बुधवार, 29 जनवरी 2020

जय सच्चिदानंद इंटर कॉलेज दलेलपुर भरखनी पाली हरदोई


जय सच्चिदानंद इंटर कॉलेज दलेलपुर भरखनी




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Occasionally, some of your visitors m[27/1, 8:11 PM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: नीले - नीले आसमान में, देखो सूरज दमक रहा है। 

हीरे और सोने के जैसा , चम चम चम चम चमक रहा है।

बोले बिट्टू राजा हठ कर, मम्मी मुझको नहला दो। 

कोई क्रीम लगाकर मुझको , सूरज जैसा चमका दो। 

मम्मी बोली ओ के बेटा, बात सुनो पहले मेरी । 

पढ़ो लिखो जी जान लगाकर, तो होगी इच्छा पूरी। 

बिट्टू बोले झूठ बोलकर, मुझे न माँ यूँ बहलाओ। 

पढ़ - लिख कर कैसे चमकूंगा, सही - सही तुम समझाओ। 

मम्मी लाई दूध ग्लास में, बोलीं बेटा लो पी लो। 

सभी बात को बे मतलब का, तुम इतना भी मत छीलो। 

बिट्टू राजा समझ-बूझ कर, खुद करने लगे पढ़ाई। 

सारे जग में फिर उनकी भी, लोगों ने किया बड़ाई। 

मम्मी उनको गले लगाकर, बोली तू ही सूरज है। 

मेहनत का फल होता मीठा, यह नहीं झूठ अचरज है। 
[28/1, 8:07 PM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: 🌳🌳🌳🌳🌳




जरूर देखें 


🌳🌳🌳🌳
👉🏻 नेक सलाह 🌳

👉🏻जिसे देवी देवताओं और जिन, बुरी आत्मा, ग्रहों, भूत, प्रेतों से डर लगता है 👉🏻अपने- अपने 🏡 घरों में तथागत गौतमबुद्ध और  विश्व विजेता सम्राटो के सम्राट अशोक महान सिंबल या फोटो ,  लगायें और मुक्ति पायें।
🕺🏻
🤔 पुर्फ के तौर पर हम आपको एक बात बताना चाहते हैं आपको शायद मालूम भी हो और सुना भी होगा पुलिस  के पास अशोक का सिंबल लगा होता है बेल्ट और कंधे पर
🌳 इनकी ड्यूटी कब्रस्तान नदी नाला जंगलों जहां भूत-प्रेत इत्यादि होते हैं वहां भी पुलिस वालों की ड्यूटी लगा दी जाती है इनकी रक्षा कौन करता है शायद आपको न मालूम हो तो हम बता देते हैं इनके पास 
⚔विश्व विजेता सम्राटों के सम्राट अशोक महान⚔ 
का सिंबल बेल्ट और कंधे पर और कैप में लगा होता है  अशोक सिब्बल के भरोसे यह हर जगह चले जाते हैं किसी  शैतान इत्यादि के दम नहीं होती कि इन से बोल दे 
😇जब हम अपने घर हो या अपने पास में रखेंगे तो हमारे यहां भी बुरी से बुरी आत्मा गंदी चीजों का वास नहीं होगा
👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻👎🏻
🌳⚔विश्व विजेता सम्राट अशोक सम्राट अशोक महान सदैव हमारी रक्षा करें⚔🌳
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मंगलवार, 21 जनवरी 2020

त्रेता युग की सच्चाई

अंधविश्वास ने भारत का सत्यानाश कर दिया।।

नल-नील ने पत्थर पर राम-नाम लिखा और समुद्र में तैरा दिया ….

तो जब हनुमान अपना शरीर इतना बड़ा कर सकता था कि वह पृथ्वी से 110 गुने बड़े सूर्य को फल समझकर निगल गया था तो राम का नाम लिखकर पत्थर पर तैराने की आवश्यकता इतनी मेहनत करने की जरूरत क्या थी ????..

और फिर राम हुये त्रेता युग में यानि त्रेता युग आज से कितने वर्ष पहले था ये देखें पहले आप कि कलियुग के 4320000 वर्ष होते हैं और द्वापर के 4320000×2=8640000वर्ष

और त्रेता के 4320000 x3=12960000 वर्ष

अब अगर त्रेता के मध्य में भी राम हुये थे तो इसका आधा

यानि 6480000 वर्ष +8640000 +कलि के कृष्ण की मृत्युके समय कलि शुरू माना गया है तो भी लगभग 5500 वर्ष मानते हैं ।

तो राम कुल आज से लगभग 15125500 वर्ष पूर्व हुये थे यानि डेढ़ करोड़ वर्ष से भी ज्यादा पहले ये राम और वानर सेना थी।

तो भाई मनुष्य जाति का विकास हुआ 1 लाख वर्ष पूर्व और उन्हें उस समय लिखना पढ़ना नहीं आता था और मनुष्य ने खेती आदि पशुपालन सीखा लगभग 10 हज़ार साल पहले।

तो नल-नील जो काल्पनिक बन्दर हैं इन्होंने कौन सी लिपि और कौन सी भाषा में राम लिखा था क्योंकि बुद्ध के काल तक भी वेद आदि सभी शास्त्र चार्वाक आदि भी अपने शिष्यों को गुरु शिष्य परम्परा से श्रुति मिति यानि बोलकर और रटकर ही सीखते सिखाते थे। उस समय कोई लिपि का विकास नहीं हुआ था एवं यह जो आज की वर्णमाला के ———-

अं

अः

क, ख ,ग ,घ ,ड़

च ,छ ,ज,झ,ञ

ट ,ठ ,ड ,ढ़, ण

त ,थ, द ,ध ,न

प,फ,ब, भ,म

य, र ,ल,व ,स,श,ष, क्ष ,ह

आदि लिखने का तरीका है ये तो मात्र 500 से 800 वर्ष पुराना ही है इससे पहले ये अक्षर अलग प्रकार से लिखे जाते थे और भाषा भी बहुत बदल गयी तब से लेकर आज तक और नित्य प्रति दिन बदल रही है ।

तो इतने साल पहले तो डायनासौर थे डेढ़ करोड़ साल पहले कोई स्तनधारी जीव भी नहीं था विकसित रूप में जो भी स्तनधारी जीव थे धरती पर वे बिलों में रहते थे, तब एक बहुत बड़े उल्का पिण्ड के पृथ्वी से टकराने पर प्रलय हुई जिससे सारे बड़े जीव जो पृथ्वी पर थे जल में थे वे डायनासोर की प्रजातियां नष्ट हो गयी और बाद में धीरे-धीरे विकास के फलस्वरूप बचे हुए नन्हे स्तनधारी वर्ग के जीवों को फलने-फूलने का मौक़ा मिला, तो इसी कारण किसी पाखण्ड शास्त्र में डायनासोर का नाम नहीं और बातें गप्पे भर दिये पण्डा ने क्योंकि वे हीन बुध्दि प्राणी सोचते रहे कि दुनिया में कोई बात खोज नहीं सकेगा, बस वे जो भी बकवास करंगे उसे लोकोक्ति के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी लोग मानते रहेंगे और आज राम का नाम लेकर नित नया अंधविश्वास फैलाते हैं सबसे बड़ी बात जो लोग बेचारे साइंस और जीव विज्ञान की खोजों को यथारूप नहीं जानते वे माने तो माने यहां तो लुळ पढ़े लिखे भी ऐसी बकवास को धारण करते और प्रचारित करते दीख पड़ते हैं ।

सोमवार, 20 जनवरी 2020

क्या आत्मा परमात्मा होता है

जरूर पढ़ें

*तथागत बुद्ध से ज्ञान पाने या ज्ञान का मुकाबला करने की नियत से बहुत से ब्राह्मण विद्वान आते रहते थे| ऐसे ही एक ब्राह्मण/पंडित का तथागत बुद्ध से निम्न वार्तालाप “धम्म” के परिचय के लिए पढ़ना बहुत उपयोगी होगा।*

एक बार तथागत से एक ब्राह्मण ने पूछा

ब्राह्मण:– “आप सब लोगो को ये बताते है कि आत्मा नहीं, स्वर्ग नहीं, पुनर्जन्म नहीं। क्या यह सत्य है?”

तथागत :- – “आपको ये किसने बताया कि मैंने ऐसा कहा?”

ब्राह्मण:-– “नहीं ऐसा किसी ने बताया नहीं।”

तथागत :- — “फिर मैंने ऐसे कहा ये बताने वाले व्यक्ति को आप जानते हो??

ब्राह्मण:- – “नहीं।”

तथागत : — “मुझे ऐसा कहते हुए आपने कभी सुना है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत,

पर लोगो की चर्चा सुनके ऐसा लगा। अगर ऐसा नहीं है तो आप क्या कहते है?”

तथागत :— “मैं कहता हूँ कि मनुष्य को वास्तविक सत्य स्वीकारना चाहिए।”

ब्राह्मण:- – “मैं समझा नहीं तथागत, कृपया सरलता में बताइये।”

तथागत : – — “मनुष्य की पांच बाह्य ज्ञानेंद्रिय है। जिसकी मदद से वह सत्य को समझ सकता है।”

1)आँखे- मनुष्य आँखों से देखता है।

2)कान- मनुष्य कानो से सुनता है।

3)नाक- मनुष्य नाक से श्वास लेता है।

4)जिव्हा- मनुष्य जिव्हा से स्वाद लेता है।

5)त्वचा- मनुष्य त्वचा से स्पर्श महसूस करता है।

इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से दो या तीन ज्ञानेन्द्रियों की मदद से मनुष्य सत्य जान सकता है।

ब्राह्मण:– “कैसे तथागत?”

तथागत :— “आँखों से पानी देख सकते है, पर वह ठण्डा है या गर्म है, ये जानने के लिए त्वचा की मदद लेनी पड़ती है, वह मीठा है या नमकीन ये जानने के लिए जिव्हा की मदद लेनी पड़ती है।

ब्राह्मण:– “फिर भगवान है या नहीं इस सत्य को कैसे जानेंगे तथागत?”

तथागत : — “आप वायु को देख सकते है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत।”

तथागत : – “इसका मतलब वायु नहीं है ऐसा होता है क्या?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “वायु दिखती नहीं फिर भी हम उसका अस्तित्व नकार नहीं सकते, क्योंकि हम वायु को ही साँस के द्वारा अंदर लेते है और बाहर निकालते है। जब वायु का झोंका आता है तब पेड़-पत्ते हिलते है, ये हम देखते है और महसूस करते है। अब आप बताओ भगवान हमें पांच ज्ञानेन्द्रियों से महसूस होता है?

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत:– “आपके माता पिता ने देखा है, या ऐसा उन्होंने आपको बताया है?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “फिर परिवार के किसी पुर्वज ने देखा है, ऐसा आपने सुना है?”

ब्राह्मण:– “नहीं तथागत।”

तथागत :– “मैं यही कहता हूँ कि जिसे आज तक किसी ने देखा नहीं, जिसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जान नहीं सकते, वह सत्य नहीं है इसलिए उसके बारे में सोचना व्यर्थ है।”

ब्राह्मण:– “वह ठीक है तथागत, पर हम जिन्दा है, इसका मतलब हमारे अंदर आत्मा है, ये आप मानते है या नहीं?”

तथागत :– “मुझे बताइये, मनुष्य मरता है, मतलब तब क्या होता है?”

ब्राह्मण:– “आत्मा शरीर के बाहर निकल जाती है, तब मनुष्य मर जाता है।”

तथागत :- – “मतलब आत्मा नहीं मरती है?”

ब्राह्मण:- – “नहीं तथागत, आत्मा अमर है।”

तथागत :– “आप कहते है कि आत्मा कभी मरती नहीं, आत्मा अमर है, तो ये बताइये आत्मा शरीर छोड़ती है या शरीर आत्मा को??”

ब्राह्मण:– “आत्मा शरीर को छोड़ती है तथागत।”

तथागत :– “आत्मा शरीर क्यों छोड़ती है?”

ब्राह्मण:– “जीवन ख़त्म होने के बाद छोड़ती है।”

तथागत :- – “अगर ऐसा है तो मनुष्य कभी मरना नहीं चाहिए। दुर्घटना, बीमारी, घाव लगने के बाद भी बिना उपचार के जीना चाहिए। बिना आत्मा की मर्ज़ी के मनुष्य नहीं मर सकता।”

ब्राह्मण:– “आप सही कह रहे है तथागत। पर मनुष्य में प्राण है, उसे आप क्या कहेंगे?”

तथागत : – “आप दीपक जलाते है?”

ब्राह्मण:- – “हाँ तथागत।”

तथागत :– “दीपक याने एक छोटा दिया, उसमे तेल, तेल में बाती और उसे जलाने के लिए अग्नि चाहिए, बराबर?”

ब्राह्मण:– “हाँ तथागत।”

तथागत :- – “फिर मुझे बताइये बाती कब बुझती है?”

ब्राह्मण:- – “तेल ख़त्म होने के बाद दीपक बुझ़ता है तथागत।”

तथागत :– “और?”

ब्राह्मण:– “तेल है पर बाती ख़त्म हो जाती है तब दीपक बुझता है तथागत।”

तथागत : – “इसके साथ तेज वायु के प्रवाह से, बाती पर पानी डालने से, या दिया टूट जाने पर भी दीपक बुझ सकता है।अब मनुष्य शरीर भी एक दीपक समझ लेते है, और प्राण मतलब अग्नि यानि ऊर्जा। सजीवों की देह अनंत उर्जा के तत्वों से बना है।

इसमें से एक भी पदार्थ अलग कर देंगे ऊर्जा और ताप का निर्माण होना रुक जायेगा,मनुष्य निष्क्रिय हो जायेगा। इसे ही मनुष्य की *मृत्यु* कहा जाता है।इसलिये आत्मा भी भगवान की तरह *अस्तित्वहीन* है। यह सब चर्चा व्यर्थ है। इससे ‘धम्म’ का समय व्यर्थ हो जाता है।”

ब्राह्मण:– “जी तथागत, फिर ‘धम्म’ क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?”

तथागत :- – “धम्म’ का मतलब अँधेरे से प्रकाश की और ले जाने वाला *मार्ग* है।

“धम्म’ का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीवन जीना है इसका मार्गदर्शन करना है।

जीवन के सूत्रों को समझना और उनके उपयोग से जीवन से दुःख दूर करने का मार्ग है “धम्म”!

प्रकृति के नियमों की समझ और उसके हिसाब से जीवन के दुखों का समाधान का मार्ग है ”धम्म”, प्रकृति की पूजा “धम्म” नहीं है।

“धम्म” जिज्ञासाओं को काल्पनिक धार्मिक कहानियों द्वारा मारना नहीं, धम्म जानने का, खोजने का नाम है। यह विज्ञान है|

धम्म का आधार अनुभव है आस्था या अंधभक्ति नहीं, धम्म जानने के बाद मानने में है, आस्था में नहीं|

धम्म मानव को मानव और जीवों का सहारा बनाने में है, धम्म अपना सहारा खुद बनने में है, न ही किसी देवकृपा के इंतज़ार में बैठे रहने में है|

दुःख दो प्रकार के होते हैं एक प्राकृतिक दूसरा मानव निर्मित,प्राकृतिक दुःख का इलाज तो आपके तथाकथित ईश्वर के पास भी नहीं वो भी रोकने में असमर्थ है तो फिर ईश्वर भक्ति क्यों?

धम्म मानव निर्मित दुखों का समाधान है। क्योंकि हमारे जीवन में प्राकृतिक दुःख एक तालाब के सामान हैं पर मानव निर्मित दुःख समुन्द्र के समान है| मतलब दुखों का सबसे बड़ा हिस्सा मानव निर्मित है, जैसे सामाजिक असमता, गुलामी, रोग, मैत्री का अभाव आदि!

“धम्म” समता, स्वतंत्रता, करुणा, न्याय और मैत्री का भाव जगाता है !

धम्म का प्रथम सूत्र है:- हर चीज़ से बड़ा है न्याय, तथाकथित ईश्वर से भी बड़ा, न्याय व्यस्था ही धम्म है| क्या गुलामी और शोषण के बदले आप ईश्वर लेना चाहोगे?

*जन्म से मृत्यु के बीच सभी जीवों का जीवन सुखमय बनाना ही धम्म का अंतिम लक्ष्य है|*

*ब्राह्मण*:- मैं धन्य हुआ आपने मेरी आँखे खोल दीं, आपसे बात करके मेरा धार्मिक ज्ञान का, श्रेष्ठता का अहंकार जाने कहाँ गायब हो गया, बड़ा मुक्त और हल्का महसूस कर रहा हूँ, अपना पराया का भ्रम दूर हुआ, सब अपने से लगने लगे| आपसे ज्ञान पाकर मेरा जीवन धन्य हुआ तथागत !

सोमवार, 13 जनवरी 2020

ग्राम भरखनी के प्रधान पति महेश शर्मा

ग्राम सभा भरखनी के मजरा खदिया नगला मे स्कूल की पड़ी हुई जमीन पर प्रधान पति महेश शर्मा ने अवैध तरीके से कब्जा करवा दिया है ।

पड़ी हुई जमीनमें एक हैंडपंम्प लगा हुआ है

उसे जमीन के ऊपर मिट्टी डलवा करके उस हैंडपंप को अंदर ही बंद करवा दिया जिसकी प्रमाण स्वरूप फोटो आप लोग देख रहे हैं ।

इस हैंड पाइप के माध्यम से पूरे मोहल्ले में लोग अपने अपने पशुओं को पानी पिलाते थे नहलाते थे ।

और स्वयं उसका उपयोग करते थे ।

ऐसा होने पर अब पूरे मोहल्ले के लोगों को बहुत बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है ।

रविवार, 12 जनवरी 2020

होलिका दहन की सत्य कथा सच्चाई क्या है




होलिका दहन की सत्य कथा

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लगभग ईसा से 3100 साल पहले इडिया में यूरेशिया की एक खूंखार जाति जिसको आर्य कहा जाता था का आगमन हुआ था। यूरेशिया, यूरोप और एशिया के बीच की जगह का नाम है और आज भी यह स्थान काला सागर के पास मौजूद है। इस बात के आज बहुत से प्रमाण भी मौजूद है। ज्यादा जानकारी के लिए आप लोग हमारा लिखा लेख “DNA REPORT 2001” पढ़ सकते है। यह आर्य लोग इडिया में क्यों आये यह बात आज तक रहस्य ही है। बहुत से इतिहासकारों ने इस विषय पर बहुत सी बाते और कहानियाँ लिखी है लेकिन किसी भी कहानी का कोई वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं है। भीम संघ की टीम ने अपने शोधों में पाया है कि आर्य लोग अपनी खुशी से या इंडिया को लूटने के लिए में नहीं आये थे। असल में आर्य एक बहुत ही खूंखार जाति थी। जिसके कारण यूरेशिया के लोगों का जीवन खतरे में आ गया था और हर तरफ अराजकता का माहौल बन गया था। आर्य लोग यूरेशिया के लोगों को हर समय लूटते और मारते रहते थे। जिस से तंग आ कर वहाँ के राजा ने सारे आर्यों को इक्कठा करके एक बड़ी सी नाव में बिठा कर मरने के लिए समुद्र में छोड़ दिया था। यह लोग अपने साथ अपनी औरतों और बच्चों को नहीं लाये थे। औरतों और बच्चों का ना लाना भी आर्यों के देश निकले से सम्बन्ध में एक पुख्ता प्रमाण है। पुराने समय में जब पुरुष को देश निकला दिया जाता था तो बच्चों और औरतों को उसके साथ नहीं भेजा जाता था। यह बाते हिंदू धर्म ग्रंथों और यूरेशिया के लोगों में प्रचलित कहानियों के आधार पर भी सही है। आर्य लोग यूरेशिया के रहने वाले है इस बात के बहुत से प्रमाण है जैसे आर्य लोगों की भाषा का रूस की भाषा से मिलना, ज्योतिष शास्त्र, वास्तु, तंत्र शास्त्र, और मन्त्र शास्त्र जो की वास्तव में मेसोपोटामिया सभ्यता की देन है और DNA पर किये गए शोध आदि। यह सभी वैज्ञानिक प्रमाण है ना की कोई काल्पनिक प्रमाण है। इंडिया के लोगों के DNA पर कुल दो शोध हुए है। जिस में से एक शोध माइकल बामशाद ने लिखा था जिसको सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने भी मान्यता दी थी, जबकि दूसरा शोध राजीव दीक्षित नाम के एक ब्राह्मण ने स्वयं किया था। दोनों शोधों में पाया गया था कि ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रिय यूरेशिया मूल के लोग है। अगर धर्म शास्त्रों को आधार मान लिया जाये तो इस से यह बात भी साफ़ हो जाती है कि यह आर्य लोग समुद्र में भटकते हुए दक्षिण इंडिया के समुद्र तट पर पहुंचे थे। ऋग्वेद, भागवत पुराण, दुर्गा सप्तसती के अनुशार पानी से सृष्टि की उत्पति के सिद्धांत से भी इस बात का पता चल जाता है कि आर्य लोग इंडिया में समुद्र के रास्ते आये थे। अर्थात आर्यों को पानी के बीच में धरती दिखाई दी थी या मिली थी। इसीलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में कहा जाता है कि धरती की उत्पति पानी से हुई है।

उस समय इंडिया के मूलनिवासी बहुत ही भोले भाले और सभ्य होते थे। इंडिया में सिंधु घाटी की सभ्यता स्थापित थी। जो उस समय संसार की सबसे उन्नत सभ्यताओं में से एक थी। इंडिया के मूलनिवासी देखने में सांवले और ऊँची कद काठी के और मजबूत शारीर के होते थे। इसके विपरीत आर्य लोग यूरेशिया से आये थे जो एक ठंडा देश है। और वहाँ के लोगों को कम मात्र में सूर्य की रोशनी मिलने से वहाँ के लोग साफ़ रंग के होते थे। यह बात वैज्ञानिक भी प्रमाणित कर चुके है कि ठन्डे प्रदेश के लोगों की चमड़ी का रंग साफ़ होता है। इसी चमड़ी के रंग का फायदा उठा कर आर्यों ने खुद को देव घोषित किया। समय के साथ आर्यों ने देश में अपनी सता स्थापित करने के लिए प्रयास शुरू किये। आर्य लोगों ने इंडिया की सभ्यता को नष्ट करना शुरू करके अपनी सभ्यता स्थापित करने के लिए हर तरह से पूरी कोशिश की। आर्य लोग छल, कपट, प्रपंच और धोखा देने में प्रवीण थे। जिसके कारण बहुत से मूलनिवासी उनकी बातों में फंस जाते। आर्यों ने इंडिया की नारी को अपना सबसे पहला निशाना बनाया, आर्य लोग आधी रात को हमला करते थे और धन धान्य के साथ साथ मूलनिवासी लोगों की बहु बेटियों को भी अपने साथ ले जाते थे। बाद में ब्राह्मणों ने बहुत सी प्रथाओं को लागू करवाया। समय के अनुसार प्रथाएं परम्पराओं में परिवर्तित हुई और आज भी इंडिया की नारी उन्ही प्रथाओं के कारण शोषण का शिकार हो रही है।

इंडिया के मूलनिवासी राजा आर्यों के यज्ञ, बलि और तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों के खिलाफ थे। क्योकि इन अनुष्ठानों से पशु धन, अनाज और दूसरे प्रकार के धन की हानि होती थी। जबकि धार्मिक अनुष्ठानों की आड़ में आर्य लोग अयाशी करते थे। ऋग्वेद को पढ़ने पर पता चलता है कि आर्य लोग धर्म के नाम पर कितने निकृष्ट कार्य करते थे। अनुष्ठानों में सोमरस नामक शराब का पान किया जाता था, गाये, बैल, अश्व, बकरी, भेड़ आदि जानवरों को मार कर उनका मांस खाया जाता था। पुत्रेष्टि यज्ञ, अश्वमेघ यज्ञ, राजसु यज्ञ के नाम पर सरेआम खुल्म खुला सम्भोग किया जाता था या करवाया जाता था। इन प्रथाओं, जो आज परम्परायें बन गई है के बारे ज्यादा जानकारी चाहिए तो आप लोग ऋग्वेद का दशवा मंडल, अथर्ववेद, सामवेद, देवी भागवत पुराण, वराह पुराण, आदि धर्म ग्रन्थ पढ़ सकते है।

एक समय आर्यों ने इंडिया के एक शक्तिशाली राजा हिरण्यकश्यप के राज्य पर हमला किया और वहाँ अपना राज्य और अपनी सभ्यता को स्थापित करने की कोशिश की तो राजा हिरण्यकश्यप ने भी आर्यों की अमानवीय संस्कृति का विरोध किया। राजा हिरण्यकश्यप जो की एक नागवंशी राजा था ने नागवंश के धर्म के मुताबिक़ आर्यों को अधर्मी और कुकर्मी करार दिया तथा आर्यों के धर्म को मानने से इंकार कर दिया। आर्यों ने हर संभव प्रयत्न करके देखा लेकिन उनको सफलता नहीं मिल पाई। यहाँ तक आर्यों के राजाओं ब्रह्मा और विष्णु सहित उनके सेनापति इन्द्र को कई बार राजा हिरण्यकश्यप ने बहुत बुरी तरह हराया। राजा हिरण्यकश्यप इतना पराक्रमी था कि उन्होंने इन्द्र की तथाकथित देवताओं की राजधानी अमरावती को भी अपने कब्जे में कर लिया। जब आर्यों का राजा हिरण्यकश्यप पर कोई बस नहीं चला तो अंत में आर्यों ने एक षड्यंत्रकारी योजना के तहत विष्णु ने राजा हिरण्यकश्यप को मौत के घाट उतार दिया। लेकिन आर्यों को हिरण्यकश्यप की मृत्यु का कोई फायदा नहीं हुआ क्योकि हिरण्यकश्यप की प्रजा ने आर्यों के शासन मानने से इंकार कर दिया और हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष को राजा स्वीकार कर लिया। आर्यों का षड़यंत्र असफल हो गया था। राजा हिरण्याक्ष भी बहुत शक्तिशाली योद्धा था जिसका सामना युद्ध भूमि में कोई भी आर्य नहीं कर पाया। राजा हिरण्याक्ष के डर से आर्य भाग खड़े हुए। यहाँ तक देवताओं की तथाकथित राजधानी अमरावती को हिरण्याक्ष ने पूरी तरह बर्बाद कर दिया। हिरण्याक्ष के पराक्रम से डरे हुए आर्यों ने एक बार फिर राजा हिरण्याक्ष को मारने के लिए एक षड्यंत्र रचा। षड्यंत्र को अंजाम देने के लिए हिरण्याक्ष की पत्नी रानी कियादु को मोहरा बनाया गया। विष्णु नाम के आर्य ने रानी कियादु को पहले अपने प्रेम जाल में फंसाया और उसके बाद रानी कियादु को अपने बच्चे की माँ बनने पर विवश किया। विष्णु कई बार हिरण्याक्ष की अनुपस्थिति में रानी के पास भेष बदल बदल कर आता रहता था।

हिरण्याक्ष राज्य के कार्यों में व्यस्त रहता था, जिसके चलते विष्णु और कियादु के प्रेम के बारे राजा हिरण्याक्ष को पता नहीं चला। समय के साथ रानी कियादु ने एक बच्चे को जन्म दिया और बच्चे का नाम प्रहलाद रखा गया। राजा हिरण्याक्ष राज्य के कार्यों में व्यस्त रहते थे इस का पूरा फायदा विष्णु ने उठाया और बचपन से ही प्रहलाद को आर्य संस्कृति की शिक्षा देनी शुरू कर दी। जिसके कारण प्रहलाद ने नागवंशी धर्म को ठुकरा कर आर्यों के धर्म को मानना शुरू कर दिया। समय के साथ हिरण्याक्ष को पता चला कि उसका खुद का बेटा नागवंशी धर्म को नहीं मानता तो रजा को बहुत दुःख हुआ। राजा हिरण्याक्ष ने प्रहलाद को समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन प्रहलाद तो पूरी तरह विष्णु के षड्यंत्र का शिकार हो गया था और उसने अपने पिता के खिलाफ आवाज उठा दी। इसके चलते दोनों पिता और पुत्र के बीच अक्सर झगड़े होते रहते थे।

उसके बाद आर्यों ने प्रहलाद को राजा बनाने के षड्यंत्र रचा कि हिरण्याक्ष को मार कर प्रहलाद को अल्पायु में राजा बना दिया जाये। इस से पूरा फायदा आर्यों को मिलाने वाला था। रानी कियादु पहले ही विष्णु के प्रेम जाल में फंसी हुई थी और प्रहलाद अल्पायु था। इसलिए अप्रत्यक्ष रूप से विष्णु का ही राजा होना तय था। आर्यों के इस षड्यंत्र की खबर किसी तरह हिरण्याक्ष की बहन होलिका को लग गई। होलिका भी एक साहसी और पराक्रमी महिला थी। स्थिति को समझ कर होलिका ने प्रहलाद को अपने साथ कही दूर ले जाने की योजना बनाई। एक दिन रात को होलिका प्रहलाद को लेकर राजमहल से निकल गई, लेकिन आर्यों को इस बात की खबर लग गई। आर्यों ने होलिका को अकेले घेर कर पकड़ लिया और राजमहल के पास ही उसके मुंह पर रंग लगा कर जिन्दा आग के हवाले कर दिया। होलिका मर गई और प्रहलाद फिर से आर्यों को हासिल हो गया। इस घटना को आर्यों ने दैवीय धटना करार दिया कि कभी आग में ना जलने वाली होलिका आग में जल गई और प्रहलाद बच गया। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था आर्यों ने प्रहलाद को हासिल करने के लिए होलिका को जलाया था। हिरण्याक्ष को आमने सामने की लड़ाई में हराने का सहस किसी भी आर्य में नहीं था। तो हिरण्याक्ष को छल से मारने का षड्यंत्र रचा गया। एक दिन विष्णु ने सिंह का मुखोटा लगा कर धोखे से हिरण्याक्ष को दरवाजे के पीछे से पेट पर तलवार से आघात करके मौत के घाट उतार दिया। ताकि राजा को किसने मारा इस बात का पता न चल सके। इस प्रकार धोखे से आर्यों ने मूलनिवासी राजा हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष के राज्य को जीता और प्रहलाद को राजा बना कर उनके राज्य पर अपना अधिपत्य स्थापित किया।

हम होली अपने महान राजा हिरण्यकश्यप और वीर होलिका के बलिदान को याद रखने हेतु शोक दिवस के रूप मे मनाते थे और जिस तरह मृत व्यक्ति की चिता की हम आज भी परिक्रमा करते है और उस पर गुलाल डालते है ठीक वही काम हम होली मे होलिका की प्रतीकात्मक चिता जलाकर और उस पर गुलाल डालकर अपने पूर्वजो को श्रद्धांजलि देते आ रहे थे ताकि हमे याद रहे की हमारी प्राचीन सभ्यता और मूलनिवासी धर्म की रक्षा करते हुए हमारे पूर्वजो ने अपने प्राणो की आहुति दी थी। लेकिन इन विदेशी आर्यों अर्थात ब्राह्मण, वैश्य और क्षत्रियों ने हमारे इस ऐतिहासिक तथ्य को नष्ट करने के लिए उसको तोड़ मरोड़ दिया और उसमे “विष्णु” और उसका बहरूपिये पात्र “नृसिंह अवतार” की कहानी घुसेड़ दी। जिसकी वजह से आज हम अपने ही पूर्वजो को बुरा मानते आ रहे है, और इन लुटेरे आर्यों को भगवान मानते आ रहे है।

ये विदेशी आर्य असल मे अपने आपको “सुर” कहते थे क्योकि यह लोग सोम रस नाम की शराब का पान करते थे। और हमारे भारत के लोग और हमारे पूर्वज राजा शराब नहीं पिटे थे इसलिए आर्य लोग मूलनिवासियों और राजाओं को असुर कहते थे। और इन लुटेरों/डकैतो की टोली के मुख्य सरदारो को इन्होने भगवान कह दिया और अलग अलग टोलियो/सेनाओ के मुखिया/सेनापतियों को इन्होने भगवान का अवतार दिखा दिया अपने इन काल्पनिक वेद-पुराणों मे। और इस तरह ये विदेशी आर्य हमारे भारत के अलग-अलग इलाको मे अपने लुटेरों की टोली भेजते रहे और हमारे पूर्वज राजाओ को मारकर उनका राजपाट हथियाते रहे। और उसी क्रम मे इन्होने हमारे अलग-अलग क्षेत्र के राजाओ को असुर घोषित कर दिया और वहाँ जीतने वाले सेनापति को विभिन्न अवतार बता दिया। और आज इससे ज्यादा दुख की बात क्या होगी की पूरा देश यानि की हम लोग इनके काल्पनिक वेद-पुराणों मे निहित नकली भगवानों याने हमारे पूर्वजो के हत्यारो को पूज रहे है और अपने ही पूर्वजो को हम राक्षस और दैत्य मानकर उनका अपमान कर रहे है।

याद रहे की वेदो और पुराणों मे लिखा है की सारे भगवान “लाखो” साल पुराने है और भगवान अश्व अर्थात घोड़े की सवारी किया करते थे और विष्णु का वाहन “गरुड़” पक्षी है लेकिन “घोड़ा(हॉर्स)” और गरुड़ पक्षी भारत मे नहीं पाये जाते थे , ये विदेशी आर्य उन्हे कुछ “सैकड़ों” साल पहले अपने साथ लेकर आए थे, जिससे ये साबित होता है की ये विष्णु और उसके सारे अवतार काल्पनिक है और इन्होने अपनी बनाई हुई सेना के राजाओ और सेनापतियों को ही भगवान और उनका अवतार घोषित किया है।

अब समय आ गया है की हम अपने देश का असली इतिहास पहचाने और अपने पूर्वज राजा जो की असुर या दैत्य ना होकर वीर और पराक्रमी महान पुरुष हुआ करते थे उनका सम्मान करना सीखे और जिन्हे हम भगवान मानते है दरअसल वो हमारे गुनहगार है और हमारे पूर्वजो के हत्यारे है जिनकी पूजा और प्रतिष्ठा का हमे बहिष्कार करना है।

जैसे की दक्षिण भारत मे हमारे एक महान पूर्वज राजा “महिषासुर” थे जिन्हे इन भगवान की नकली कहानियों मे असुर बताया गया है, जबकि वो एक बहुत विकसित राज्य के राजा थे , उसका सबूत उनके नाम पर कर्नाटक मे मौजूद प्रसिद्ध शहर (महिससुर) “मैसूर” है , जहां उनकी प्रतिमा भी मौजूद है।

और प्राचीन केरल राज्य के हमारे महान राजा “बलि” जिनसे उनका राजपाट छल से आर्यों के एक राजा (विष्णु का “बामन” अवतार) ने हड़प लिया था, उनके नाम पर आज भी समुद्र मे मौजूद द्वीप (एक देश) बलि (बालि, जावा, सुमात्रा) नाम से है।

अपना दीपक स्वयं बनो
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बुधवार, 8 जनवरी 2020

हर युग से अच्छा कलयुग क्यों

प्रजापति प्रजापति ब्राह्मा चाम की पहचान नहीं कर पाए और उन्होंने अपनी पुत्री सरस्वती के साथ संभोग किया।

मोहिनी को देखकर शंकर ऐसे मत वाले हो गए कीमत वाले भैंसे के समान कामातुर होकर उसके पीछे दौड़ पड़े ।

विष्णु ने जालंधर की पत्नी के साथ छल करके उसका सतीत्व भंग कर दिया।

जब तरूण जंघावती को देखकर विशेष रूप से कहा कामातुर हो गए

तो उसने पाने की आशा से मंदाल ऋषि ने लाश ढोने मे भी संकोच नही किया ।

घ्रताची नाम की अप्सरा को पाकर उनका हृदय हर्षित हो गया और विश्वामित्र 10 वर्ष तक उनके साथ रमण करते रहे ।

इंद्र ने छल बल से अहिल्या को प्राप्त करके उसे अपने अंक में भरकर उसके साथ समागम किया।

चंद्र ने अपने गुरु माता को अंक में भरकर उसके साथ रमण किया।

अपने छोटे भाई की पत्नी ममता पर मोहित होकर देव गुरु बृहस्पति ने उसके साथ बलात्कार किया।

धीवर पुत्री मत्सगंधा पर आसक्त होकर पराशर ने नौका में ही उस सुंदरी के साथ रमण किया।

चांडाल कन्या से संभोग करके वशिष्ठ को बड़ा संतोष मिला जिसके फलस्वरूप कपिल का जन्म हुआ।

विश्ववाची नामक अप्सरा को जंगल में पाकर अकेली राजा ययाति ने उसे गले से लगाकर संभोग किया ।

भरद्वाज ने घ्रताची नामक अप्सरा से प्रसंग करके द्रोण को न्म दिया।

राजा पुरोरवा ने इन्द्र से उर्वशी को मगाकर अपना काम बनाया जिससे आयुष नामक पुत्र पैदा हुआ ।।

विश्वामित्र ने मेनका के साथ सम्भोग किया दोनो के योग से सकुन्तला का जन्म हुआ ।

वरूण ने जब उर्वशी के साथ रमण किया तो उनके वशिष्ठ नामक पुत्र हुआ ।।।।।।।।

पंचशील झंडे का संपूर्ण इतिहास बौद्ध धर्म पंचशील


🌹 विश्व बौद्ध “धम्म ध्वज” दिवस 🌹

8 जनवरी,1880 बौद्ध जगत में विशेष महत्व का दिन है क्योंकि इसी दिन “#धम्म_ध्वज” की स्थापना हुई थी | यह धम्म ध्वज सम्पूर्ण विश्व को शांति, प्रगति मानवतावाद और समाज कल्याण की सदैव प्रेरणा देता है | इस धम्म ध्वज में पांच रंग होते है जिनका अपना अर्थ और भाव है | चूँकि इस #धम्म_ध्वज_में_पांच_रंग_हैं_इसलिए_इसको_पंचशील_का_झंडा_भी_कहा_जाता_है | धम्म ध्वज हमारी आन, बान और शान है |

आओ धम्म ध्वज के पांच रंगों के भावार्थ को हम समझें..

(1) #नीला :- बौद्ध धम्म मे प्रेम और दया इस प्यारी संकल्पना को दर्शाता है |समानता और व्यापकता- अर्थात इस नीले आसमान के नीचे सभी व्यक्ति सामान है | सार्वभौमिक करुणा | सभी प्राणी मात्र के प्रति कल्याण करने की भावना रखना |

‘#सब्बे सत्ता सुखी होन्तु’/ #भवतु सब्ब मंगलं

(2) #पीला :- #मध्यममार्ग का प्रतिक| जैसा कि विदित है कि बुद्ध ने मध्यम मार्ग हेतु अष्टांगिक मार्ग पर चलने का रास्ता बताया है जो ‘निर्वाण’ प्राप्ति यानि चरित्र सम्पन्न, उत्कृष्ट जीवन जीने का, प्रगति का सरल और सुस्पष्ट मार्ग है |

(3) #लाल :- बुद्ध का उपदेश दर्शाने वाला … विद्वत्ता, सद्गुण और सम्मान का प्रतिक | गतिशीलता और दृढ़ निश्चय | उर्जावान और परिश्रमी बनना | प्रत्येक व्यक्ति को धर्मानुसार आचरण करना चाहिए | अपने वांक्षित उद्देश्य की पूर्ति तथा जनकल्याण के लिए कठिन परिश्रम करना चाहिए | धम्म की रक्षा हेतु बलिदान तक करने के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए |

(4) #सफेद :- बुद्ध उपदेश की #पवित्रता दर्शाने वाला, स्वतंत्रता शांति और शुद्धता | मन , वचन और कर्म से व्यक्ति शुद्ध और पवित्र होना चाहिए | शीलवान और चरित्र संपन्न व्यक्ति बनने का हर संभव प्रयास करना चाहिए | सफ़ेद रंग भगवान बुद्ध के विचारों की पवित्रता और शुद्धता का घोतक है |

(5) #नारंगी/#केसरिया:- बौद्ध धम्म का सार, बुद्ध के पाठ की विद्वत्ता, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा पूर्ण है|त्याग और सेवा – प्रज्ञा , बुद्धिवाद, उच्चतम शिक्षा की प्राप्ति। प्रत्येक व्यक्ति को सुशिक्षित होने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा लेनी चाहिए।शिक्षा प्राप्त करना, ज्ञान प्राप्त करना बुद्ध धम्म का प्रथम सन्देश है | मन को सुसंस्कृत और नियंत्रित करने के लिए शिक्षा नितांत आवश्यक है | अतः प्रत्येक व्यक्त्ति को अच्छी से अच्छी शिक्षा मिलनी ही चाहिए | उचित शिक्षा के द्वारा ही व्यक्त्ति प्रज्ञावान बनता है और सेवा और त्याग के लिए तत्पर रहता है | केसरिया भगवान बुद्ध के चीवर का रंग है जो शक्त्ति और साहस को दर्शाता है |

इन अखंड पाच रंगो का संयोजन इसकी सत्यता का प्रमाण है |

इस प्रकार “धम्म ध्वज” से संपूर्ण बौद्ध धम्म का भाव और सार प्रकट होता है इसलिए धम्म ध्वज को पूरा आदर और सम्मान देना चाहिए |

#चलो बुद्ध की ओर

#बुद्धम् शरणम् गच्छामी।

#धंम्मम् शरणम् गच्छामी।

#संघम् शरणम् गच्छामी।

मंगलवार, 7 जनवरी 2020

Buddhist monk Sudhamnath Thailand visits India




Buddhist monk Sudhamnath Thailand visits India

नमो बुध्दाय
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मुझे लिखते हुए बड़ा हर्ष हो रहा है कि अर्हत पूज्य भन्ते महास्थविर सुधम्मनाथ व फ्रापार्नचाई जी ने भारत में आकर के जनकल्याण करने का कार्य किया

सर्वप्रथम पूज्य भन्ते महास्थविर सुधम्मनाथ जी व फ्रापार्नचाई जी

सन 2015 में भारत आए थे उन्होंने सबसे पहले मैनपुरी जसराजपुर राजघाट संकिसा में (युथ बुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ़ इंडिया) से संपर्क किया बाई बीएसआफ इंडिया के अध्यक्ष सुरेश चंद्र बौद्ध के माध्यम से गुरु जी ने मैनपुरी में लोगों को निर्वाण सिखाया।



फिर माननीय अध्यक्ष जी के माध्यम से ही जिला हरदोई रूपापुर में शाक्य बिजय सिंह कुशवाहा से गुरु जी का संपर्क हुआ गुरु जी ने जिला हरदोई रूपापुर में आकर हजारों लोगों को निर्वाण सिखाने का कार्य किया।

चलते हुए इसी सिलसिले के दौरान सन 2016 में 27 व 28 मार्च को शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा के निवेदन करने पर बिजय सिंह जी के माध्यम से गुरूजी ग्राम खदिया नगला मे आए।

और लोगों को निर्वाण सिखाने का कार्य किया


सन 2017 में शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा गुरुजी ग्राम खानपुर जिला फर्रुखाबाद मैं जा कर के लोगों को निर्वाण सिखाया ।

चौथी बार गुरुजी सन 2018 में जब भारत आए तो उन्होंने शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा बिजयसिह कुशवाहा जी के माध्यम से

ग्राम कड़क्का खानपुर ग्राम व पोस्ट ककराला जलालाबाद जिला शाहजहांपुर रामपुर मजरा कांट जिला शाहजहांपुर

खदिया नगला भरखनी शाहाबाद हरपालपुर ककरा रत्नापुर आदि गांवों में भ्रमण कर लोगों को निर्वाण सिखाया


गुरु जी ने बताया है कि निर्माण ही परम सुख है निर्वाण के अलावा संसार में कोई दूसरा सुख हो ही नहीं सकता।

मनुष्य का पुनर्जन्म उसकी ही इच्छा से होता है अगर मनुष्य अपने मन को अपने वश में कर ले तो उसका पुनर्जन्म नहीं होगा जैसे हमने किसी वस्तु को चाहा फिर उसे प्राप्त करने का प्रयास किया और हमें वह वस्तु प्राप्त हो गई

अगर हम उस वस्तु को न चाहते तो क्या उसे हम प्राप्त करते नहीं ना

इसी तरह जब हम मनुष्य जन्म को अच्छा समझ कर प्राप्त करना चाहते हैं तभी हमें पुनर्जन्म होता है।


गुरु जी ने आकर हमें परम ज्ञान दिया मैं गुरु जी के चरणों का हृदय से आभारी हूं।।।।।।

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
खदिया नगला हरदोई


नमो बुद्धाय ।।।।।।।।।

sudhmmanatho Thailand






भारतीय संस्कृति का गौरव है बौद्ध धर्म

वाईबीएस सेंटर पर महापरित्राण पाठ में रातभर हुआ मंत्रों का संगायन...

भोगांव(मैनपुरी), संसू। भारतीय संस्कृति और बौद्ध धर्म का वैभव गौरवशाली रहा है। संस्कृति व बौद्ध धर्म के समानांतर विचारधारा के चलते ही भारत में बौद्ध धर्म का प्रसार तेजी से हुआ था।

ये बात थाईलैंड के बौद्ध भिक्षु सुधम्मनाथ थैरो ने गांव जसराजपुर स्थित वाईवीएस सेंटर पर आयोजित महापरित्राण पाठ व चीवरदान कार्यक्रम में कहीं। उन्होंने कहा कि भिक्षुओं का जीवन हमेशा दूसरों को प्रेरणा देता है। मुख्य अतिथि सांसद बदायूं डॉ. संघमित्रा मौर्य ने कहा कि भिक्षुओं के जीवन और त्याग से प्रेरणा लेकर सभी को गौरवशाली इतिहास समाहित किए बौद्ध धर्म के रास्ते पर चलने का प्रयास करना चाहिए।

गुरुवार की रात लगभग दो सैकड़ा भिक्षुओं ने विदेशी भिक्षुओं के निर्देशन में महापरित्राण पाठ में मंत्रों की व्याख्या की। वाईबीएस के अध्यक्ष सुरेश बौद्ध व महासचिव भंते उपनंद थैरो ने भिक्षुओं को उनकी कार्यशैली के बारे में बताया। सुबह भिक्षुओं को भोजनदान व चीवरदान का कार्यक्रम उपासकों ने किया। कार्यक्रम में एसडीएम बाह महोश प्रकाश, इंजी. भीमराज, भंते श्रद्धालोको, भंते शीलानंद, भंते सुमनरत्न, भंते मित्ता बोधि, पीएस बौद्ध, हरिओम बौद्ध, ब्रजेश कुमार शाक्य, अनिल बौद्ध, भंते पइयासार, श्यामबाबू गुप्ता, पूजा बौद्ध, अभिलाख सिंह मौजूद रहे।

विदेशी मूर्ति लगाने का शिलान्यास

महापरित्राण पाठ कार्यक्रम के दौरान वाईबीएस सेंटर पर थाईलैंड से मंगाई गई भगवान बुद्ध की मूर्ति को लगाने के लिए शिलान्यास कार्यक्रम हुआ। विदेशी भिक्षुओं ने बदायूं सांसद संघमित्रा मौर्य, बाईवीएस अध्यक्ष सुरेश बौद्ध, महासचिव भंते उपनंद थैरो को मंत्रोच्चारण के साथ मूर्ति का शिलान्यास कराया। फरवरी तक मूर्ति स्थापित की जाएगी।


[5/1, 7:40 PM]
 Rahul Singh bauddha
🎻🎤🎹🎼🎸:
 sudhmmanatho Thailand 

बुधवार, 1 जनवरी 2020

हिंदू धर्म की सच्चाई ग्राम सभा भरखनी



नमो बुद्धाय
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ऋग्वेद के आधार पर सृष्टि की रचना कैसे हुई



    ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में विश्व की उत्पत्ति के बारे में लिखागया है। इस श्लोक के मुताबिक ब्राह्मण ब्रह्मा के मुख से, क्षत्रिय बाहुसे, जांघ (Thighs) से वैश्य और पैरों से शुद्रउत्पन हुए, लेकिन कैसे उत्पन्न हुएहै ये नहीं बताया गया है। वो कौन सी तकनीक थी ये आज भी बहुत बड़ा रहस्य है।
      अगर इन ब्राहमण विद्वानों से पूछा जाये तो कहते है धर्म के साथ तर्क नहीं करते सिर्फ आँखे मुंद कर धर्म को मानना चाहिए, लेकिन क्यों? ये भी किसी को पता नहीं है। अछूतों अर्थात शूद्रों की उत्पति असल में मनुस्मृति से हुई है।
      जब 1600 ईसवी में मनु महाराज ने मनु स्मृति के रचना की तो उस में सभी मूलनिवासियों को शुद्र कहा गया और सभी मूलनिवासियों को 6743 जातियों में बांटा गया ताकि कभी भी मूलनिवासी या शुद्र ब्राह्मणों के खिलाफ सर ना उठा सके। उस समय देश में बौद्ध धर्म का बोल बाला था और बहुत से लोग जातिवाद या मनुवाद को नहीं मानते थे।
      मूलनिवासी समता के साथ जीना सिख रहे थे। जो लोग समता और समानता के साथ जी रहे थे उन्ही को शुद्र और अछूत कहा गया। मनुसृत्ति और पुरुष सूक्त दोनों में भी औरत जात का निर्माणकैसे हुआ है ये नहीं बताया गया है।
       क्योकि उस समय औरतों को सिर्फ भोग की वस्तु समझा जाता था। औरतों के शोषण के लिए हजारों प्रथाएं और परम्पराए देश में प्रचलित थी। तो औरतों पर ध्यान देने का कोई विचार ब्राह्मणों के मन में आया ही नहीं। और औरत जात का शोषण आज भी जारी है।
     ऋग्वेद के पुरुष सूक्त के मुताबिक ब्राह्मण को पढ़ने-पढ़ाने और धर्म गुरु बनने का अधिकार,क्षत्रिय को राज करने का अधिकार, वैश्यों को व्यापार करने का अधिकार दे दिया गया। लेकिन शूद्रों को सिर्फ इन तीनों वर्णों की सेवा का आदेश सुना दिया गया।
    जो भी वर्ग अपनाकाम ठीक तरह से नहीं करता था उसके लिए दंड के प्रावधान किया गया था। खासकर शुद्रो केलिए वे दंड बहुत ही अमानवीय थे। आज भी देश के बहुत से हिस्सों में मूलनिवासियों पर ब्राह्मणों के अत्याचारों का सिलसिला जारी है।

    क्या ये व्यवस्था विश्व में सबसे अच्छी थी ?
   अगर थी तो फिर ये अन्यदेशों में क्यों नहीं पायी जाती है ?  
    अगर भारत के लोगों का निर्माण ब्रह्मा के शरीर से हुआ है तो अफ्रीकन, अमेरिकन,जापानीज आदि लोग बिना किसी ब्रह्मा के कैसे पैदा हो गए?
     क्या ब्रह्मा की सृष्टि का ज्ञान सिर्फ भारत तक ही सीमित था?
      अगर सीमित था तो फिरउसको भगवान् कैसे मान सकते है?
     और ब्रह्मा को सिर्फ भारत के 1 अरब 30 करोड लोगों में से सिर्फ ब्रह्माणी या हिंदू धर्म को मानने वाले लोग ही जानते है जो मुश्किल से 80 करोड भी नहीं होंगे। बाकि पुरे विश्व के 8    
      अरब के लोग बेबकुफ़ है क्या?

चलो अब जानते है इनके कर्म का क्या परिणाम के बारे में :

     ब्राह्मण को ही सिर्फ पढ़ने पढ़ाने का अधिकार था इसलिए आज दुनिया कि 200सर्वोच्च विश्वविद्यालयों में आज एक भी भारतीय विद्यालय शामिल नहीं है।देश कि 65 करोड़ से भी ज्यादा आबादी को पढ़ना लिखना तक नहीं आता है। कोई भीमहत्वपूर्ण आविष्कार जैसे कि टेलीफोन, कंप्यूटर, मोबाइल, साइकिल, कपड़ा इत्यादि से लेकर शौचालय के कामोड काआविष्कार तक विदेश में हुआ है, आज तक भारत में एक भी अविष्कार नहीं हुआ।

     क्षत्रिय राजा जो कि ब्रह्मा के बाहु से पैदा हुए ये खुदका राज्य बचानेमें असफल रहे। अफगानिस्तान, तुर्कस्तान से आये कुछ मुगलों ने और यूरोप सेआये अंग्रेजों ने इन क्षत्रिय राजाओं की सही औकात दिखा दी। आज भी इन तथाकथित क्षत्रियों के हालात ज्यादा अच्छे नहीं है। बस अपनी झूठी शान का दिखावा करते रहते है। लड़ाइयों में सर कटवाए इन क्षत्रियों ने और धर्म का दर दिखा कर राज किया ब्राह्मणों ने।
     असल में देखा जाये तो आज की तारीख में इन क्षत्रियों से ज्यादा दीन हीन शुद्र भी नहीं है। शुद्र भी तार्किक बुद्धि का प्रयोग करना सिख रहे है लेकिन इन क्षत्रियों के पास आज भी ब्राह्मणों की बात मानने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं है। ब्राहमणों ने हर क्षेत्र शिक्षा, राजनीति, व्यवसाय आदि से इन क्षत्रियों को दूध में पड़ी मख्खी की तरह बाहर निकल के फेंक दिया है। और ये तथाकथित क्षत्रिय आज धोबी के कुत्ते बन गए है ना घर के ना घाट के।

     वैश्यों के व्यापार ने इस समाज का भरपूर शोषण किया, साहूकारी, ब्याजबढ़ा के लोगों पर कर्ज बढ़ाया, कर्ज ना देने की स्थिति में उनकी जायदाद परकब्जा किया और उनकी हजारों पीढ़ियों को गरीबी में धकेल दिया। मानते है एक समय इन वैश्यों ने मूलनिवासी शूद्रों पर मनमाने अत्याचार किये है, लेकिन आज की तारीख में वैश्यों की हालत भी धोबी के कुत्ते जैसी हो गई है ना घर के ना घाट के। लेकिन फिर भी ब्राह्मणों की बातों का अनुसरण करने के सिवा  पास भी कोई दूसरा चारा नहीं है।

      और शुद्र के बारे में क्या लिखना जिनको इन तीनो वर्णो कि सेवा करने केअधिकार के सिवा और कुछ नहीं दिया गया था। खेत में काम करना, मेहनत मजदूरी करना येसब इनका काम था। अगर नहीं करते तो इनकी जीवा (tongue) काटना, इनके कानमें शीशा पिघला कर डालना, उनकी आँखे निकलना, उनकी गर्दन काटना जैसीशिक्षाये मनुस्मृति में लिखी गयी है।
     हमारे पूर्वजों पर इन ब्राहमणों, राजपूतों और वैश्यों ने मन चाहे जुल्म किये, ऐसा नहीं है कि हमारे समाज के लोगों को सचाई पता नहीं है लेकिन धर्म और जाति के जाल में उलझे मूलनिवासी पत्थरों के भगवानों और देवी देवताओं के डर से चुप बैठे हुए है। हिंदू ना होते हुए भी ब्राह्मणों के आदेशों का अनुसरण कर रहे है। और ऋग्वेद के पुरुष सूक्त कोआगे बढ़ाने का काम कर रहे है ।
     दोस्तों, इस सब बातों से यह साबित होता है कि इन विदेशी आर्यों ने देश को लुटने, मूलनिवासी शूद्रों का शोषण करने के सिवा आज तक कुछ नहीं किया। आज भी मूलनिवासी शूद्रों को बेबकुफ़ बना कर देश में 90% सरकारी नौकरियों पर कब्ज़ा किये बैठे है। देश के शीर्ष से लेकर निचे तक सभी महत्वपूर्ण पदों पर सिर्फ ब्राहमणों का कब्ज़ा है।
       आज तक देश का कोई भी प्रधान मंत्री शुद्र नहीं बना क्योकि ब्राहमण ये होने नहीं देना चाहते। नेवी, आर्मी से लेकर वायु सेना के शीर्ष पदों पर सिर्फ ब्राहमण ही विराजमान है। यहाँ तक की क्षत्रियों और वैश्यों को भी यह अधिकार नहीं है की वो देश के शीर्ष पदों पर रह सके।
    दोस्तों, क्या यह ब्राह्मणों की एक सोची समझी चाल नहीं है?
     आज भी धर्म और जाति के नाम पर देश में हर मूलनिवासी का शोषण हो रहा है। देश की हर बहु बेटी का शोषण हो रहा है। DNA Research Report 2001 के मुताबिक भारत की सभी औरतों का DNA 100% एक है और शूद्रों के DNA से 100% मिलाता है। जिस से सिद्ध होता है कि देश की सभी औरते और लडकियां शुद्र है।
       इसीलिए ब्राह्मण या हिंदू धर्म में औरतों को कोई खास अधिकार प्राप्त नहीं है और भारत की महिलाएं गुलामों जैसा जीवन जीने पर विवश है।
                                             
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राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
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