के लिए अपने पीहर चली जाऊं।
रानी के प्रिय वचन सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए हृदय से हर्षित होकर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी दूसरे दिन प्रातः पालकी में चढ़कर उसके मन के उत्साह को बढ़ाते हुए राजा ने उसे विदा कर दिया।
प्रियतम के मुख्य को देख आंखों में आंसू भरकर रानी प्रेमा धीर हृदय से धाम में रह गई कुशल दा खऔर मुंह बोली सखियों भी अपनी-अपनी डोलियों में सर्जिकल रानी के साथ चली।
आवश्यक बर्तन कपड़े और खाने पीने की वस्तुओं लादकर अनेक गधे और खच्चर रवाना हुए अस्त्र शस्त्र से सजे हुए बहादुर योद्धा अपने गुणों को देखते हुए डोलियों के साथ साथ चलने लगे ।
कपिलवस्तु से प्रस्थान कर के वह टोली वन पर्वत और मैदानों को लगते हुए बड़ी तेजी से देवदह नगर की ओर बढ़ने लगी।
बीच में ही 1 साल बन पड़ता था जिसका नाम लुंबिनी था वह सारे संसार के मन को मोहने वाला था वृक्षों की शीतल छाया धरती पर फैली हुई थी जो ग्रीष्म काल के तक को हरण करके सुख देने वाली थी।
वहां पर पशु पक्षी घूमते थे और मीठी बोली बोलते थे वह चारों तरफ विचरण करते थे और क्रीड़ा करते थे फले फूले वृक्षों पर लताएं झूलती थी कुंजो में मतवाले भंवरे गुन जार करते थे
हवा के चकोरे वृक्षों को झगड़ते थे तो उनसे बरबस फल फूल और पत्ते झड़ते थे सालवन में शीतल छाया पाकर वह दल वहीं ठहर गया
जंगल की बहार देखकर रानी बहुत हर्षित हुई प्रसन्न मन से इधर-उधर घूमने लगी उसी समय हवा के झोंके से एक पेड़ की डाली नीचे की ओर झुकी सुकुमारी रानी ने उत्साह से उछलकर उस डाली को पकड़ लिया।
और उसी क्षण हवा के प्रकोप से वह डाली फिर से उठ गई वह भय के कारण उसे छोड़ न पाई और लाचार होकर ऊपर टांग गई उस डाली के साथ वह कभी नीचे और कभी ऊपर उठ जाती थी जमीन पर पैर नहीं टिका पाती थी भय बस डाली छोड़ भी नहीं पाती थी वह भयभीत नारी अत्यधिक घबरा रही थी
।
उसी समय उसके पेट में तेज प्रसव की पीड़ा होती जिससे वह बहुत व्याकुल हो गई तभी रानी के हाथ से डाली टूट गई और वह पछाड़ खाकर जमीन पर गिर पड़ी
उसकी चीख सुनते ही हाय दौड़ पड़ी इधर उधर से गहरा बनाते हुए बहुत सी राशियां भी आ गई रानी प्रसव पीड़ा से व्याकुल हो गई उसी समय पवित्र प्रसव हुआ
उसका शरीर लाल और गोरा था मानव शहद में आया हुआ हो बालक पैदा होते ही कहां कहां कह कर रोने लगा वह बैसाख माह की पूर्णमासी थी जब विश्व को प्रकाशित करने वाला वह बालक पैदा हुआ ईसा पूर्व 563 में उस सुंदर बालक ने बड़े सुंदर समय में जन्म लिया उसे देखकर रानी की सखियों को बड़ा सुख प्राप्त हुआ नाल काटने के बाद कुशल दाइयां कुमार को सख्त जल्द से नहलाने लगी
उस समय सभी राज्य सज्जा अनुकूल थी जंगल के बीच मंगल हो गया था तरुवर पुष्प वर्षा कर रहे थे और पक्षी मंगल गीत गा रहे थे
तो साथियों आपने पढ़ी भगवान बुद्ध के जन्म की कथा जो बुद्धचरित चंद्रोदय से ली गई है और इस कथा को मैंने अपने बुद्ध धर्म को चाहने वालों के लिए लिखकर प्रकाशित की है
और आगे भी बहुत सारी कहानियां आप लोग प्राप्त कर सकते हैं तो अवश्य बताएं यह कहानी आपको कैसी लगी साथियों नमो बुद्धाय जय सम्राट अशोक जय भारत
मैं शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम नमो बुद्धाय खदियानगल कुशवाहा पोस्ट भटनी थाना पाली तहसील सवाजपुर जिला हरदोई से हूं मेरा कांटेक्ट नंबर है 91 98 97 9617
हिमालय पर्वत की हरी-भरी तलहटी तरह तरह के वृक्षों लताओं और त्रणों से शभायमान होकर बड़ी अच्छी लगती है। वहां तरह-तरह के पशु पक्षी मुक्त रूप से बिहार करते हैं और इधर उधर घूमते हुए सुंदर मीठी बोली बोलते हैं
उसी स्थान पर कपिलवस्तु नाम का एक जनपद था। और उसी नाम की उसकी राजधानी भी थी उस जनपद में शुद्धोधन नाम के राजा थे जो सचिवों की राय से शासन करते थे राजा शुद्धोधन के महामाया नाम की बड़ी रानी थी जो रूप शील और गुण रूपी मणियों की खान थी उस से छोटी प्रजापति दूसरी रानी थी जिसकी कंचन के समान काया शीला और सुगंधित थी अर्थात वह जितनी रूपवती थी उतनी ही शील वती थी ।
वे दोनों एक दूसरे की बहन लगती थी दोनों शील स्नेह से परिपूर्ण थी उसे मन वचन और कर्म से एक रूप थी केवल उनके शरीर अलग अलग थे।
जब बड़ी रानी गर्भवती हुई तब राजा को इतना हर्ष हुआ जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता उन्होंने राज पुरोहित को बुलवाकर विधिपूर्वक गर्भ मंगल संस्कार करवाया
राजा ने कुशल दसियों को रानी के चारों ओर लगा दिया उसे आंख की पुतली की तरह उसकी रखवाली करती थी उसके खाने-पीने सोने नहाने आदि की व्यवस्था करती थी तथा विधिपूर्वक उससे शमन दमन दान आदि शुभ कर्म करवा ती थी ।
वे दिन रात उसकी सेवा टहल कर दी थी उसे कोई परिश्रम का काम नहीं करने देती थी रानी भी सदैव निर्धारित नियमों का पालन करती थी उत्तम खानपान ही लेती थी ।
मन वचन और कर्म से धर्म में चित्र लगाए रहती थी सभी भोग विलास उसे विमुख होकर सभी दूषित मनोविकार ओं को जीतकर पुत्र की आशा लगाए हुए 9 महीने बीत गए अपने पहले प्रसव का समय नजदीक देखकर रानी कुछ भयभीत हो गई एक दिन वह हाथ जोड़कर राजा से विनम्र वचन बोली
हे स्वामी आपके चरणों की दासी पूर्वजों की पवित्र प्रथा का पालन करना चाहती है अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं पहले प्रसव के लिए अपने पीहर चली जाऊं।
रानी के प्रिय वचन सुनकर राजा बहुत प्रसन्न हुए हृदय से हर्षित होकर उन्होंने जाने की अनुमति दे दी दूसरे दिन प्रातः पालकी में चढ़कर उसके मन के उत्साह को बढ़ाते हुए राजा ने उसे विदा कर दिया।
प्रियतम के मुख्य को देख आंखों में आंसू भरकर रानी प्रेमा धीर हृदय से धाम में रह गई कुशल दा खऔर मुंह बोली सखियों भी अपनी-अपनी डोलियों में सर्जिकल रानी के साथ चली।
आवश्यक बर्तन कपड़े और खाने पीने की वस्तुओं लादकर अनेक गधे और खच्चर रवाना हुए अस्त्र शस्त्र से सजे हुए बहादुर योद्धा अपने गुणों को देखते हुए डोलियों के साथ साथ चलने लगे ।
कपिलवस्तु से प्रस्थान कर के वह टोली वन पर्वत और मैदानों को लगते हुए बड़ी तेजी से देवदह नगर की ओर बढ़ने लगी।
बीच में ही 1 साल बन पड़ता था जिसका नाम लुंबिनी था वह सारे संसार के मन को मोहने वाला था वृक्षों की शीतल छाया धरती पर फैली हुई थी जो ग्रीष्म काल के तक को हरण करके सुख देने वाली थी।
वहां पर पशु पक्षी घूमते थे और मीठी बोली बोलते थे वह चारों तरफ विचरण करते थे और क्रीड़ा करते थे फले फूले वृक्षों पर लताएं झूलती थी कुंजो में मतवाले भंवरे गुन जार करते थे
हवा के चकोरे वृक्षों को झगड़ते थे तो उनसे बरबस फल फूल और पत्ते झड़ते थे सालवन में शीतल छाया पाकर वह दल वहीं ठहर गया
जंगल की बहार देखकर रानी बहुत हर्षित हुई प्रसन्न मन से इधर-उधर घूमने लगी उसी समय हवा के झोंके से एक पेड़ की डाली नीचे की ओर झुकी सुकुमारी रानी ने उत्साह से उछलकर उस डाली को पकड़ लिया।
और उसी क्षण हवा के प्रकोप से वह डाली फिर से उठ गई वह भय के कारण उसे छोड़ न पाई और लाचार होकर ऊपर टांग गई उस डाली के साथ वह कभी नीचे और कभी ऊपर उठ जाती थी जमीन पर पैर नहीं टिका पाती थी भय बस डाली छोड़ भी नहीं पाती थी वह भयभीत नारी अत्यधिक घबरा रही थी
।
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उसका शरीर लाल और गोरा था मानव शहद में आया हुआ हो बालक पैदा होते ही कहां कहां कह कर रोने लगा वह बैसाख माह की पूर्णमासी थी जब विश्व को प्रकाशित करने वाला वह बालक पैदा हुआ ईसा पूर्व 563 में उस सुंदर बालक ने बड़े सुंदर समय में जन्म लिया उसे देखकर रानी की सखियों को बड़ा सुख प्राप्त हुआ नाल काटने के बाद कुशल दाइयां कुमार को सख्त जल्द से नहलाने लगी
उस समय सभी राज्य सज्जा अनुकूल थी जंगल के बीच मंगल हो गया था तरुवर पुष्प वर्षा कर रहे थे और पक्षी मंगल गीत गा रहे थे
तो साथियों आपने पढ़ी भगवान बुद्ध के जन्म की कथा जो बुद्धचरित चंद्रोदय से ली गई है और इस कथा को मैंने अपने बुद्ध धर्म को चाहने वालों के लिए लिखकर प्रकाशित की है
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मैं शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम नमो बुद्धाय खदियानगल कुशवाहा पोस्ट भटनी थाना पाली तहसील सवाजपुर जिला हरदोई से हूं मेरा कांटेक्ट नंबर है 91 98 97 9617