शनिवार, 30 नवंबर 2019

मत्स्य अवतार की सच्चाई और समुद्र मंथन की सच्चाई हिंदू धर्म की सच्चाई

[1/12, 9:46 AM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: मित्रो यह पूरा पोस्ट ध्यान से पडे ।।।

समुद्र मंथन दुनीया के सबसे बडे गप्पो मेसे एक,

दैत्यराज बलि का राज्य तीनों लोकों पर था। इन्द्र सहित देवतागण उससे भयभीत रहते थे। इस स्थिति के निवारण का उपाय केवल विष्णु ही बता सकते थे, अतः ब्रह्मा जी के साथ समस्त देवताभगवान विष्णु के पास पहुचे !

उन्होंने भगवान विष्णु को अपनी विपदा सुनाई। सब सुन कर विष्णु बोले तुम दैत्यों से मित्रता कर लो और क्षीर सागर को मथंन कर उसमें से अमृत निकाल कर पान कर लो। दैत्यों की सहायता से यह कार्य सुगमता से हो जायेगा।
इस कार्य के लिये उनकी हरशर्त मान लो और अन्त में अपना काम निकाल लो !! अमृत पीकर तुम अमर हो जाओगे और तुममें दैत्यों को मारने का सामर्थ्य आ जायेगा।
दैत्यराज बलि ने देवराज इन्द्र से समझौता कर लिया और समुद्र मंथन के लिये तैयार हो गये। मन्दराचल पर्वत को मथनी तथा वासुकी नाग को नेती बनाया गया।
स्वयं भगवान श्री विष्णु कच्छप अवतार लेकर मन्दराचल पर्वत को अपने पीठ पर रखकर उसका आधार बन गये !!

“समुद्र मंथन आरम्भ हुआ और समुद्र मंथन से निम्न चिजे निकली !!
1:- सबसे पहले जल का हलाहल विष निकला, विष को शंकर भगवान के द्वारा पान कर लिया गया उनका गला निला फड़ गया ।
2:- दूसरा रत्न कामधेनु गाय निकली जिसे ऋषियों ने रख लिया।
3:- फिर उच्चैःश्रवा घोड़ा निकला जिसे दैत्यराज बलि ने रख लिया।
4:- उसके बाद ऐरावत हाथी निकला जिसे देवराज इन्द्र ने ग्रहण किया।
5:- ऐरावत के पश्चात् कौस्तुभमणि समुद्र से निकली उसे विष्णु भगवान ने रख लिया !!
6:- फिर कल्पद्रुम निकला और रम्भा नामक अप्सरा निकली। इन दोनों को देवलोक में रख लिया गया।
7:- फिर समु्द्र को मथने से लक्ष्मी जी निकलीं। लक्ष्मी जी ने स्वयं ही भगवान विष्णु कोवर लिया।
8:- फिर एक के पश्चात एक चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा शंख निकले और अन्त में धन्वन्तरि वैद्य अमृत का घट लेकर प्रकट हुये।
मित्रो आप खुद समझ सकते हो कि ये कितनी बडी बकवास है, पुरी तरह काल्पनिक और अवैग्यानिक है।।
कितनी अजीब बात हे कि जब भगवान को भी कुछ चाहीये होती तो उन्हे भी महनत करना पडी ।।
वैसे तो समुर्द का मंथन करना कि एक महा गप है ।। फिर भी कुछ बेचारे लोग न चाहते हुए भी इसगप्पे को सच मानते है, इस पर स्वभाविक रुप से मेरे मन मे जो संकाये पैदा हो रही है वो कुछइस प्रकार है ।।
1:- सबसे पहले कि स्मुद्र का मंथन किया जा रहा है तो क्या यह समुद्र के किनारे प किया गया या फिर बिच गहराई मे, किनारे पर तो होगा नही तो बिच गहाराई मे किया गया तो देवता तो ठिक लेकीन सभी राक्षसो को भी पानी पर चलना आता था क्या ??
2:- समुद्र का मंथन करने से विष निकला ????
समुद्र का मंथन करने से अगर नमक निकलने की बात कही गयी होती तो बात कुछ हजम भी हो जाती,
और शंकर भगवान ने विष पिया तो उनका गला निला पड गया, इसका मतलब विष बहुत जहरीला था, भगवान अगर और अधीक मात्रा मे पि लेते तो न जाने क्या अनर्थ हो जाता ।।
3:- कामधेनु गाय उच्चैःश्रवा घोड़ा और् एरावत हाथी समुद्र से निकले ये क्या मजाक है, अगर किसी मछली के निकलने की बात होती तो एक बार समझ आता,
बेचारे मछुआरो कि जिन्दगी बीत जाती है समुद्र मे जाल फेंकते हुए उन्हे तो आज तक मछली और केकड़ो के अलावा कुछ नही मिला समुद्र से ???
4:- लक्ष्मी जी भी समुद्र मंथन से निकली, तो जवान होने तक लक्ष्मी जी समुद्र मे क्या कर रही थी, समुद से निकलने के बाद का उनके जिवन का लेखा झोखा है लेकीन उनके स्मुद्र के अंदर व्यतीत किये जिवन का लेखा जोखा क्यो नही है???
समुद्र से निकलते हि विष्णू ने लक्ष्मी से शादी करली तो कही एसा तो नही कि य सब लक्ष्मी को समुद्र से निकालने कि विष्णू की चाल तो नही थी????
5:- फिर चंद्र्मा भी समुद्र मंथन से निकला, मित्रो इस बात ने तो गप्पो की हद पार कर दि,चंद्रमा जितना बड़ा ग्रह जो आकार मे प्रथ्वी का एक चौथाई है, वो समुद्र से कैसे निकल सकताहै ???
6:- आखीरी मे समुद्र से अंम्रत का घडा लेकर धन्वंतरी देव निकले, धंनतरी भी तो देवता हि थे तो जब देवताओ को अंम्रत पीना हि था तो सिधा धन्वतरी देव से कह देते वो खुद अंम्रत लेकर आजाते उसके लिये ये सब झमेला करने की क्या जरुरत थी???
या फिर देवताओ के बिच इतना संमर्क भी नही था ???

वेञ्यानीक तौर पर ईसै सच साबीत करने के सबुत ऐन्टीनाधारीओ के पास हो तो पेश करे

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Rahul Singh bauddha kushwaha khadiya ngla bharkhani
[1/12, 9:49 AM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: Rahul Singh bauddha kushwaha khadiya ngla bharkhani Hardoi utter Pradesh

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1. मत्स्यावतार: आर्यों के वेदों और पुराणों में वर्णित मत्स्य अवतार का गहन अध्ययन करने से और हजारों शोधों का अध्ययन करने से पता चलता है कि यह एक झूठी कहानी है। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ और ना ही आज तक पूरी दुनिया में कोई ऐसा इंसान हुआ जो व्हेल मछली जैसी भीमकाय मछली को अपने वश कर सके। ब्राह्मणों ने मत्स्य अवतार बना कर पहली ईसवी से उन्नीस ईसवी तक के समय में तो मूल निवासियों को मुर्ख बना लिया लेकिन आज बीसवीईसवी में किये गए हजारों शोधों से यह बात साबित हो गई है कि मत्स्य अवतार की कथा सिर्फ एक झूठ है। तो सच क्या है?
सच यह है कि ईसा से 3200 साल पहले यूरेशिया में एक क्रूर जाति उत्पात और विनाश मचाती रहती थी। जिस का नाम “मोगल” था। वहां के शासकों ने उस जाति के सभी आदमियों को पकड़ कर एक बड़ी नाव में बिठा कर बीच समुद्र में छोड़ दिया, और आशा की कि यह जाति समुद्र में दफ़न हो जाये। लेकिन यह भारत जिसको उस समय चमार-दीप कहा जाता था, का दुर्भाग्य था, कि मोगल जाति के लोग भारत में पहुँचे। इसी से मत्स्य अवतार का उदय हुआ। कई दिनों तक समुद्र में भटकने के बाद युरेशियनों को जमीन दिखाई दी थी। इसी से युर्शियनों ने ये कल्पना भी गढ़ी थी कि धरती पानी में स्थित है। 19वी सताब्दी तक सारे भारत के मूल निवासी यही मानते थे कि धरती पानी में है। युरेशियनों ने मत्स्य अवतार की कहानी अपने आप की श्रेठ साबित करने के लिए गढ़ी थी और अपने आपको देवता सिद्ध कर दिया था। बाद में इस कहानी को आगे पीछे कर के वेदों और पुराणों में स्थापित किया गया ताकि किसी को सच्चाई पता ही ना चले। ना तो कभी मत्स्य अवतार हुआ, और ना ही यूरेशियन देवता थे। आज ये सच्चाई साडी दुनिया जानती है।
2. कुर्मावतार: वेदों और पुराणों में लिखी हुई कुर्मा अवतार की कहानी भी मत्स्य अवतार की तरह सिर्फ एक झूठ ही है। जब कभी समुद्र मंथन ही नहीं हुआ, तो कुर्मा अवतार कैसे हो गया? अगर कुछ लोग यहाँ सवाल करे तो उन से हमारे कुछ सवाल है: 1. क्या यूरेशियन पानी पर चलते थे? 2. यूरेशियन पानी पर चलते थे तो वह कौन सी तकनीक थी? 3. अगर असुर अर्थात राक्षस भी थे, तो असुर को पानी पर चलने की तकनीक कैसे चली? पानी पर चलने की तकनीक पर तो यूरेशियन आर्यों का एकाधिकार था। 4. अगर यूरेशियन आर्य धनवंतरी ने ही अमृत लाना था तो आर्यों ने खुद अपने आर्य भाई धनवंतरी को अमृत लेन को क्यों नहीं कहा? 5. असुरों और आर्यों ने सुमेरु पर्वत को कैसे समुद्र में स्थापित किया और सुमेरु पर्वत को वापिस उसी जगह कौन रख कर गया? 6. लक्ष्मी अपनी जवानी तक समुद्र में क्या कर रही थी? 7. युरेशियनों ने तो अमृत पिया था, तो वो मर क्यों गए? आज तक उस समय का कोई आर्य जिन्दा क्यों नहीं नहीं है? तो इन सभी सवालों का यह अर्थ निकालता है की समुद्र मंथन कभी नहीं हुआ। यह एक काल्पनिक कहानी है। असल में असुर और आर्यों के संग्राम में आर्यों को हार का मुह देखना पड़ा। सारे आर्य डर के मारे समुद्र के किनारे जा छुपे, और भारत (चमार दीप) छोड़कर भागने वाले थे। उस समय धुर्त विष्णु नाम के आर्य ने कछुए वाली निति अपनाई और कछुए के समान शांत रह कर मूल निवासियों के साथ संधि कर ली। यह संधि आर्यों के लिए अमृत के समान सिद्ध हुई, और आर्यों को भारत (चमार दीप) को नहीं छोड़ना पड़ा। यह संधि समुद्र के किनारे बहुत दिनों के विचार विमर्श के बाद हुई थी इसीलिए समुद्र के किनारे किये गए विचार विमर्श को समुद्र मंथन और उस से निकले परिणाम को आर्यों ने अमृत कहा। कुर्मा अवतार की कहानी तो बाद में युरेशियनों ने अपनी महानता सिद्ध करने के लिए गढ़ी थी। उस समय वह ना तो कोई समुद्र मंथन हुआ और ना ही कोई अमृत नाम की चीज या पेय पदार्थ निकला था। ना समुद्र मंथन हुआ, ना अमृत निकला, अपनी हार को भी इन विदेशी ब्राह्मणों ने अपनी महानता में बदल दिया।
3. वराह अवतार: वराह अवतार की कथा भी हिन्दू पुराणों में बहुत ही गलत ढंग से बताई गई है, जिसमें बताया गया कि हिरणायक्ष ने धरती को चुरा लिया था। धरती को चुरा कर हिरणायक्ष ने पानी में छुपा दिया। विष्णु सूअर बना और हिरणायक्ष को मार कर विष्णु ने धरती को पानी से बाहर अपने दांतों पर निकला। अब यह कितना सत्य है यह तो पाठकगण पढ़ कर ही समझ गए होंगे। बिना बात को घुमाये आप लोगों को सची घटना के बारे बता देते है। असल में हुआ यूँ था की हिरणायक्ष दक्षिण भारत के प्रायद्वीपों का एक महान मूल निवासी राजा था। जिसने सभी यूरेशियन आर्यों को दक्षिण भारत में मार और डरा कर सभी द्वीपों भगा दिया था। देवताओं ने बहुत सी युक्तियाँ लगा ली थी परन्तु हिरणायक्ष एक अपराजय योद्धा था, जिसे कोई भी आर्य प्रत्यक्ष युद्ध में हरा नहीं सकता था। हिरणायक्ष ने सारी दक्षिण भारत के सभी द्वीपों पर अपना अधिपत्य स्थापित कर दिया था। दक्षिण भारत में और उसके आस पास के द्वीप पानी में स्थित थे और आर्यों का उन द्वीपों पर से राज्य समाप्त हो गया था। तो इस घटना को पृथ्वी को पानी के अन्दर ले जा कर छुपाना प्रचारित किया गया। हिरणायक्ष को हराने के लिए एक बार फिर विष्णु ने छल कपट का सहारा लिया और हिरणायक्ष को युद्ध करने समुद्र में ललकारा। पानी में युद्ध करते समय विष्णु ने धोखे से हिरणायक्ष के सर के पीछे वार किया और हिरणायक्ष को मार दिया। हिरणायक्ष को मारने के बाद आर्यों का कुछ द्वीपों पर फिर से राज्य स्थापित हो गया। मूल निवासी कभी इस घटना की सच्चाई ना जन ले इस लिए आर्यों ने विष्णु को भगवान् और हिरणायक्ष को राक्षस या असुर बना कर आम समाज के सामने प्रस्तुत किया। अब अगर विज्ञान की ओर से भी इस घटना का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है कि यह घटना एक दम काल्पनिक है। क्योकि समुद्र धरती पर है ना की धरती समुद्र में। तो यहाँ प्रश्न उठता है अगर हिरणायक्ष ने धरती को समुद्र में छुपाया तो कैसे? इतना बड़ा समुद्र कहा है जिस मैं पृथ्वी समा सके? ना तो कोई विष्णु अवतार हुआ और ना ही पृथ्वी को पानी के अन्दर छुपाया गया। यह सिर्फ मूल निवासियों को मुर्ख बनाने की चाल मात्र थी।


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स्वर्ग कहां है लेखक राहुल शास्त्री

हां स्वर्ग कहां है बहुत अच्छा प्रश्न रहा है साथियों आपका शायद जिसे प्राप्त करने की इच्छा हर व्यक्ति की रही है परंतु वह स्वर्ग है कहां इसके बारे में सोचने की जरूरत कोई करता ही नहीं लेकिन उसे प्राप्त करने के लिए व्यक्ति जाने किन किन आडम्बरियों की शरण में चले जाते हैं ऐसे ढोंगी भोले भाले समाज को चिकनी चुपड़ी कहानियां सुनाकर गुरु मंत्र देकर अपनी जनसंख्या वृद्धि करने में जुटे हैं साथियों आप जानते हैं कि जिसकी जनसंख्या ज्यादा होती है उसकी ही वैल्यू ज्यादा होती है और उसकी पूजा होती है।

मैं इस भोली भाली जनता से कहना चाहूंगा जो गुरु तुम्हें ज्ञान देने के बाद में भी तुम्हें आश्वासन नहीं देता है कि जाओ अब तुम स्वयं जन-जन में शांति और धर्म का प्रकाश करो मैंने बहुत चेला लोगों से मुलाकात की उनसे पूछा कि भाई आपने जो नियम सिद्धांत सीखे हैं वह हमें भी बताएं ताकि मैं भी धर्म धारण कर सकूं।।

तो उन्होंने जवाब दिया कि इसके लिए तुम्हें मेरे गुरु की शरण में जाना होगा क्यों यही तो वही कारण है गुरु ने शिष्यों को आश्वासन दिया ही नहीं जाकर तुम भी शिष्य बनाओ शांति अहिंसा और धर्म का प्रचार करो।
दोस्तों यह बात बहुत ही विचारणीय है कि अगर वे अपने शिष्यों को आश्वासन दे दे तो गुरु के पास जाएगा ही कौन उनकी पूजा कौन करेगा।
तो देखिए स्वयं कितने कपटी होते हैं छलिया होते हैं भेदभाव छुआछूत अस्पृश्यता होती है मगर हमें दुख इस बात का है कि हमारा भोला भाला समाज इस चीज को समझने में असमर्थ होता है।।
मैं तो यही कहूंगा कि जो बात समाज के लिए कल्याणकारी है शांति अहिंसा और धर्म को साधने वाली है उसका प्रचार तो सरेआम करना चाहिए और किया जाता है लेकिन वह कहते हैं कि मेरा गुरु मंत्र सब को बताया नहीं जाता है।।⤵

आप अच्छे तरीके से जानते होंगे की बात को ना बताया जाने के कारण दो ही हो सकते हैं पहला या तो वह गुरु कुछ जानता ही नहीं है और दूसरा या तो उसकी बात जो उसने बताई है सो गलत है।।
तो साथियों क्या ऐसे स्वर्ग मिल पाएगा शांति अहिंसा करुणा मित्रता मानवता और एक दूसरे के प्रति लगाओ ही स्वर्ग का अर्थ है हर मनुष्य हिंसा चोरी व्यभिचार और झूठ नशीले पदार्थ आदि का परित्याग करके धर्म का आचरण करें साथियों वही साक्षात स्वर्ग है।
मनुष्य मन से न बुरा सोचे वाणी से न बुरा कहे और अपनी काया से न बुरा करें वही स्वर्ग है।।

कहते हैं कि स्वर्ग में बहुत अच्छा लगता है परंतु मैं पूछता हूं कि क्या स्वर्ग की व्यवस्था को किसी ने देखा है नहीं देखा बिना देखे फिर कैसे अनुभव कर लिया स्वर्ग है जिस प्रकार आंखों से देखकर रूप और रंग की पहचान की जाती है और जीभ से चखकर 6 रसों की पहचान की जाती है और कानों से सुन कर सात सुरों की पहचान की जाती है त्वचा से स्पर्श करके मनुष्य तत्व की पहचान करता है नाक से सूघ कर गंद की पहचान की जाती है और यह तो सारे अंग मनुष्य के पास ही होते हैं मृत्यु के बाद क्या मनुष्य इन सभी चीजों का अनुभव कर पाएगा।

अर्थात जहां सब कुछ मन के अनुकूल है वही स्वर्ग है अगर नहीं है तो फिर मना कर दो कि मां की गोद में स्वर्ग नहीं है जिस पिता ने तुम्हारे पेट के लिए अपना खून पसीना नष्ट किया क्या उसके अंजुमन में स्वर्ग नहीं है दिन भर के थके मांदे शाम को जब घर वापस आते हो और कहते हो कि वह अब चैन मिला सोचो कि तुम्हारा वह घर स्वर्ग नहीं है।।।।।।।
इस संसार में स्वर्ग कहीं भी नहीं है स्वर्ग है तो यहीं है यहीं है यहीं है।।


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जिन भाइयों को कोई समस्या हो स्वर्ग आदि जैसी चीजों को लेकर तो वह हमसे संपर्क करके अपने सलाह दे सकते हैं और डिस्कस कर सकते हैं मेरा संपर्क सूत्र 9198 9796 17
नमो बुद्धाय साथियो मैं शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

Rahul-Singh-Bau 

ऐतिहासिक नगरी कपिलवस्तु लेखक शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

🌹🌹नमो बुध्दाय 🌹🌹🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃

मुनि कपिल के नाम से कपिलवस्तु है यह ऐतिहासिक नगरी जानी पहचानी ।

साथियों के राजा शुद्धोधन थे थी कपिलवस्तु उनकी राजधानी ।।


2 शुद्धोधन के पिता सिंह हनु थे हुई बाबा जय सेन की अमर कहानी

हुआ शुद्धोधन का ब्याह महामाया से जो उनकी हुई पहली महारानी


3 महामाया के पिता अंजन कोलिया थे देवदह नाम से जिनका गांव बखानी ।

थे सैन्य पराक्रम में पारंगत शुद्धोधन महान योद्धा सेनानी ।।




4 पराक्रम के कारण ही अनुमति पाकर लाए महा प्रजापति रानी

शुद्धोधन और महामाया से जन्मे सिद्धार्थ महाविज्ञानी ।।


5 वह ईशा पूर्व की छठी सदी में हुए संस्थापक बौद्ध धर्म जग ज्ञानी

जिसमें समता समरसता दुख रहित विश्व बंधुत्व की राह बुद्ध ने ठानी


6 अथक परिश्रम से भगवान बुद्ध ने यह वैज्ञानिक धर्म बनाया

हुए जगतगुरु भगवान बुद्ध तभी विश्व गुरु भारत कहलाया ।।


7 कलिंग युद्ध के बाद अशोक महान ने धर्म विजय का पर्व मनाया

जिसमें लाखों ने धम्म किया धारण सब ने बुद्ध शरणम् गच्छामि गाया ।।


8 फिर बेटा महेंद्र बेटी संघमित्रा से श्रीलंका में धर्म प्रचार कराया

बौद्ध धर्म सर्वोपरि मानकर सब ने त्रिशरण पंचशील अपनाया ।।


9 , 84000 उपदेशों का दोनों ने श्रीलंका में शिलालेख लिखवाया

उसी समय दुनिया में भारत सोने की चिड़िया कहलाया ।।।


10 यदि चाहते हो पुनः भारत को खुशहाल बनाना है

इसकी सबसे बड़ी कुंजी है शिक्षा बेटा बेटी को खूब पढ़ाना है ।।।



शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

ग्राम खदिया नगला कुशवाहा

पोस्ट भरखनी थाना पाली तहसील सवाजपुर जिला हरदोई

उत्तर प्रदेश का रहने वाला हू

9198979617

शुक्रवार, 29 नवंबर 2019

मनुस्मृति के सिद्धांत क्या हैं ।। मनुस्‍मृति क्या है?

मनुस्मृति क्या है ?

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मृत पति की चिता पर ज़िंदा पत्नी को जला देते. 8 से 12 वर्ष की मासूम बच्चियों का अधेड़ उम्र के व्यक्ति से ब्याह करने का चलन था. सुहागरात के दिन घुटना टूट जाता, हड्डी सरक जाती, योनि से लगातार खून बहने से मासूम बच्चियां मर जाती !

मनुस्मृति.
पति परमेश्वर है उसका चरण स्पर्श कर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. शिक्षा संपत्ति का तुम्हे अधिकार नही. वासना का विचार करना पाप है वासना पर सिर्फ पुरषों धर्म गुरु और ऋषियों का आरक्षण है. दिन भर पुरे घर का काम करो, सास ससुर की सेवा करो पति की मार खाओ !

पति का मन किया तो लात मारकर घर से निकाल देता !

कोई न्यायालय नही कोई कानून नही कोई संविधान नही, सब कुछ मनुस्मृति के विधि विधान से चल रहा था !

संविधान.
महाराष्ट्र से एक मसीह निकला नाम था डॉ बाबा साहेब आंबेडकर और जिसका मजहब इंसानियत था. इस आंबेडकर के अम्बेडकारवाद ने सबाल्टर्न समुदाय में गजब का जोश भर दिया. मनुस्मृति का दहन कर ब्राह्मणों के रुडीवादी जातिवादि पुरानी गैर बराबरी परंपरा को कड़ी चुनौती दी !

ब्राह्मण धर्म और ग्रंथों की आलोचना की उनके श्रेष्ठ होने की बीमारी को कड़ी फटकार लगाई और सभी वर्गों की स्त्रीयों को बड़ी राजनीतिक मशक्कत के बाद संविधान में पुरुषों के बराबरी का अधिकार दिया !

ब्राह्मणों ने इसका जमकर विरोध किया, कहा डॉ आंबेडकर अछूत है उसे हिन्दू कोड बिल बनाने और लागू करने का बिलकुल भी अधिकार नही,

लेकिन डॉ बाबा साहेब आंबेडकर ने हार नही मानी हिन्दू कोड बिल लागू करवाकर उन्होंने स्त्रीयों को संपत्ति में हक़ और तलाक लेने का अधिकार दिया !

लेकिन महिलाएं भूल गई आज वे जिस मुकाम पर हैं सिर्फ और सिर्फ डॉ बाबा साहेब अंबेड़कर के कारण. महिलाओं को तिरुपति या सबरीमाला नही चैत्य भूमि पर जाकर माथा टेकना चाहिए !

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा 🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸


https://www.youtube.com/playlist?list=PLUDiUJ_KaCeL2IsjlHWC9ONvhn66RSmUG

देखे वीडियो बुद्ध से संबंधित

राहुल सिंह बौद्ध 

बुधवार, 27 नवंबर 2019

मानव जीवन नाशवान है राहुल सिंह बौद्ध



                                        🌷🌷नमो बुध्दाय 🌷🌷

 
 जब आप इस दुनिया से चले जाओगे तो लोग आपको कैसे याद रखेंगे???
  मानव जीवन नाशवान है, अत: इसका हर पल परिवार व समाज के सदकार्यो में लगाये। हमेशा याद रखें कि आपका समाज के प्रति भी कर्ज बाकी है। क्या समाज के बीच आपने कोर्इ पहचान बनार्इ है ???
    जीवन भर दिग्भ्रमित होते रहे और अन्त में एक दिन साँसे बन्द हो जाएगी। आप शून्य से आये थे और शून्य में चले जाओंगे। अत: समाज विकास हेतु समय की मुख्य धारा में रहकर अपने दायित्व निर्वाह के लिए कुछ अमूल्य समय का योगदान अवश्य करे। यदि इसी कार्य के लिए जब आपके जीवन की ऊर्जा शक्ति एवं इच्छा शक्ति काम आए, तो आपका यह जीवन समाज के लिए सार्थक माना जायेगा, सकारात्मक चिंतन मनन से वैचारिक क्रांति लाकर यदि समाज के विकास में चार-चाँद लगते हैं, तो बहुत अच्छा, जिससे समाज की प्रगति है।
    हमको ध्यान रखना होगा कि समाज का सार्वांगीण विकास कैसे हो???
   समाज का युवावर्ग, जो समाज का भावी कर्णधार है, साथ ही साथ अत्यधिक ऊर्जावान भी है, वह अपनी श्रमशीलता से समाज का परिदृष्य बदलने में अहम भूमिका निभाकर सर्वांगीण विकास की धारा में ला सकता है, यही उनका समाज के प्रति परम कर्त्तव्य है। हर युवा को सकल्प करना चाहिए  - बीज हूँ, तो वृक्ष बनूँगा। मेरे फल समाज के काम आए।।                  

सोमवार, 25 नवंबर 2019

khadiya nagla bharkhani


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https://youtu.be/dB_A4_cly8A

माय यूट्यूब चैनल क्लिक करें और देखें बहुत सारे वीडियोस तथा गाने राहुल सिंह बौद्ध  के द्वारा बनाए हुए ।।🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏




 Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸:


1 — भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया मे उजियारा

जहा ज्ञान का दीप जला था अब रहता अंधियारा।

— कारण यहां पर पैदा होते नए-नए भगवान यहां

अपने को अवतार बता दे देते हैं व्याख्यान यहां

नए-नए मजलूमो का होता है निर्माण यहां

इनकी बातों में फंस जाते कुछ भोले इंसान यहां

सो भूल भी नष्ट करा देते हैं देकर ब्याज सहारा

भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया में उजियारा

— आज अनेकों धर्म देश में मनुष्य धर्म से खाली क्यों

भारत था सोने की चिड़िया आई फिर कंगाली क्यों

दूध दही बहता था यहां पर अब यह गंदी नाली क्यों

सत मार्ग पर चलने वाले चलते चाल कुचली क्यों

जहां प्रेम की वर्षा होती अब खून का बहे फुहारा

भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया में उजियारा ।।।

— चारों कोने गुरु बसत है फिर भी ज्ञान का टोटा

आन गिन विद्या है भारत में तहू विद्वानों का टोटा

घर घर में भगवान टंगे हैं फिर भी कल्याण का टोटा

चारों घूंट में गुरु बसत है तो हूं ज्ञान का टोटा

जहां प्रेम से मानुष रहे थे अब वहां भी पति ने मारा

भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया में उजियारा ।।।

— यह सब हानि हुई देश की बौद्ध धर्म के जाने से

सत्य हुआ पामाल कल्पना का यहां जाल बिछाने से

ज्ञान की ज्योति बुझी भारत से बुद्ध का निशान मिटाने से

बड़ा अंधविश्वास यहां पर आर्यों के आ जाने से

देखो यारो इस भारत में बुद्ध बिना नहीं गुजारा

भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया में उजियारा ।।।।।।।।।।



नमो बुध्दाय

।। शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ।।

।।।।। खदिया नगला ।।।।।

।।। भरखनी पाली हरदोई ।।।

9198979617

9559255712



मेरे द्वारा लिखी गई सभी कविताओं को आप राहुल सिंह बौद्ध की कविताएं करके गूगल पर सर्च कर सकते हैं ।।।

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

ग्राम खदिया नगला कुशवाहा

।। भारत के भगवान बुद्ध का दुनिया मे उजियारा ।।

।।।।।।।। नमो बुध्दाय  ।।।।।।।।।

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
ग्राम खदिया नगला

 Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸:


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नमो बुध्दाय साथियो
शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध ।।


भारतीय संस्कृति विषरस भरा कनक घट जैसे तुलसीदास की अर्धाली स्पष्ट करती है। जो भारतीय संस्कृति नारी जाति का नरक का दरवाजा कहा गया है। आदि गुरू शंकराचार्य ने लिखा है नरकस्य द्वार किम्? नर्क का दरवाजा क्या है? स्वयं उत्तर दिया है नारी। अर्थात नारी नरक का दरवाजा है। नारी को पढने का भी अधिकार नही। स्त्री शूद्रों न अधीयताम् अर्थात स्त्री शूद्रों को शिक्षा नही देनी चाहिए। यह कैसी संस्कृति है जिस नारी के गर्भ से आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ। जो मांरूप मे नारी बच्चे का लालन पालन करती है। मूर्ख शंकराचार्य उसे नरक का दरवाजा बतलाता है। सम्पूर्ण शूद्र समाज को शंकराचार्य शिक्षा के अधिकार से बंचित करने की बात करता है। हिंदू धर्म मे क्षत्रियों और बनियों कौ भी पढने का अधिकार नही था। स्वामी विवेकानंद ने लिखा है ऐ मेरे ब्राह्मण भाइयों ज्ञान जीबन की सुरभि है तुमने क्षत्रियों को इतनी शिक्षा दी जिससे बे केवल लड भिड़ सके और बनियों को इतनी शिक्षा दी जिससे बे केवल व्यापार कर सके और शूद्र इनके पास तो तुमने ज्ञान की एक बूंद भी नही पंहुचने दी। चौका तुम्हारा धर्म है और चूल्हा तुम्हारा भगवान मत छुओ मत छुओ यही तुम्हारा दर्शन। नये भारत का उदय होने दो। नये भारत का उदय किसान की कुटिया और मोची की दुकान से होगा।


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राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
ग्राम खदिया नगला
पोस्ट भरखनी थाना पाली तहसील सवायजपुर
जिला हरदोई उत्तर प्रदेश ।।

शनिवार, 23 नवंबर 2019

मनुस्मृति की सच्चाई ग्राम व पोस्ट ब्लाक भरखनी भरखनी भरखनी भरखनी भरखनी भरखनी भरखनी




आईये संक्षिप्‍त में जाने आ‍खिर मनुस्‍मृति में ऐसा है क्‍या?

नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊँचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका – यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे।10/95-98

ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है । इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है , उसका कर्म निष्फल होता है।10/123-124

शूद्र धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है। 10/129-130

जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो , उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नही है। 4/61-62

राजा प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें। 7/37-38

जिस राजा के यहां शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है। 8/22-23

ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए, यह एक निश्चित नियम है, मर्यादा है, लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है। 9/189-190

यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है, जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है, तब दस अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए। 8/271-272

यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे, उसके ऊपर पेशाब कर दे तब उसके होठों को और लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे।  8/281-282

यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए, तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे, तब उसका पैर कटवा दिया जाए। 8/279-280

इस पृथ्वी पर ब्राह्मण–वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है। अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी लाए। 8/381

शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें। 8/271-272

शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न, पहनने को पुराने वस्त्र, बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए ।10/125-126

बिल्ली, नेवला, नीलकण्ठ, मेंढक, कुत्ता, गोह, उल्लू, कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है। 11/131-132

यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए, क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है।

निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए, तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए।


ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है, वह है – गुणगान करते हुए ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना।

शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे, तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगवा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे।

राजा बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री, गृह शय्या, वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे।

जान बूझकर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है, वह 21 जन्मों तक कुत्ते-बिल्ली आदि पाप श्रेणियों में जन्म लेता है।

ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है।

शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते। गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें ।

ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन ले क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है। उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है।

राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं ।

शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है। मुर्दों से उतरे हुए इनके वस्त्र हैं। शूद्र टूटे-फूटे बर्तनों में भोजन करें। शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहने।

यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए ।

दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित, चाण्डाल, मूर्ख और धोबी आदि अंत्यवासी हो, उनके साथ द्विज न रहें। लोहार, निषाद, नट, गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है।

शूद्रों के साथ ब्राह्मण वेदाध्ययन के समय कोई सम्बन्ध नही रखें, चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए।

स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता। यह शास्त्र द्वारा निश्चित है। अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं, वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं, यह शाश्वत नियम है।

अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर ब्राह्मण उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराए।

शूद्रों को बुद्धि नही देनी चाहिए। अर्थात उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही है। शूद्रों को धर्म और व्रत का उपदेश न करें।

जिस प्रकार शास्त्र विधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि, दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं , उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है।

शूद्र की उपस्थिति में वेद पाठ नहीं करनी चाहिए।

ब्राह्मण का नाम शुभ और आदर सूचक, क्षत्रिय का नाम वीरता सूचक, वैश्य का नाम सम्पत्ति सूचक और शूद्र का नाम तिरस्कार सूचक हो।

दस वर्ष के ब्राह्मण को 90 वर्ष का क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र पिता समान समझ कर उसे प्रणाम करे।

मनु के इन कानूनों से अनुमान लगाया जा सकता है कि शूद्रों, अतिशूद्रों और महिलाओं पर किस प्रकार और कितने अमानवीय अत्याचार हुए हैं।

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कुछ बानगी यहां भी देखिये

न शूद्रराज्ये निवसेन्नाधार्मिकजनावृते ।

न पाषण्डिगणाक्रान्ते नोपसृष्टेऽन्त्यजैर्नृभिः ॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 61)

अर्थ – (व्यक्ति को) शूद्र से शासित राज्य में, धर्म-कर्म से विरत जनसमूह के मध्य, पाखंडी लोगों से व्याप्त स्थान में, और अन्त्यजों के निवासस्थल में नहीं वास नहीं करना चाहिए।

न शूद्राय मतिं दद्यान्नोच्छिष्टं न हविष्कृतम्।

न चास्योपदिशेद्धर्मं न चास्य व्रतमादिशेत्॥

(मनुस्मृति, अध्याय 4, श्लोक 80)

अर्थ – किसी प्रयोजन की सिद्धि को ध्यान में रखते हुए दिया जाने वाला उपदेश शूद्र को न दिया जाये। उसे जूठा यानी बचा हुआ भोजन न दे और न यज्ञकर्म से बचा हविष्य प्रदान करे। उसे न तो धार्मिक उपदेश दिया जाये और न ही उससे व्रत रखने की बात की जाये।



डॉ. भीमराव आंबेडकर (14 अप्रैल 1891 – 6 दिसंबर 1956)

खास तौर पर स्त्रियों के संबंध में मनु के आपत्‍त‍िजनक विचार

स्वभाव एष नारीणां  नराणामिहदूषणम .

अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित:

अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि  वा पुनः

प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम

मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्

बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !

अर्थात पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख  ही नहीं विद्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है! पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते।

अस्वतंत्रता: स्त्रियः  कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम

विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे

पिता  रक्षति कौमारे भर्ता यौवने

रक्षन्ति  स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति

सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:

द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:

इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो  धर्ममुत्तमम

यतन्ते भार्या भर्तारो  दुर्बला अपि

अर्थात पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति  तथा वृद्धावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल-ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करता है!



मनुस्मृति की प्रतियां जलाते युवा

न निष्क्रय विसर्गाभ्यांभर्तुभार्या विमुच्यते

एवम धर्म विजानीम: प्राकप्रजापति  निर्मितं!

अर्थात पति द्वारा त्याग दिये जाने तथा किसी दूसरे के हाथ बेच दी जाने पर भी कोई स्त्री दूसरे की पत्नी नहीं कहीं जा सकती। उसके विवाहित पति का उस पर आजन्म अधिकार बना रहेगा।

यस्मैदद्धपित्तात्तात्वेनां भ्राता  चानुमते पितु:

तं शुश्रुषेत जीवन्तं  संस्थितं च न लंघयेत

विशील: कामवृत्तो वा गुनैर्वा परिवर्जित:

उपचर्य:स्त्रिया  साध्व्या सततं देववत्पति:

नास्ति स्त्रीणां प्रथग्यज्ञों न व्रतं नीप्युपोषितम

पतिं शुश्रुषते येन तेन स्वर्गे महीयते

अर्थात स्त्री का पिता अथवा पिता की सहमति से इसका भाई जिस किसी के साथ उसका विवाह कर दे, जीवन-पर्यन्त वह उसकी सेवा में रत रहे और पति के न रहने पर भी पति की मर्यादा का उल्लंघन कभी न करे। स्त्री का पति दु:शील, कामी तथा सभी गुणों से रहित हो तो भी एक साध्वी स्त्री को उसकी सदा देवता के सामान सेवा व पूजा करनी चाहिए। स्त्री को अपने पति से अलग कोई यज्ञ, व्रत या उपवास नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें अपने पति की सेवा-सुश्रुषा से ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है।

मनुस्‍मृति का सबसे ज्‍यादा आपत्तिजनक अध्याय

मनुस्‍मृति का सबसे आपत्तिजनक पहलू यह है कि इसके अधयाय 10 के श्‍लोक संख्‍या 11 से 50 के बीच समस्‍त द्विज को छोड़कर समस्‍त हिन्‍दू जाति को नाजायज संतान बताया गया है। मनु के अनुसार नाजायज जाति दो प्रकार की होती है।

अनुलोम संतान – उच्‍च वर्णीय पुरूष का निम्‍न वर्णीय महिला से संभोग होने पर उत्‍पन्‍न संतानप्रतिलाेम संतान – उच्‍च वर्णीय महिला का निम्‍न वर्णीय पुरूष से संभोग होने पर उत्‍पन्‍न संतान

मनुस्‍मति के अनुसार कुछ जाति की उत्‍पत्ति आप इस तालिका से समझ सकते हैं।

पुरूष की जातिमहिला की जातिसंतान की जातिब्राम्‍हणक्षत्रियमुर्धवस्तिकाक्षत्रियवैश्‍यमहिश्‍वावैश्‍यशूद्रकायस्‍थब्राम्‍हणवैश्‍यअम्‍बष्‍टक्षत्रियब्राम्‍हणसूतवैश्‍यक्षत्रियमगधशूद्रक्षत्रियछत्‍तावैश्‍यब्राम्‍हणवैदहशूद्रब्राम्‍हणचाण्‍डालनिषादशूद्रपुक्‍कसशूद्रनिषादकुक्‍कटछत्‍ताउग्रश्‍वपाकवैदहअम्‍बष्‍टवेणब्राम्‍हणउग्रआवृतब्राम्‍हणअम्‍बष्‍टआभीर

नाेट – इसी प्रकार औशनस एवं शतपथ ब्राम्‍हण ग्रंथ में भी जाति की उत्‍पत्ति का यही आधार बताया गया है जिसमें चामार, ताम्रकार, सोनार, कुम्‍हार, नाई, दर्जी, बढई धीवर एवं तेली शामिल है।

शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध

Rahul Singh bauddha kushwaha khadiya ngla bharkhani


[23/11, 6:52 PM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: *भारतीय शूद्रों को समर्पित आरती संग्रह*

*शूद्र का आंटा, शूद्र का घी,*
*भोग लगाएं पंडित जी।*
*शूद्र बेचारे दान चढावैं,*
*मौज मनावैं पंडित जी।*
*पैदा हो जब शूद्र के बेटा,*
*नाम धरावैं पंडित जी।*
*आरक्षण से मिलल, नौकरी,*
*मनौती पुरावैं पंडित जी।*
*खेत बेंच मन्दिर बनवावैं,*
*पुजारी बनिगैं पंडित जी।*
*शूद्रन के चपरासी बनवावैं,*
*हाकिम बनिगै पन्डित जी।*
*कर्जा लेके घर बनावैं,*
*हवन करावैं पंडित जी।*
*मां-बाप को गाली देवें,*
*पैर दबवावें पंडित जी।*
*बाप के तेरहीं में खेत बिकल,*
*पूड़ी खावें पंडित जी।*
*माई के तेरहीं में घरवो बिकी गै,*
*गौदान करावैं पन्डित जी।*
*शूद्र जी घूमें मन्दिर तीरथ,*
*संसद जाएं पंडित जी।*
*शूद्र क लड़का काँवड़ ढोवै,*
*दिल्ली पढ़वावैं पन्डित जी।*
...
यह केवल अनपढ़ ग्रामीणों की बात नहीं है। पढ़े लिखे डॉक्टर, इंजिनियर, आईएएस, पीसीएस, वकील, जज, अध्यापक, नेता सबका यही हाल है।
🤔🤔🤔🤔🤔
*शूद्रों, अब तो चेतो*
😢😢😢😢😢
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
[24/11, 3:33 AM] Rahul Singh bauddha 🎻🎤🎹🎼🎸: 🔸मनुस्मृति और वैष्णव धर्म


मनुस्मृति और वैष्णव धर्म


01. मनुस्मृति श्लोक 4:18- सेहिया, मछली, बैल, कछुआ और खरगोश' और पांच नाखुन वालों में सिवाय ऊंट को छोडकर इन सभी का मांस खाने योग्य है।

02. मनुस्मृति श्लोक 4:19-
गंदगी खाने वाला सूअर, लहसुन, गाँव का मूर्गा, प्याज, शलगम इनको जानबूझकर खाने से धर्म भ्रष्ट होता है।

03. मनुस्मृति श्लोक 4:30-
. खाने वाले मनुष्य जो किसी भी तरहं खाने योग्य जीव-जानवरों को प्रतिदिन भी खाए तो पाप नहीं लगता। क्योंकि खाने के पदार्थ और खाने वाले जीवों को ब्रह्म ने पैदा किये हैं।

04. मनुस्मृति श्लोक 4:31-
यज्ञ के लिये मांस खाना दैव-विधि कहा गया है। जब्कि शरीर की ताकत बढाने के लिये मांस खाना राक्षस विधि कहा गया है।

05. मनुस्मृति श्लोक 4:36-
ब्राह्मण को चाहिए कि मंत्रो से बिना पवित्र किये गये पशुओं का मांस कभी नहीं खाना चाहिए। हमेशा (सनातन) की विधि में आस्था रखकर मंत्रो से बोलकर किये गये पशुओं को खाएं।

06. मनुस्मृति श्लोक 4:37 - अगर पशु का मांस खाने की इच्छा हो तथा नहीं मिलने पर घी व आटे का पशु बनाकर खा लेना चाहिए।

07. मनुस्मृति श्लोक 4:41 मधुपर्क (शराब), ज्योतिष्टोम आदि यज्ञ तथा पितर व देव कार्य में पशु हिंसा करनी चाहिए।

 🔽🔽शूद्रों की आरती 🔽🔽

गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या की सच्चाई




गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या की सच्चाई 👇


     🔹बाल्मीकि रामायण 🔹

प्रथम खण्ड पेज संख्यसं  126



जैसा कि बताया गया है कि इन्द्र ने अहिल्या के साथ छल करके उसका सतीत्व भंग किया था ।

परन्तु

सबसे प्राचीन रामायण  बाल्मीकि रामायण मे बाल्मीकि ने  स्पष्ट किया है कि

 अहिल्या और इंन्द्र के बीच गौतम ऋषि से छुपकर शारीरिक संबंध थे ।


आइए नजर डालते हैं बाल्मीकि रामायण के स्लोकों पर  👇👇

1 ,, मुनिवेषं सहस्त्राक्ष विज्ञाय रघुनंदन ।
मतिम चकार दुर्मेधा देवराज कुलूहलात ।।।

अर्थ 🔹 महा ऋषि गौतम का वेश धारण करके आए हुए इंद्र को पहचान कर भी उस मतवाली नारी ने अहो देवराज इंद्र मुझे चाहते हैं।
इस कौतूहल वश  उसने उनके साथ समागम का निश्चय करके वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया

🔸सम्भोग के बाद अहिल्या ने जवाब दिया कि 👇👇

स्लोक 🔹
यथाबृवीत् सुर श्रेष्ठं कृतार्थेनान्तरात्मना
कृतार्थास्मि  सुर श्रेष्ठ गच्छ शीघ्र मितः प्रभो, ।
आत्मानम् मां च देवेश सर्वथा गौतमात ।।।

अर्थ 🔸
 रति के पश्चात उसने देवराज इंद्र से संतुष्ट चित्त होकर कहा की
 हे सुर श्रेष्ठ मैं आपके समागम से कृतार्थ हो गई हूं प्रभु अब आप शीघ्र यहां से चले जाइए देवेश्वर महर्षि गौतम के कोप से आप अपनी और मेरी भी सब प्रकार से रक्षा कीजिए ।।

      🔽तब इन्द्र ने कहा 🔽

स्लोक 🔸
इन्द्रस्तु प्रहसन वाक्यंमहल्यामि दमबृवीत ।
सुश्रोणि परितुष्ठो अस्मि गमिस्यामि यथागतम् ।।।

अर्थ 🔹
तब इंद्र ने हंसते हुए अहिल्या से कहा सुंदरी मैं भी संतुष्ट हो गया हूं अब जैसे आया था उसी प्रकार चला जाऊंगा


कोई भी बात बिना सोचे समझे जाने
तथा बिना तर्क किये स्वीकार नही करनी चाहिए, ,,,,,

🌹नमो बुध्दाय 🌹

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध

शुक्रवार, 22 नवंबर 2019

हिन्दू धर्म की सच्चाई राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

महारानी झलकारी बाई जी का इतिहास क्या है






महान वीरांगना झलकारीबाई जयंती : 22 नवंबर
(22.11.1830--4.6.1858)

वीरांगना झलकारी बाई के बारे में डॉ.प्रदीप कुमार “दीप” की कविता...

झलकारी की झलक देखकर, वो बुन्देले भी हाँफ गये……
जब उतरी वो समरभूमि में, गौरे भी थर-थर काँप गये।

जमुना-कोख से पैदा हुई, भोजला गाँव में बड़ी हुई।
जब आया संकट, झाँसी पर, लक्ष्मी के आगे खड़ी हुई।

रानी को रण से भेज दिया, निज बौद्धिक-बल के बूते से।
दुश्मन को धूल चटाई थी, अपने पैरों के जूते से।

समर में थी वो रूकी हुई…अंग्रेज रोज को डाटा था।
निज अश्व हुआ जख्मी तो, कृपाण से दुश्मन काटा था।

वो अबला थी, पर यौद्धा थी, और वीरांगना कहलाई।
मनु के वेश में लड़ी वो तब, फिर लौट के न वो घर आई।

रानी झाँसी को बचा गई, ऐसी नारी थी झलकारी….
“प्रदीप” कवि का प्रणाम उन्हें, है धन्य झलक की महतारी।

रानी की हमशक्ल
देश की महान वीरांगनाओं में एक प्रमुख नाम झलकारी बाई का है। इतिहासकारों के अनुसार झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं। लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं।

बचपन
झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के भोजला गांव में 22 नवंबर, 1830 को एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सदोवा (उर्फ मूलचंद कोली) और माता जमुनाबाई (उर्फ धनिया) था। झलकारी बाई बचपन से ही साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ लड़की थी। जब झलकारी बाई बहुत छोटी थीं तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी और उसके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था। उन्हें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित किया गया था।

साहसी
झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं की देखरेख और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थी। एक बार जंगल में झलकारी की मुठभेड़ एक तेंदुए से हो गई थी और उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से उसको मार डाला था। वह एक वीर साहसी महिला थी।

विवाह
झलकारी का विवाह झांसी की सेना में सिपाही रहे पूरन कोली नामक युवक के साथ हुआ। पूरे गांव वालों ने झलकारी बाई के विवाह में भरपूर सहयोग दिया। विवाह पश्चात वह पूरन के साथ झांसी आ गई।

सेना में भर्ती
एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। वह लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं, इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं।

महानता
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी सूझबूझ परिचय दिया था। रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अपने अंतिम समय अंग्रेजों के हाथों पकड़ी गईं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। जिसके बाद वह किले के बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज़ के शिविर मे उससे मिलने पहँची। ब्रिटिश शिविर में पहुँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती है। रोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होने झांसी पर कब्जा कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है। जनरल ह्यूग रोज़ जो उसे रानी ही समझ रहा था, ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा, मुझे फाँसी दो। जनरल ह्यूग रोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ और झलकारी बाई को रिहा कर दिया गया। इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई। एक बुंदेलखंड किंवदंती है कि झलकारी के इस उत्तर से जनरल ह्यूग रोज़ दंग रह गया और उसने कहा कि 

“यदि भारत की 1% महिलायें भी उसके जैसी हो जायें तो ब्रिटिशों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा।"

ऐसी महान वीरांगना थीं झलकारी बाई। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। झलकारी बाई के सम्मान में 2001 में डाक टिकट भी जारी की है ।।


शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा 

9198979617

रविवार, 17 नवंबर 2019

अंग्रेजी हुकूमत ने स्वतंत्रता दी शूद्रों को

यदुनंदन लाल वर्मा लोधी राजपूत की कविताएं

कविता प्रकाशक शास्त्री राहुल


धर्म 
नफरत हिंसा द्वेष घ्रणा का
                           ढूंढा तो आधार धर्म।
जितना खून बहा हैजग में
                       उसका भी आधार धर्म।
विश्व विवादों की जा जड़ में
                          देखा तो आधार धर्म।
भूख गरीबी औ शोषण का 
                       इनका भी आधार धर्म।1

आतंकवाद का पहन के चोला
                                  करता नर संहार धर्म। 
छल प्रपंच का जाल रचाकर 
                                ठगने का व्यापार धर्म। 
रूढिबाद पाखंड बाद पाषाण.    
                                    बाद का खोल धर्म। 
सारे पाप माफ हो जाते 
                             लगता यह पचनोल धर्म।2

पोप पुजारी जी को करता 
                                 देखो मालामाल धर्म। 
आंख के अंधे भक्तगणो को 
                              करता यह कंगाल धर्म। 
स्वर्ग नर्क भगवान भाग्य 
                       का फैला यह भ्रमजाल धर्म। 
तीर्थ औ ब्रत मे जा देखा 
                             पोपो की हर चाल धर्म। 3

गांधी को गोली से उड़ाया 
                            इसका भी आधार धर्म।
 ईसा को सूली पे चढाया
                            इसका भी आधार धर्म।
 ब्रूनो को जिंदा था जलाया
                            इसका भी आधार धर्म। 
मोहम्मद साहब को भी सताया 
                             इसका भी आधार धर्म। 4

किया अहिल्या का मुंह काला 
                             इसका भी आधार धर्म। 
एकलव्य का कटा अंगूठा 
                             इसका भी आधार धर्म। 
सति बृंदा के सत को लूटा 
                             इसका भी आधार धर्म। 
 बचा कौन दुष्कर्म जगत मे 
                            न जिसका आधार धर्म। 5

मंदिर मस्जिद बैर बढाते 
                               इतना तो शैतान धर्म। 
इनसे तो अच्छी मधुशाला 
                             इतना तो बदनाम धर्म। 
तर्क इसे न अच्छा लगता 
                         अक्ल पे ताला पडा धर्म। 
सुदंर सुघर सलोना मुखड़ा 
                        दिल का काला किंतु धर्म। 6

ढोंगी औ पाखंडी कहते 
                            हिंदू सिख इस्लाम धर्म। 
संत फकीर सभी यह कहते 
                                ईसा मूसा राम धर्म। 
ज्ञानी ध्यानी सब जन कहते 
                              वेद पुरान कुरान धर्म। 
सौ बातो की बात एक है 
                              मानव का इंसान धर्म।। 7

कोई कहता है आचार धर्म 
                      कोई कहता है व्यवहार धर्म। 
पर मेरी समझ मे यह आया 
                     बस मानव का उपकार धर्म। 
मानव सेवा ईश्वर सेबा 
                         मानवता ही है सार धर्म। 
कबिरा ने सिखाया प्यार धर्म 
                       बरना आडम्बर यार धर्म। 8

यदुनंदन लाल लोधी हरदोई







धर्म 
नफरत हिंसा द्वेष घ्रणा का
                           ढूंढा तो आधार धर्म।
जितना खून बहा हैजग में
                       उसका भी आधार धर्म।
विश्व विवादों की जा जड़ में
                          देखा तो आधार धर्म।
भूख गरीबी औ शोषण का 
                       इनका भी आधार धर्म।1

आतंकवाद का पहन के चोला
                                  करता नर संहार धर्म। 
छल प्रपंच का जाल रचाकर 
                                ठगने का व्यापार धर्म। 
रूढिबाद पाखंड बाद पाषाण.    
                                    बाद का खोल धर्म। 
सारे पाप माफ हो जाते 
                             लगता यह पचनोल धर्म।2

पोप पुजारी जी को करता 
                                 देखो मालामाल धर्म। 
आंख के अंधे भक्तगणो को 
                              करता यह कंगाल धर्म। 
स्वर्ग नर्क भगवान भाग्य 
                       का फैला यह भ्रमजाल धर्म। 
तीर्थ औ ब्रत मे जा देखा 
                             पोपो की हर चाल धर्म। 3

गांधी को गोली से उड़ाया 
                            इसका भी आधार धर्म।
 ईसा को सूली पे चढाया
                            इसका भी आधार धर्म।
 ब्रूनो को जिंदा था जलाया
                            इसका भी आधार धर्म। 
मोहम्मद साहब को भी सताया 
                             इसका भी आधार धर्म। 4

किया अहिल्या का मुंह काला 
                             इसका भी आधार धर्म। 
एकलव्य का कटा अंगूठा 
                             इसका भी आधार धर्म। 
सति बृंदा के सत को लूटा 
                             इसका भी आधार धर्म। 
 बचा कौन दुष्कर्म जगत मे 
                            न जिसका आधार धर्म। 5

मंदिर मस्जिद बैर बढाते 
                               इतना तो शैतान धर्म। 
इनसे तो अच्छी मधुशाला 
                             इतना तो बदनाम धर्म। 
तर्क इसे न अच्छा लगता 
                         अक्ल पे ताला पडा धर्म। 
सुदंर सुघर सलोना मुखड़ा 
                        दिल का काला किंतु धर्म। 6

ढोंगी औ पाखंडी कहते 
                            हिंदू सिख इस्लाम धर्म। 
संत फकीर सभी यह कहते 
                                ईसा मूसा राम धर्म। 
ज्ञानी ध्यानी सब जन कहते 
                              वेद पुरान कुरान धर्म। 
सौ बातो की बात एक है 
                              मानव का इंसान धर्म।। 7

कोई कहता है आचार धर्म 
                      कोई कहता है व्यवहार धर्म। 
पर मेरी समझ मे यह आया 
                     बस मानव का उपकार धर्म। 
मानव सेवा ईश्वर सेबा 
                         मानवता ही है सार धर्म। 
कबिरा ने सिखाया प्यार धर्म 
                       बरना आडम्बर यार धर्म। 8

यदुनंदन लाल लोधी हरदोई

रविवार, 10 नवंबर 2019

तथागत बुध्द और ब्राह्मण के बीच तर्क


शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला ।।

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.*_¶  ब्राह्मण : मै जन्म से श्रेष्ठ हूँ।
.*_¶  बुध्द     : कैसे ?
.*_¶  ब्राह्मण : क्योंकि मै ब्राह्मण हूँ।
.*_¶  बुद्ध     : ठीक है, अच्छा एक बात बताइए आपके घर की महिलाए गर्भवती होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ होती है।
.*_¶  बुद्ध     : वैसे हि होती है, जैसे अन्य महिलाए होती है, या फिर कुछ अगल से ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ वैसे हि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : आपकी महिलाओं की गर्भावस्था उतने हि समय कि होती है, जितने समय कि, अन्य महिलाओं की होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ उतने हि समय कि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : बच्चे के जन्म लेने कि प्रक्रिया अर्थात प्रसूति भी लगभग वैसे हि होती है, जैसे अन्य महिलाओ के जरिए होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ वैसे हि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : जब गर्भवती होने का तरीका, गर्भावस्था का समय और बच्चा प्रसूति का भी तरीका, ये सभीं प्रक्रियाएंँ एक हि समान है,
.*_¶  तो आप ब्राह्मण अपने आप को, किस आधार पर कहते है, कि हम ब्राह्मण पैदा होते, हि अर्थात जन्म से हि सर्व श्रेष्ठ होते है ......???
.*_¶  बुद्ध के इस प्रश्न का, ब्राह्मण के पास कोई उत्तर नही था .....
.*_¶  बुद्ध     : मतलब यह है, कि मानव अपने ऊच्च कर्म से श्रेष्ठ है अपने ऊच्चकर्म से हि महान है, ना कि जन्म से कोई भी सर्वश्रेष्ठ है.....

.*_¶  ब्राह्मण का राज उनके ज्ञान पर नहीं बल्की तुम्हारी अज्ञानता पर टिका है।
.*_¶  ब्राह्मण तुमसे पेड़ पुजवा सकता है,
पत्थर पुजवा सकता है, धरती, आकाश, जल, अग्नि, वायु, देहरी (चौखट), तस्वीर, लोहा, ईंट, पशु, पक्षी या जो कुछ भी उसे दिखाई दिया।
.*_¶  उसने तुमसे खुले आम पुजवा दिया।
और ये सब एक अनपढ़ ब्राह्मण ने, आपके पढ़े लिखे IAS, IPS, वक़ील, मजिस्ट्रेट, इंजीनियर, डॉक्टर शिक्षित लोगों से करवाया है।
.*_¶  फिर भी आप कैसे कह सकते हैं, कि आप ब्राह्मण के ग़ुलाम नही हैं ??

.*_¶  ब्राह्मणों की कहानी :
.*_¶  जब भूकम्प आने वाला हो तो उनको कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब हुदहुद तूफान आने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब ट्रेन पलटने वाली या लड़ने वाली हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब नोट बदलने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब अपने देश पर हमला होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब देश मे बंम बिस्फोट होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब केदार नाथ बाढ़ मे बह जाने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब भारत की राजधानी में किसी बस में लड़की का रेप होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब देश मे आतंकवादी घूम रहे होते तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब सीमा के सैनिकों का गला कटने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नही होता,
.*_¶  जब चारों धाम जाते समय यात्री बस खाई मे गिरने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब कोई प्लेन लुप्त होने वाली हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब बारिश होने पर बिजली कड़कने वाली हो और किसी के ऊपर बिजली गिरने वाली हो तो इन्हें कुछ भी पता नहीं होता।

.*_¶  इनको केवल वह जरुर पता होता है, जो वास्तविकता में सम्भव हि नहीं है।
.*_¶  जैसे,.............
.*_¶  किसी पर ग्रह नक्षत्र दोष, पिछले जन्म का पाप, मरने के बाद स्वर्ग दिलाना,
.*_¶  माता-पिता को मरने के बाद बैठाना, बच्चे को सत्तईसा में पड़ना, आदि सभीं प्रकार कि अन्ध विश्वास और मनगढंत बातें।
.*_¶  जिनको पिछले जन्म की और स्वर्ग की जानकारी हो, वे ये सब क्यों नहीं जानते ?
.*_¶  इसलिए नहीं जानते है, क्योंकि ये सब देखे जा सकते हैं, हक़ीकत जाना जा सकता है।
.*_¶  अंधविश्वास या अंधश्रद्धा समाज और देश के लिये, एक विकृत कलंकित अभिशाप है,
.*_¶  अर्थात सर्व सामान्य समाज के लोग कोई भी जन्म से नही, बक्लि कर्म से श्रेष्ठ होते है।