सोमवार, 30 दिसंबर 2019

भारत के प्रथम विद्वान डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर



भारत के प्रथम विद्वान डॉ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर
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सबसे महान भारतीय या महानतम भारतीय (अंग्रेजी: The Greatest Indian) रिलायंस मोबाइल द्वारा प्रायोजित एक सर्वेक्षण हैं, जो सीएनएन आईबीएन व हिस्ट्री चैनल के साथ साझेदारी में, और आउटलुक पत्रिका द्वारा आयोजित किया गया था। आधुनिक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में महत्त्वपुर्ण योगदान और भारतीयों के जीवन में अद्वितीय असाधारण बदलाव लाने वाला महानतम शख्सियत खोजने के लिए भारत में दि ग्रेटेस्ट इंडियन या सबसे महानतम भारतीय इस कार्यक्रम का जनमत सर्वेक्षण जून 2012 सेअगस्त 2012 के बीच आयोजित किया गया था। सर्वेक्षण मेंडॉ॰ भीमराव आंबेडकर विजेता घोषित हुए हैं। उन्हें करीब 2 करोड़ वोट प्राप्त हुये थे।[1]

इस सर्वेक्षण में पहले भारत के विभिन्न छेत्रों (जैसे, कला, राजनिती, अर्थशास्त्र, समाज सेवा, खेल, उद्योग, संगीत आदी) के 100 महान हस्तियों की सूची बनाई गई, जिनमें से 50 नाम सर्वेक्षण के ज्यूरी के जरीये चूने गये। उसके बाद इन 50 भारतीयों के लिये लोगों के वोट लिये गये, और उनमें से सर्वाधिक वोट मिले हैं ऐसे 10 नाम अंतिम राऊंड के लिये चूने गये। इन 10 नामों के लिए एक बार फिर सभी नागरिकों द्वारा की गई अंतरराष्ट्रीय ऑनलाईन वोटिंग ओपन की गई, जिसमें सर्वाधिक मतदान डॉ॰ भीमराव आंबेडकर को मिले थे, वो सबसे महानतम भारतीय के रूप में चुने गयें। भारत की स्वतंत्रता के बाद सबसे महानतम भारतीय तथा सबसे लोकप्रिय भारतीय डॉ॰ भीमराव आंबेडकर हैं।

महानतम ब्रिटेन स्पिन के अन्य संस्करणों के विपरीत,महानतम भारतीय इतिहास के सभी समय अवधि से लोगों को शामिल नहीं किया था। दो कारणों से इस चुनाव के लिए दिए गए थे। इसमें महात्मा गांधी को नहीं लिया गया, उन्हें बिना सर्वेक्षण के महान बना दिया, नहीं तो विशेष रूप से आंबेडकर और गांधी में उनके वोटों की तुलना होती। सर्वेक्षण पैनल के विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अगर गांधी सूची में शामिल हो गए होते, तो वहाँ द ग्रेटेस्ट इंडियन के शीर्षक के लिए कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होती। ग्रेटेस्ट इंडियन एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में भारत पर ध्यान केंद्रित करने के लिए चुने है। भारतीयों ने वोटिंग के जरीए आंबेडकर का महानतम भारतीय के रुप में चयन किया।[2]

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी पाली हरदोई
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शनिवार, 28 दिसंबर 2019

कुशवाहा कोई जाति नहीं और ना ही कोई वंश है कुशवाहों का असली इतिहास



कुशवाह / कुशवाहा शब्द की उत्त्पत्ति सन् 1911 में आगरा की मीटिंग में हुई ।

 इस मीटिंग में निर्णय किया गया कि कैसे *शाक -सब्जी -फूल -फल* उगाने वाली जातियों को एक नाम से जाना जाए, जिससे उनकी कोई एक पहचान बने । *कु = काछी, कोईरी, कुरी* *श = शाक्य, सैनी* *वा = वर्मा* *हा = हार्डिया* *लेकर एक नाम बनाया गया —कुशवाहा या कुशवाह...* √ बाद में जेपी चौधरी जैसे मनुवादी ने इस शब्द को *काल्पनिक रामायण के पात्र कुश और लव* से जोड़कर क्षत्रिय साबित करने का प्रयास किया | लेकिन हिन्दू ग्रंथ और मनुवादियों ने आज तक कुशवाह को शुद्र ही माना है । *हिन्दू ग्रंथ रामायण में "भगवान बुद्ध और उनके अनुयायियों" को चोर और "दुर्गा सप्तशती" (जिससे कथा होता है) में मौर्यों को असुर/ राक्षस बताया गया है |* यानि कथा कहवाने वाले हमारे पूर्वजों और हमलोगों को संस्कृत में गाली देते हैं | दिलचस्प बात यह है कि हमलोग खुश होते हैं और बकायदा कथा कहने के एवज में उसे धन भी देते हैं | ऐसे धर्म जिसमें गालियों से स्वागत है, वैसा धर्म हमलोगों का नहीं हो सकता है | √ जैसे ही जेपी चौधरी ने कुशवाह को *कुश और लव* से जोड़ा तो समाज जुड़ने के बजाय टूट गया । न ये उपनाम शाक्य, सैनी; न काछी, कोईरी; न वर्मा; और न ही हार्डिया, मौर्य ने अपनाया । √ क्योंकि *शाक्य और मौर्य वंश* का इतिहास बहुत ही गौरवशाली है और हमेशा रहेगा | जिसकी उपजातियों के अन्तर्गत सैनी, वर्मा, काछी, हार्डिया, कोईरी, मुराव, मुराऊ, कुशवाहा, पटेल, फूले, माली, महतो, रेड्डी, सक्सेना, कछवाहा, सुराव, मुराव आते हैं | इनकी पहचान के लिए किसी *काल्पनिक रामायण के कुश और लव* की जरूरत नही है | √ *जिस दिन ये सभी अपनी शक्ति को पहचान गये और जान गये कि ये सब एक हैं और भगवान बुद्ध, सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक महान और सम्राट बृहद्रथ मौर्य के वंशज हैं उस दिन काल्पनिकों और विदेशी आर्यों को अपने स्वयं के देश यूरेशिया भागना पड़ेगा | *√☸*मौर्य शासकों की सूची* (323 -184) ईसा पूर्व 1) *सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य* 2) *सम्राट बिन्दुसार मौर्य* 3) *सम्राट अशोक महान* 4) *सम्राट कुणाल मौर्य* 5) *सम्राट दशरथ मौर्य* 6) *सम्राट सम्प्रति मौर्य* 7) *सम्राट शालिसुक मौर्य* 8) *सम्राट देववर्मन मौर्य* 9) *सम्राट शतधन्वन मौर्य* 10) *सम्राट बृहद्रथ मौर्य* √ मौर्य साम्राज्य के अन्तिम *बौद्ध सम्राट बृहद्रथ मौर्य* को ही आर्यों ने *रावण* बनाया तथा सम्राट बृहद्रथ मौर्य के हत्यारे *ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग को "राम"* के रूप में प्रचारित किया | यह मौर्य वंश के 10 वें बौद्ध सम्राट बृहद्रथ मौर्य को मारकर उसके 10 पीढ़ियों के अस्तित्व को समाप्त करने के कारण दशहरा (दस हरा = दस को मारने वाला) नाम प्रचारित किया गया | √☸इसलिए आप सभी लोग इसे *सम्राट अशोक विजयादशमी* के रूप में मनाये | जिस प्रकार सम्राट अशोक महान इस दिन बौद्ध धम्म में दीक्षित हुए थे | और अशांति पर शांति की, हिंसा पर अहिंसा की, क्रोध पर करूणा की विजय हुई | जिसे विजयकाल कहा गया और उसी दिन से यह दिन राष्ट्रीय पर्व बन गया | सम्राट अशोक स्वयं इस पर्व में भाग लेते थे | यह दिन *धम्म विजय* का पर्व बन गया | इसी प्रकार हमें भी *सम्राट अशोक विजयादशमी* के दिन अधिक से अधिक *बौद्ध धम्म दीक्षा* समारोह करना चाहिए | √☸आज भी इस पर्व को संपूर्ण एशिया में बौद्ध उपासक व मौर्य/शाक्य वंशज *सम्राट अशोक विजयादशमी* के रूप में प्रति वर्ष दशहरे के दिन बड़ी श्रद्धा और धूम -धाम से मनाते हैं | ☸☸☸☸☸☸☸☸ ☸

*आप सभी का दिन मंगलमय हो


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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाह 

शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

ग्राम सभा भरखनी के प्रधान पति महेश शर्मा की दबंगई






पाली, हरदोई । ग्राम पंचायत में अवैध तरीके से हो रहे निर्माण कार्य की फ़ोटो खींचना स्थानीय युवक को भारी पड़ गया। आरोप हैं कि दबंग प्रधान और उसके साथियों ने पीड़ित युवक की जमकर पिटाई कर दी साथ ही उसका मोबाइल व नगदी भी छीन ली।

मामला पाली थाना क्षेत्र के गांव भरखनी के मजरा गैहाई का हैं। यहां के श्याम सिंह का आरोप हैं कि गांव में कराये जा रहे विकास कार्यो में ग्राम प्रधान ने बड़े पैमाने पर गोलमाल किया हैं। पीड़ित के मुताबिक प्रधानपति महेश शर्मा एक दबंग व्यक्ति हैं। पीड़ित के मुताबिक वुधवार को दोपहर करीब एक बजे मनरेगा योजना अंतर्गत सड़क निर्माण के लिए जेसीबी से मिट्टी की खुदाई की जा रही थी, जो कि पूरी तरह से नियम विरुद्ध है। आरोप हैं कि जब मिट्टी खुदाई में लगी जेसीबी की फ़ोटो खींचने पीड़ित का भतीजा सुनील कुमार पुत्र नरेशबाबू पहुंचा

तो प्रधानपति महेश शर्मा ने

अपने साथियों के साथ मिलकर सुनील को पकड़ लिया, और उसकी लात-घूंसों व डंडो से जमकर पिटाई कर दी। आरोप हैं कि साथ ही दबंग हमलावरो ने सुनील का मोबाइल फोन व नगदी भी छीन ली। पीड़ित के मुताबिक जब वह अपने भतीजे को लेकर पाली थाने रिपोर्ट दर्ज कराने आ रहा था तो प्रधानपति ने पुनः घेराबंदी की जिसके चलते पीड़ित छिपते छिपाते जिला मुख्यालय की ओर निकल गया। पीड़ित श्याम सिंह के मुताबिक वह पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाने जा रहे हैं, उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानपति काफी प्रभावशाली और दबंग व्यक्ति हैं। वह लोग लगातार पीड़ित और उसके परिवार को धमका रहे हैं।

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अपना दीपक स्वयं बनो
नमो बुद्धाय
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बुधवार, 25 दिसंबर 2019

हीनयान और महायान किसे कहते हैं ,,ग्राम भरखनी 2019



परमात्मा!
कौन है ? कहाँ रहता है ? करता क्या है ?
आज तक मैं नहीं जान पाया हूँ फिर भी लोग कहते हैं परमात्मा पर विश्वास करो, मगर कैसे ? और क्यों  ?
परमात्मा को खोजने के लिए मैंने बहुत से धर्मग्रंथों का सहारा लिया, मैं जितना परमात्मा के करीब जाता गया परमात्मा मेरी बुद्धि से उतना ही दूर होता चला गया!
सब धर्मग्रंथ कहते हैं परमात्मा ने सृष्टि की रचना की, सभी प्राणियों को जीवन और मृत्यु के चक्र में स्थापित किया, सबको बुद्धि और विवेक से अलंकृत किया, परमात्मा सर्वशक्तिमान है बगैरह बगैरह !
परन्तु इसी परमात्मा की शक्ति सुनामी, भूकंप या किसी बड़ी दुर्घटना के समय कहाँ खो जाती है ?
आजतक कभी किसी गंभीर बीमारी का इलाज इसी परमात्मा के मंत्रों से संभव हुआ है ?
जो परमात्मा किसी भूखे मनुष्य को एक वक्त का भोजन मुहैया नहीं करा सकता है उस पर विश्वास करना मूर्खता नहीं तो क्या है ?
सिर्फ ये विश्वास करना कि कोई मेरे साथ हो ना हो परमात्मा सदैव मेरे साथ है तो भइया जिसका होना ना होने के बराबर हो उस पर विश्वास करने से बेहतर है स्वयं पर विश्वास करो!
हिन्दू धर्मग्रंथों में ब्रह्मा को परमात्मा कहा गया है
भविष्‍यपुराण में उल्लेख आता है कि ब्रह्म्रा, विष्‍णु और महेश ने क्रमशः अपनी पुत्री, माता और बहन को पत्नी बना कर श्रेष्‍ठ पद प्राप्त किया ।
 स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !
भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!
– प्रतिसर्ग खं. 4,18,27
अर्थात ब्रह्मा अपनी लड़की को, विष्‍णु देव अपनी माता को और शंभु अपनी बहन को ग्रहण कर के श्रेष्‍ठ पद को प्राप्‍त हुए ।
अब भी यही सब देवता आपके परमात्मा हैं ? तो बहुत अच्छी बात है मुझे व्यभिचारी, बलात्कारी परमात्मा की कोई आवश्यकता नहीं है !
ना तो कोई आजतक ये बता सका कि परमात्मा रहता कहाँ है सब कहते हैं परमात्मा का निवास कण कण में है अगर ऐसा है तो मनुष्यों की सहायता करने के लिए उसे तुरंत उपस्थित होना चाहिए कभी हुआ क्या ?
ना होगा!
इसीलिए मैं कहता हूँ स्वयं को समझो, अपनी शक्ति को

 पहचानो, आप ही सत्य हो!

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी
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हीनयान और महायान क्या है ?



🌹नमो बुध्दाय 🌹
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भगवान बुद्ध के निर्वाण के मात्र 100 वर्ष बाद ही बौद्धों में मतभेद उभरकर सामने आने लगे थे। वैशाली में सम्पन्न द्वितीय बौद्ध संगीति में थेर भिक्षुओं ने मतभेद रखने वाले भिक्षुओं को संघ से बाहर निकाल दिया। अलग हुए इन भिक्षुओं ने उसी समय अपना अलग संघ बनाकर स्वयं को 'महासांघिक' और जिन्होंने निकाला था उन्हें 'हीनसांघिक' नाम दिया जिसने कालांतर में महायान और हीनयान का रूप धारण कर किया।

सम्राट अशोक ने 249 ई.पू. में पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन कराया जिसमें भगवान बुद्ध के वचनों को संकलित किया ‍गया। इस बौद्ध संगीति में पालि तिपिटक (त्रिपिटक) का संकलन हुआ। श्रीलंका में प्रथम शती ई.पू. में पालि तिपिटक को सर्वप्रथम लिपिबद्ध किया गया था। यही पालि तिपिटक अब सर्वाधिक प्राचीन तिपिटक के रूप में उपलब्ध है।

महायान के भिक्षु मानते थे हीनयान के दोषों और अंतर्विरोधों को दूर करने के लिए बुद्ध द्वारा उपदेशित अद्वैतवाद की पुन: स्थापना की जानी चाहिए। अद्वैतवाद का संबंध वेद और उपनिषदों से है। महायान के सर्वाधिक प्रचीन उपलब्ध ग्रंथ 'महायान वैपुल्य सूत्र' है जिसमें प्रज्ञापारमिताएँ और सद्धर्मपुण्डरीक आदि अत्यंत प्राचीन हैं। इसमें 'शून्यवाद' का विस्तृत प्रतिपादन है।


हीनयान को थेरवाद, स्थिरवाद भी कहते हैं। तृतीय संगीति के बाद से ही भारत में इस सम्प्रदाय का लोप होने लगा था। थेरवाद की जगह सर्वास्तित्ववाद या वैभाषिक सम्प्रदाय ने जोर पकड़ा जिसके ग्रंथ मूल संस्कृत में थे लेकिन वे अब लुप्त हो चुके हैं फिर भी चीनी भाषा में उक्त दर्शन के ग्रंथ सुरक्षित हैं। वैभाषिकों में कुछ मतभेद चले तो एक नई शाखा फूट पड़ी जिसे सौत्रान्तिक मत कहा जाने लगा।

हीनयान का दर्शन : हीनयान का आधार मार्ग आष्टांगिक है। वे जीवन को कष्टमय और क्षणभंगूर मानते हैं। इन कष्टों से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को स्वयं ही प्रयास करना होगा क्योंकि आपकी सहायता करने के लिए न कोई ईश्वर है, न देवी और न ही कोई देवता। बुद्ध की उपासना करना भी हीनयान विरुद्ध कर्म है।

खुद मरे बगैर स्वर्ग नहीं मिलेगा इसीलिए जंगल में तपस्या करो। जीवन के हर मोर्चे पर पराक्रम करो। पूजा, पाठ, ज्योतिष और प्रार्थना सब व्यर्थ है, यह सिर्फ सुख का भ्रम पैदा करते हैं और दिमाग को दुविधा में डालते हैं। शाश्वत सुख की प्राप्ति के लिए स्वयं को ही प्रयास करना होगा।

हीनयान कई मतों में विभाजित था। माना जाता है कि इसके कुल अट्ठारह मत थे जिनमें से प्रमुख तीन हैं- थेरवाद (‍स्थविरवाद), सर्वास्तित्ववाद (वैभाषिक) और सौतांत्रिक।


हीनयान के सिद्धांतों के अनुसार बुद्ध एक महापुरुष थे। उन्होंने अपने प्रयत्नों से निर्वाण प्राप्त कर निर्वाण प्राप्ति का उपदेश दिया। हीनयान अनीश्वरवादी और कर्मप्रधान दर्शन है। भाग्यवाद जीवन का दुश्मन है।

महायान : महायान ने बुद्ध को ईश्वरतुल्य माना। सभी प्राणी बुद्धत्व को प्राप्त कर सकते हैं। दुःख है तो बहुत ही सहज तरीके से उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। पूजा-पाठ भले ही न करें लेकिन प्रार्थना में शक्ति है और सामूहिक रूप से ‍की गई प्रार्थना से कष्ट दूर होते हैं।

आत्मा को सभी कष्टों से छुटकारा पाकर जन्म-मरण के चक्र से बाहर निकलना है तो बुद्ध द्वारा निर्वाण प्राप्ति के जो साधन बताए गए हैं उन्हें अनुशासनबद्ध होकर करें।

महायान भी कई मतों में विभाजित है। महायान अष्वघोष के ग्रंथों और नागार्जुन के माध्यमिक और असंग के योगाचार्य के रूप में महायान के विकसित रूप की स्थापना हुई।

महायान एक विशाल यान अर्थात जलपोत के समान है, जिसमें कई लोग बैठकर संसार सागर को पार कर सकते हैं, इसीलिए वे सर्वमुक्ति की बात करते हैं। बुद्ध को भगवान मानते हैं और उनके कई अवतारों के होने की घोषणा भी करते हैं।

महायानियों ने ही संसारभर में बुद्ध की मूर्ति और प्रार्थना के लिए स्तूपों का निर्माण किया। यूनानी, ईसाई, पारसी और अन्य धर्मानुयायी महायानियों की प्रार्थना पद्धति, स्तूप रचना, संघ व्यवस्था, रहन-सहन और पहनावे से प्रभावित थे। उन्होंने महायानियों की तरह ही उक्त सभी व्यवस्थाओं की स्थापना की।

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
खदिया नगला हरदोई
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मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

परमात्मा कहां रहता है कैसा है परमात्मा



https://rahulbauddha563.blogspot.com/?m=1

परमात्मा!
कौन है ? कहाँ रहता है ? करता क्या है ?
आज तक मैं नहीं जान पाया हूँ फिर भी लोग कहते हैं परमात्मा पर विश्वास करो, मगर कैसे ? और क्यों  ?
परमात्मा को खोजने के लिए मैंने बहुत से धर्मग्रंथों का सहारा लिया, मैं जितना परमात्मा के करीब जाता गया परमात्मा मेरी बुद्धि से उतना ही दूर होता चला गया!
सब धर्मग्रंथ कहते हैं परमात्मा ने सृष्टि की रचना की, सभी प्राणियों को जीवन और मृत्यु के चक्र में स्थापित किया, सबको बुद्धि और विवेक से अलंकृत किया, परमात्मा सर्वशक्तिमान है बगैरह बगैरह !
परन्तु इसी परमात्मा की शक्ति सुनामी, भूकंप या किसी बड़ी दुर्घटना के समय कहाँ खो जाती है ?
आजतक कभी किसी गंभीर बीमारी का इलाज इसी परमात्मा के मंत्रों से संभव हुआ है ?
जो परमात्मा किसी भूखे मनुष्य को एक वक्त का भोजन मुहैया नहीं करा सकता है उस पर विश्वास करना मूर्खता नहीं तो क्या है ?
सिर्फ ये विश्वास करना कि कोई मेरे साथ हो ना हो परमात्मा सदैव मेरे साथ है तो भइया जिसका होना ना होने के बराबर हो उस पर विश्वास करने से बेहतर है स्वयं पर विश्वास करो!
हिन्दू धर्मग्रंथों में ब्रह्मा को परमात्मा कहा गया है
भविष्‍यपुराण में उल्लेख आता है कि ब्रह्म्रा, विष्‍णु और महेश ने क्रमशः अपनी पुत्री, माता और बहन को पत्नी बना कर श्रेष्‍ठ पद प्राप्त किया ।
 स्वकीयां च सुतां ब्रह्मा विश्णु देवो मातरम् !
भगिनीं भगवा´छंभु गृहीत्वा श्रेश्ठतामगात् !!
– प्रतिसर्ग खं. 4,18,27
अर्थात ब्रह्मा अपनी लड़की को, विष्‍णु देव अपनी माता को और शंभु अपनी बहन को ग्रहण कर के श्रेष्‍ठ पद को प्राप्‍त हुए ।
अब भी यही सब देवता आपके परमात्मा हैं ? तो बहुत अच्छी बात है मुझे व्यभिचारी, बलात्कारी परमात्मा की कोई आवश्यकता नहीं है !
ना तो कोई आजतक ये बता सका कि परमात्मा रहता कहाँ है सब कहते हैं परमात्मा का निवास कण कण में है अगर ऐसा है तो मनुष्यों की सहायता करने के लिए उसे तुरंत उपस्थित होना चाहिए कभी हुआ क्या ?
ना होगा!
इसीलिए मैं कहता हूँ स्वयं को समझो, अपनी शक्ति को

 पहचानो, आप ही सत्य हो!

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी
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कुशवाहा वंश की वंशावली,, मौर्य वंश की वंशावली,,शाक्य वंश की वंशावली


शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा 


मौर्य वंश की उत्पत्ति एवं
कुशवाह कौन हैं ?
एक बात बहुत ही साभार के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ जिस पर बहुत ही अन्वेषण भी किया है मैंने

।बंधुओं के ज्ञान वर्धन और सम्यक दर्शन के लिए रहा नहीं जा रहा है तो कह रहा हूँ कि
कुशवाह और मौर्यों की पुरातन उत्पत्ति भगवान गोतम बुद्ध के पूर्व की क्या है ?

वास्तव में भारत अर्थात पुराना जम्मूद्वीप में अर्थात सिंधु देश में बहुत ही पुरातन सुव्यवस्थित संस्कृति रही है जिसका विनाश मूर्ख मनुष्यों ने जो अग्निपूजक जरथुस्त्र ईरानियन खाड़ी के सजायाफ्ता मुजरिम देशनिकाला लोगों ने किया ,; सिंधु उपत्यका में ही शरण लेकर , उसका वही स्वरुप हमें मुग़लों और अंग्रेजों द्वारा भारत में घुसपैठ कर राज्य किये इतिहास से तुलनात्मक अध्ययन से महसूस हो जाता है ।
तो कह मैं ये रहा था कि भारत में जो भी आज सम्प्रदाय दिखाई देते हैं जो भारतीय अध्यात्म पर आधारित हैं वे सब पुरातन समण परम्परा यानि आज की बौद्ध सम्प्रदाय से पुनरुत्पन्न हुए हैं , चाहे वे मूर्ख ब्राह्मणवादी पुरोहित संस्कृति के पोषक तत्वों के सम्प्रदाय हों या अन्य ही ।
परंतु सिंधु उपत्यका में अर्थात पुरातन सनातन काल से भारतीय भाषाएँ सभी प्राकृत की बेटियां हैं संस्कृत भी ।
तो जब भगवान गोतम बुद्ध ने अपने महापरिनिब्बान की घोषणा तीन माह पूर्व ही कर दी थी तो अपने शरीर को त्यागने अर्थात महानिब्बान करने के लिए कुशीनारा के जंगल में सो शाल वृक्ष के बीच पड़ी शिला को अपनी सिँह शैय्या बनाया था तो आनंद बोले भगवान ! भंते ! मत आप इस मलिन छोटे कुशीनारा में परिनिब्बुत होवें । भगवान बोले आनंद मत ऐसा कहो कि इस क्षुद्र जगह....आनंद यह कुशीनारा पूर्व काल में राजा सुदर्शन की
कुशावति
नामक राजधानी थी और मैं इसका राजा वही सुदर्शन था । जाओ जाकर
कुशीनारा के मल्लों (पहलवान लोग , बलिष्ठ और युद्ध प्रिय ) से कहो कि वशिष्ठों !आज रात के पिछले पहर में तथागत अपना परिनिब्बान करेंगे ....तो आनंद के कहने पर सुनकर सभी
कुशीनारा के मल्ल
भगवान के दर्शन के लिए रोते बिलखते गए ।
तब ....भगवान के संकल्पानुसार भगवान बुद्ध ने महापरिनिब्बान किया .....और फिर सभी ने भगवान को लेप गंघ माला विलेपन कर
कुशीनारा के मल्लों ने उत्तरी द्वार से बुद्ध शैय्या को लेजाकर अंत्येष्ठि हेतु रक्खा जहां
कुशीनारा के मल्लों का
मुकुट बंधन नामक चैत्य ( पूजा स्थल =देव स्थल ) था ....तब महाकश्यप और उनके पांच सौं शिष्यों के वंदन और परिक्रमा करते ही तथागत की चिता में स्वयं अग्नि जल उठी ...
बाद में
वेसाली के लिच्छवियों
कपिलवत्थु के साक्यों
अल्लकप्प के बुलियों
रामगाम के कोलियों
वेट्ठ द्वीप के ब्राह्मणों
ने भगवान के महापरिनिब्बान के बारे में सुना वे भी पहुंचे , तो कुशीनारा के मल्लों ने कहा भगवान हमारे यहां परिनिबुत्त हुए हैं हम किसी को उनके अस्थि पुष्प नहीं देंगे । वहां इस बात को लेकर तलवारें खिंच गयीं तब द्रोण नामक ब्राह्मण ने कहा भाइयों हमारे बुद्ध क्षान्तिवादि थे आप झगड़ा न करें आपस में बांटकर अपने अपने यहां चैत्य बनाकर पूजा करें ।
तो बाद में
पिप्पलिवन के मोरिय (आज के मौर्य ) बाद में पहुंचे तो वे चिता का अंगार ही ले गए और उस पर स्तूप (चैत्य ) बनाया ।

इस प्रकार कुल 10 स्तूप बने थे भगवान बुद्ध के विभिन्न चिता के बचे हुए भागों पर ।

तो अपने को पहचानों आप लोग जो
कुशवाह हैं वे
कुशीनारा के मल्ल लोगों के वंशज हैं
और मौर्य
उसकाल के
पिप्पलिवन के मोरियों
के वंशज
तो आप लोग कैसे पुरोहितवादी पाखंडियों को सिरोधार्य करोगे अपना ही और अपने पूर्वजों का अपमान करोगे ।।

कुशवाह कुशीनारा के मल्लों की संतान हैं
सीता पुत्रों कुश की नहीं और मौर्य
पूर्व काल के
पिप्पलिवन के मोरियों की संतान जिनके वंशज चन्द्रगुप्त मौर्य और महान सम्राट अशोक हुए ।।

नमो बुद्धाय ।।
नमो भारत ।।

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

इस संसार को किसने बनाया बुद्ध एक विज्ञान वादी सोच



🌷🌷🌷🌷बबौद्ध कथावाचक शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध 🌷🌷🌷🌷

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इस संसार को किसने बनाया , यह एक सामान्य प्रशन है लेकिन इस दुनिया को ईश्वर ने बनाय यह वैसा ही सामन्य सा उत्तर है । इस सृष्टि रचयिता के कई नाम है , अलग –२ प्रांत और देशानुसार अलग-२ । यदि यह पूछा जाये कि तथागत ने ईश्वर को सृष्टि कर्ता के रुप में स्वीकार किया तो उत्तर है “ नही” बुद्ध ने कहा कि ईशवराश्रित धर्म कल्पनाश्रित है । इसलिये ऐसे धर्म का कोई उपयोग नही है । बुद्ध ने इस प्रशन को ऐसे ही नही छोड दिया । उन्होने इस प्रशन के नाना पहलूऒं पर विचार किया है ।

बुद्ध का तर्क था कि कि ईशवर का सिद्धान्त सत्याश्रित नही है । भगवान्‌ बुद्ध ने वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ हुई बातचीत मे स्पष्ट किया है ।

वासेठ्ठ और भारद्धाज के साथ भगवान्‌ बुद्ध के संवाद

वासेठ्ठ और भारद्धाज मे एक विवाद खडा हुआकि सच्चा मार्ग कौन सा है और झूठा कौन सा ? इस समय भगवान बुद्ध भिक्षु संघ के साथ कोशल जनपद मे विहार कर रहे थे । वह मनसाकत नामक ब्रहाम्ण गाँव मे अचिरवती नदी के तट पर एक बगीचे में ठ्हरे थे । वासेठ्ठ और भारद्धाज दोनों मनसाकत नाम की बस्ती में ही रहते थे । जब उन्होने सुना कि तथागत उनकी बस्ती में आये हैं तो वे उनके पास गये और दोनों ने भगवान्‌ बुद्ध से अपना दृष्टिकोण रखने का निवेदन किया ।

भारद्धाज ने कहा –” तरुक्ख का दिखाया मार्ग सीधा साधा है , वह मुक्ति का सीधा पथ है और जो इसका अनुसरण कर लेता है उसे वह ब्रह्मा से मिला देता है ।”

वासेठ्ठ ने कहा – “ हे गौतम बहुत से ब्राहम्ण बहुत से मार्ग सुझाते हैं – अध्वय्य ब्राहम्ण , तैत्तिरिय ब्राहम्ण, कंछोक ब्राहम्ण , तथा भीहुवर्गीय ब्राहम्ण,। वे सभी , जो इन के बताये पथ का अनुकरण करते हैं , उसे ब्रहमा से मिला देते हैं । जिस प्रकार किसी गाँव या नगर के पास अनेक रास्ते होते हैं , किन्तु वे सभी उसी गांव मे पहुंचा देते हैं , उसी तरह से ब्राहम्णॊं द्वारा दिखाये सभी पथ ब्रहमा से जा मिलते हैं । ”

तथागत ने प्रशन किया – “ तो वासेठ्ठ तुम्हारा क्या यह कहना है कि वे सभी मार्ग सही हैं ? वासेठ्ठ बोला – “ श्रमण गौतम हाँ, मेरा यही मानना है ।”

“ लेकिन वासेठ्ठ ! क्या तीनों वेदों के जानकार ब्राहमणॊं के गुरुऒं में कोई एक भी ऐसा है जिसने ब्रहमा का आमने सामने दर्शन किया हो ?”

"”गौतम ! निशचय ही नही ! ”

“ तो ब्रहमा को किसी ने नही देखा ? किसी को ब्रह्मा का साक्षात्कार नही हुआ ? “ वासेठ्ठ बोला – “ हां ऐसा ही है ।”

“ तब तुम कैसे यह मान सकते हो कि ब्राहम्णॊं का कथन सथाश्रित है ?

“ वासेठ्ठ ! जैसे कोई अंधे की कतार हो । न आगे चलने वाला अंधा देख सकता हो , न बीच मे और न पीछे चलने वाला अंधा । इसी तरह वासेठ्ठ ! मुझे लगता है कि ब्राहम्णॊं का कथन सिर्फ़ अंधा कथन है । न आगे चलने वाला देखता है , न बीच वाला और न पीछे वाला देखता है । इन ब्राहम्णॊं की बातचीत केवल उपहासस्यपद है , शब्द मात्र जिस में कोई सार नही ।”

“ वासेठ क्या यह ऐसा नही है कि किसी आदमी का किसी स्त्री से प्रेम हो गया हो जिसे उसने देखा तक नही हो ? “ "वासेठ्ठ बोला – “हां यह ऐसा ही है ।”

“ वासेठ! तब तुम यह बताओ कि यह कैसा होगा कि जब लोग उस आदमी से पूछेगें कि जिस सुन्दरतम स्त्री से प्रेम करने की बात करते हो वह अमुक स्त्री कौन है , कहां की है आदि ।”

सृष्टि के तथाकथित रचयिता की चर्चा करते हुये तथागत ने भारद्धाज और वासेठ्ठ से कहा – “ मित्रों ! जिस प्राणी ने पहले जन्म लिया था वह अपने बारे मे सोचने लगा कि मै ब्रहमा हूँ , विजेता हूँ , निर्माता हूं , अविजित हूँ , सर्वाधिकारी हूँ , मालिक हूँ , निर्माता हूँ , रचयिता हूँ, व्यवस्थापक हूँ, आप ही अपना स्वामी हूँ , और जो हैं तथा वे जो भविष्य में पैदा होने वाले हैं , उन सब का पिता हूँ । मुझ से यह सब प्राणी उत्पन्न होते हैं ।”

“ तो इसका यह मतलब हुआ न कि जो अब है और जो भविष्य में उतपन्न होने वाले हैं , ब्रह्मा सब का पिता है ? “

“ तुम्हारा कहना है कि यह जो पूज्य , विजेता , अविजित , जो है तथा जो होगें उन सब का पिता , जिससे हमारी उत्पति हुई है – ऐसा जो यह ब्रह्मा है , वह स्थायी है , सतत रहने वाला है , नित्य है , अपरिवर्तन-शील है और वह अनन्त काल तक ऐसा ही रहेगा । तो हम जिन्हें ब्रह्मा ने उत्पन्न किया है , जो ब्रह्मा के यहाँ से आये हैं , सभी अनित्य क्यों है , परिवर्तनशील क्यों हैं , अस्थिर क्यों हैं , अल्प जीवी क्यों हैं और मरणाधर्मी क्यों हैं ? “

इसका वासेठ्‌ के पास कोई उत्तर नही था ।

तथागत का तीसरा तर्क ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता से संबधित था । “ यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान और सृष्टि का पर्याप्त कारण है , तो फ़िर आदमी के दिल मे कुछ करने की इच्छा ही उत्पन्न नही हो सकती , उसे कुछ करने की आवशयकता भी नही रह सकती , न उसके मन में कुछ करने का संकल्प ही पैदा हो सकता है । यदि वह ऐसा ही है तो ब्रह्मा ने आदमी को पैदा ही क्यों किया ? ”

इसका भी वासेठ्‌ के पास कोई उत्तर नही था ।

तथागत का चौथा तर्क था कि “ यदि ईश्वर कल्याण-स्वरुप है तो आदमी हत्यारे , चोर, व्यभिचारी , झूठे , चुगलखोर, लोभी , द्धेषी , बकवादी और कुमार्गी क्यों हो जाते हैं ? क्या किसी अच्छॆ , भले ईश्वर के रहते यह संभव है ? ”

तथागत का पाँचवां तर्क ईश्वर के सर्वज्ञ , न्यायी , और दयालु होने से संम्बधित था ।

“ यदि कोई ऐसा महान्‌ सृष्टि-कर्ता है जो न्यायी भी है और दयालु भी है , तो संसार मे इतना अन्याय क्यों हो रहा है ?” भगवान्‌ बुद्ध का प्रश्न था । उन्होनें कहा – “ जिसके पास भी आंख है वह इस दर्दनाक हालत को देख सकता है । ब्रह्मा अपनी रचना सुधारता क्यों नही है ? यदि उसकी शक्ति इतनी असीम है कि उसे कोई रोकने वाला नही तो उसके हाथ ही ऐसे क्यों हैं कि शायद वह किसी का कल्याण करते हो ?उसकी सारी की सारी सृष्टि दु:ख क्यों भोग रही है ? वह सभी को सुखी क्यों नही रखता है ? चारों ओर ठ्गी , झूठ , और अज्ञान क्यों फ़ैला हुआ है ? सत्य पर झूठ क्यों बाजी मार ले जाता है ? सत्य और नयाय क्यों पराजित हो जाते है? मै तुम्हारे ब्रह्मा को परं-अन्यायी मानता हूँ जिसने केवल अन्याय देने के लिये इस जगत की रचना की है । “

“ यदि सभी प्राणियों में कोई ऐसा सर्वशक्तिमान ईश्वर व्याप्त है जो उन्हें सुखी और दुखी बनाता है और जो उनसे पाप पुण्य कराता है तो ऐसा ईश्वर भी पाप से सनता है । या तो आदमी ईश्वर की आज्ञा में नही है या ईश्वर नेक और न्यायी नही है अथवा ईश्वर अन्धा है ।”

ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त के विरुद्ध उनक अगला तर्क यह था कि ईश्वर की चर्चा से कोई प्रयोजन सिद्ध नही होता । भग्वान्‌ बुद्ध के अनुसार धर्म की धुरि ईश्वर और आदमी का सम्बन्ध नही है बल्कि आदमी का आदमी के साथ संम्बन्ध है । धर्म का प्रयोजन यही है कि वह आदमी को शिक्षा दे कि वह दूसरे आदमी के साथ कैसे व्यवहार करे ताकि सभी आदमी प्रसन्न रह सकें ।

तथागत की दृष्टि में ईश्वर विश्वास सम्यक्‌ दृष्टि के मार्ग मे अवरोधक है । यही कारण था कि वह रीति रिवाजों , प्रार्थना और पूजा के आडंबरों के सख्त खिलाफ़ थे । तथागत का मानना था कि प्रार्थना कराने की जरुरत ने ही पादरी पुरोहित को जन्म दिया और पुरोहित ही वह शरारती दिमाग था जिसने इतने अन्धविशवास को जन्म दिया और सम्यक दृष्टि के मार्ग को अवरुद्ध किया ।

तथागत का ईश्वर अस्तित्व के विरुद्ध आखिरी तर्क प्रतीत्य-समुत्पादके अन्तर्गत आता है । इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर का अस्तित्व है या नही , यह मुख्य प्रश्न नही है और न ही की ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है या नही ? असल प्रश्न है कि ईश्वर ने सृष्टि किस प्रकार रची ? प्रशन महत्वपूर्ण यह है कि ईश्वर ने सृष्टि भाव ( =किसी पदार्थ ) में से उत्पन्न की या अभाव ( = शून्य ) में से ?

यह तो एक्दम विशवास नही किया जा सकता कि ‘ कुछ नही ‘ में सेकुछ की रचना हो गई । यदि ईश्वर ने सृष्टि की रचना कुछ से की है तो वह कुछ – जिस में से नया कुछ उत्पन्न किया गया है – ईश्वर के किसी भी अन्य चीज के उत्पन्न करने के पहले से ही चला आया है । इसलिये ईश्वर को उस कुछ का रचयिता नही स्वीकार किया जा सकता क्योंकि वह कुछ पहले से ही अस्तित्व मे चला आ रहा है ।

यदि ईश्वर के किसी भी चीज की रचना करने से पहले ही किसी ने कुछमें से उस चीज की रचना कर दी है जिससे ईश्वर ने सृष्टि की रचना की है तो ईश्वर सृष्टि का आदि-कारण नही कहला सकता ।

भगवान्‌ बुद्ध का यह आखिरी तर्क ऐसा था कि जो ईश्वर विश्वास के लिये सर्वथा मारक था और जिसका वासेठ्‌ और भारद्धाज के पास कोई जबाब नही था ।

( संकलन : पृष्ठ संख्या १९४-१९९ , भगवान्‌ बुद्ध और उनका धर्म , लेखक डां भीमराव रामजी अम्बेड्कर , अनुवादक :डां भदन्त आनन्द कौसल्लायन )

अगले भाग में देखें :भगवान्‌ बुद्ध की  सृष्टि निर्माण की बैज्ञानिक सोच :प्रतीत्य-समुत्पाद



🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
खदिया नगला हरदोई
🌷🌷🌹🌹🌷🌷🌹🌹

गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

कुशवाहा वंश

🌹🌹नमो बुध्दाय🌹🌹        
      🌼🌼🌼५६३🌼🌼🌼

🙏मातु पिता को शीश नवाऊं ।
अपनी जीवन कथा सुनाऊँ ।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
ग्राम खदिया नगला
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
एक छोटा सा परिवार जिसमें केवल 7 लोग थे।  बाबा का नाम ज्ञान सिंह तथा बूढ़ी मां राम कुमारी मेरे ताऊजी अहिवरन  कुशवाहा पिता जी शम्भू कुशवाहा माता सुदामा जी भाई मोती लाल कुशवाहा ।

सन 2003 में बाबा की मृत्यु हो गई। और सन 2005 में बूढ़ी मां की मृत्यु हो गई।
पिताजी दूध की डेरी चलाते थे और खेतीबाड़ी देखने का कार्य करते थे।
 लेकिन जब पिताजी ने देखा कि गरीबी पीछा नहीं छोड़ रही है तो उन्होंने हमें सन 2007 में एक जज साहब मृदुल एस कुमार सिंह के यहां भेज दिया। सोचा कि बेटा  अच्छी जगह  जाएगा और वहां पढ़ाई लिखाई अच्छी होगी और आगे परिवार उन्नति को प्राप्त होगा ।
परंतु साथियों एक स्वाभिमानी व्यक्ति स्वतंत्रता पूर्वक जीना चाहता है । उसे किसी भी प्रकार की दाब धौस स्वीकार नहीं होती है ।
 सो मेरी सोच स्वाभिमानी मैं अपनी जिंदगी स्वाभिमान पूर्ण जीना चाहता था ।
 उन लोगों के कुछ जातीय अव्यवहार को देखकर मैंने फैसला कर लिया कि मैं किसी भी कीमत पर यहां ठहरने वाला नहीं हूं । सो मै छः महीने के बाद मे वहा से चला आया  और दोबारा बहुत बुलाने पर भी उनके यहां नहीं गया ।
साथियों सन् 2012 कम अवस्था में ही मेरा रीना कुशवाहा से विवाह हो गया । और इसी वर्ष मेरे ताऊजी का भी देहांत हो गया था।
 मेरे अंदर एक भावना सदैव रहा करती थी कि मैं कुछ ऐसा करूं जिससे हमारा समाज एक नए रास्ते पर चले।
 सो इस स्वप्न  को साकार करने के लिए मैंने हिंदू धर्म की कथा को कहना प्रारंभ कर दिया।
कुछ समय के बाद हमें एक ऐसा मार्ग मिला जिसकी हमें सदैव तलाश थी
( क्योंकि मैं चाहता था कि मेरा वंश मेरी बिरादरी उच्च स्तर पर सम्मान को प्राप्त और हमारे कुशवाहा मौर्य शाक्य सैनी वर्ग के जितने भी महापुरुष पूर्वज हैं इनका नाम रोशन हो)

साथियों वह था बौद्ध धर्म बौद्ध धर्म मिलते ही हिंदू धर्म की कथा को कहना छोड़कर बौद्ध कथा वाचक बन गया।

मैने मैनपुरी के भिक्षु उपनन्द थेरा जी से धम्म दीक्षा ली ।🙏🙏

गीत संगीत में रुचि होने के कारण संगीत के माध्यम से ही बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करना शुरू कर दिया । अपने महापुरुषों पूर्वजों का प्रसार प्रचार करना शुरू कर दिया।
दोस्तों अब  इस बौद्ध धर्म के  कारवां में मैं अकेला नहीं था ।
मेरे कुछ खास मित्र थे
विजय सिंह कुशवाहा रूपापुर से
 राजेश कुशवाहा पाली से
 उमेश चंद्र कुशवाहा खदिया नगला से
मौजी राम प्रधान ग्राम भरखनी से

पप्पू कुशवाहा भरखनी  से
राम कुमार कुशवाहा रत्नापुर से रामसिंह कुशवाहा भरखनी से

🌼धीरे-धीरे 8 वर्षों में लगभग 6000 लोगों को बौद्ध धर्म धारण कराने का कार्य किया।
🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🌴🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🍃🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
शाक्य वंशी शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला ।।


साधु 🔸🔸 साधु 🔸🔸 साधु

बुधवार, 18 दिसंबर 2019

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा का जीवन परिचय



🌹🌹नमो बुध्दाय🌹🌹        
      🌼🌼🌼५६३🌼🌼🌼

🙏मातु पिता को शीश नवाऊं ।
अपनी जीवन कथा सुनाऊँ ।।
^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
ग्राम खदिया नगला
🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿🌿
एक छोटा सा परिवार जिसमें केवल 7 लोग थे।  बाबा का नाम ज्ञान सिंह तथा बूढ़ी मां राम कुमारी मेरे ताऊजी अहिवरन  कुशवाहा पिता जी शम्भू कुशवाहा माता सुदामा जी भाई मोती लाल कुशवाहा ।

सन 2003 में बाबा की मृत्यु हो गई। और सन 2005 में बूढ़ी मां की मृत्यु हो गई।
पिताजी दूध की डेरी चलाते थे और खेतीबाड़ी देखने का कार्य करते थे।
 लेकिन जब पिताजी ने देखा कि गरीबी पीछा नहीं छोड़ रही है तो उन्होंने हमें सन 2007 में एक जज साहब मृदुल एस कुमार सिंह के यहां भेज दिया। सोचा कि बेटा  अच्छी जगह  जाएगा और वहां पढ़ाई लिखाई अच्छी होगी और आगे परिवार उन्नति को प्राप्त होगा ।
परंतु साथियों एक स्वाभिमानी व्यक्ति स्वतंत्रता पूर्वक जीना चाहता है । उसे किसी भी प्रकार की दाब धौस स्वीकार नहीं होती है ।
 सो मेरी सोच स्वाभिमानी मैं अपनी जिंदगी स्वाभिमान पूर्ण जीना चाहता था ।
 उन लोगों के कुछ जातीय अव्यवहार को देखकर मैंने फैसला कर लिया कि मैं किसी भी कीमत पर यहां ठहरने वाला नहीं हूं । सो मै छः महीने के बाद मे वहा से चला आया  और दोबारा बहुत बुलाने पर भी उनके यहां नहीं गया ।
साथियों सन् 2012 कम अवस्था में ही मेरा रीना कुशवाहा से विवाह हो गया । और इसी वर्ष मेरे ताऊजी का भी देहांत हो गया था।
 मेरे अंदर एक भावना सदैव रहा करती थी कि मैं कुछ ऐसा करूं जिससे हमारा समाज एक नए रास्ते पर चले।
 सो इस स्वप्न  को साकार करने के लिए मैंने हिंदू धर्म की कथा को कहना प्रारंभ कर दिया।
कुछ समय के बाद हमें एक ऐसा मार्ग मिला जिसकी हमें सदैव तलाश थी
( क्योंकि मैं चाहता था कि मेरा वंश मेरी बिरादरी उच्च स्तर पर सम्मान को प्राप्त और हमारे कुशवाहा मौर्य शाक्य सैनी वर्ग के जितने भी महापुरुष पूर्वज हैं इनका नाम रोशन हो)

साथियों वह था बौद्ध धर्म बौद्ध धर्म मिलते ही हिंदू धर्म की कथा को कहना छोड़कर बौद्ध कथा वाचक बन गया।

मैने मैनपुरी के भिक्षु उपनन्द थेरा जी से धम्म दीक्षा ली ।🙏🙏

गीत संगीत में रुचि होने के कारण संगीत के माध्यम से ही बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करना शुरू कर दिया । अपने महापुरुषों पूर्वजों का प्रसार प्रचार करना शुरू कर दिया।
दोस्तों अब  इस बौद्ध धर्म के  कारवां में मैं अकेला नहीं था ।
मेरे कुछ खास मित्र थे
विजय सिंह कुशवाहा रूपापुर से
 राजेश कुशवाहा पाली से
 उमेश चंद्र कुशवाहा खदिया नगला से
मौजी राम प्रधान ग्राम भरखनी से

पप्पू कुशवाहा भरखनी  से
राम कुमार कुशवाहा रत्नापुर से रामसिंह कुशवाहा भरखनी से

🌼धीरे-धीरे 8 वर्षों में लगभग 6000 लोगों को बौद्ध धर्म धारण कराने का कार्य किया।
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शाक्य वंशी शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला ।।


साधु           🔸🔸 साधु          🔸🔸 साधु

रविवार, 15 दिसंबर 2019

khadiya nagla bharkhani





🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲Rahul Singh bauddha kushwaha khadiya nagla bharkhani Hardoi utter Pradesh 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
 बौद्ध कथा वाचक राहुल कुशवाहा
🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼🌼


खदिया नगला एक ऐसा गांव है जहां के लोग आधे से ज्यादा बौद्ध धर्म को मानते है । जिसकी ग्राम पंचायत भरखनी व थाना पाली तहसील सवायजपुर

जिला हरदोई है ।

🌹शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध ने

इस गांव को उठाने के लिए तरस तरह के प्रयास किए

तथा गांव के अंदर सद्बुद्धि जागृत हो इसके लिए देश बिदेश से भिक्षुओ को बुलवाकर समय-समय पर प्रवचन करवाने का कार्य किया है ।

मैंने अपने समाज के लिए बहुत कुछ सोचने की जरूरत की है ।



साथियो अगर हम कामयाब हुए तो एक दिन अवश्य ही सफलता मिलेगी ।





🍀कोई चलता पद चिन्हो पर

कोई पदचिन्ह बनाते है

जो पदचिन्ह बनाते है

वह बुद्धिमान कहलाते है🍀


🌹🌹 अत्ताहि अत्तानो नाथो कोहिनाथो परोसिया ।

अत्तनाहि सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं - - -!!!
🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹


🌿अपना दीपक स्वयं बनो🌿

🌿अपने पर भरोसा रखो🌿

🌻क्योंकि आप ही अपने मालिक हैं🌻



और आपका मालिक कोई नही हो सकता ।।




🙏  मंगम् अशोक लाटम् मंगलं चकृध्वजे ।
मंगलं भीमा बिधानम् मंगलं जय भारती ----!!!


नमो बुध्दाय

जय सम्राट अशोक मौर्य



शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

ग्राम खदिया नगला

पोस्ट भरखनी

थाना पाली

तहसील सवायजपुर

जिला हरदोई

उत्तर प्रदेश।।

पिता श्री शम्भू सिंह कुशवाहा

माता निर्वाण प्राप्त श्रध्देय  सुदामा कुशवाहा

पत्नी रीना सिंह कुशवाहा

भाई मोती लाल कुशवाहा

      🌹🌹नमो बुध्दाय 🌹🌹

🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲
सब्बे सत्ता सुखी होन्तु सब्बे होन्तु च खेमिनो सब्बे भद्राणि पश्यन्तु मां कन्चि दुक्ख मां गमा।।

🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲

ब्राम्हण और बैकवर्ड मे अंतर क्या है भरखनी खदिया नगला




शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला

🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺

*ब्राहमण और हममे में क्या अंतर ?*
+++++++++++++++++++++
यह कुछ लाईन  को पढो और सत्य या असत्य को तर्क वितर्क करके के समझो

वो धन के लिए लड़ता है ,
हम धर्म के लिए लडते हैं ।

वो संसद की तरफ दौडता है ,
हम तीर्थ स्थल की तरफ दौडते हैं ।

वो अपने बच्चो को कॉलेज भेजता है ,
हम मंदिर व कांवड़ लेने भेजते हैं ।

वो कथा भागवत करता है ,
हम कथा भागवत कराते हैं ।

वो हम से दान दक्षिणा लेता है ,
हम उसको दान दक्षिणा देते हैं ।

वो हमको झूठा आशीर्वाद देता है ,
हम उसके पैरों में पड़़ जाते हैं ।

वो हमको गुलाम बनाता है ,
हम उसके गुलाम बन जाते हैं ।

वो हमें मुसलमानों के प्रति भडकाता है ,
हम सब भडक जाते हैं ।

वो हमको बर्बाद करना चाहता है ,
हम उसको आबाद करना चाहते हैं ।

वो हमसे हमेशा ईर्ष्या रखता है ,
हम उससे हमेशा अनुराग रखते हैं ।

वो अपने घर में कभी सत्यनारायण की पूजा नहीं करता है ,
हम से हमेशा करवाता है ।

वो हमेशा सब की कुंडली बनाता है ,
पर अपनी कुंडली किसी से नहीं बनवाता ।

उसकी नजर पैसों पर रहती है ,
हमारी नजर कर्मकांडों पर रहती है।

उसका अधिकार सभी मठ मंदिरों पर है,
हमारा अधिकार किसी मठ मंदिर पर नहीं ।

वो हर समय धन दौलत में खेलता है ,
हम अपनी रोटी के लिए दिन रात एक करते हैं ।

वो बगैर पसीने की कमाई करता है ,
हम पसीना बहा कर एक हिस्सा उसको दे आते हैं ।

उसका 10 साल का बच्चा अपना इतिहास जानता है
हमारा 60 साल का बुड्ढा भी  अपना इतिहास नहीं जानता है।

वो हमसे अपने पूर्वजों की पूजा करवाता है ,
हमारे  महापुरुषों को हमसे ही गाली दिलवाता है ।

वो कभी मंदिर में दान नहीं करता ,
हमसे दान करवाकर हमारी तिजोरी साफ कर देता है ।

वो मंदिरो के चढावे से तिजौरियां भरता है ,
हम अपनी कमाई मंदिरो में चढा कर गरीब बन जाते हैं ।

वो अपनी चतुर बुद्धि से भारत पर राज कर रहा है ,
हम अपनी मंद बुद्धि के कारण उसकी गुलामी करते हैं ।

जीवन में दुख भी वही बताता है उपाय भी वही बताता है ,
हम उसके नचाये नाचते हैं ।

भारत में उसकी संख्या 3% है लेकिन 68% जगहों पर विराजमान है ।
हमारी संख्या 85% है लेकिन हम 20% जगहों पर भी नहीं ।

वह अपने महापुरुषों का सम्मान करता एवं हमसे करवाता है ,
हमसे ही हमारे ही महापुरुषों का अपमान करवाता है ।

अगर ब्राह्मण वाद से निकलना है तो इस पर से विश्वास खत्म करो, तभी निकल सकते हो ।

 *जय विज्ञान जय संविधान*
 *जय शिक्षा जय जागरूकता*

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

खदिया नगला नमो बुध्दाय











🌷 Kamma — The Real Inheritance🌷
               S. N. Goenka.

(The following are excerpts from discourses given by S. N. Goenka for long course students.)

"Kammassakā, bhikkhvave, sattā kammadāyādā, kammayonī, kammabandhū, kammapatisaranā, yam kammamṃ karonti—kalyānaṃ vā pāpakaṃ vā—tassa dāyādā bhavanti".
A.X.206.

"Oh meditators, beings are the owners of their deeds, the heirs of their deeds, born of their deeds, kin to their deeds; their deeds are their refuge. Whatever actions they perform, whether good or evil, such will be their inheritance."

🌷 1)  Kammassakā:  beings are the owners of their deeds.

The law of paticca samuppāda (dependent origination) is the universal law of cause and effect: As the action is, so the result will be.

Mental volition is the driving force for action at the vocal or physical level.

If this driving force is unwholesome, the vocal and physical actions will be unwholesome.

If the seeds are unwholesome, then the fruits are bound to be unwholesome.

But if this driving force is wholesome, then the results of the actions are bound to be wholesome.

For a Vipassana student who develops the ability to observe this law at the level of direct experience, the answer to the question "Who am I?" becomes so clear. You are nothing but the sum total of your kamma, your samkhāra.

All your accumulated actions together equal "I" at the conventional level.

🌷2) Kammadāyādā:  the heirs of their deeds.

In the wordly, conventional sense, one says, "I received this inheritance from my mother or my father or my elders," and yes, at the apparent level this is true—but what is one’s real inheritance?

Kammadāyādā : One inherits one’s own kamma: the results, the fruits of one’s own kamma.

Whatever you are now, the present reality of this mind-matter structure is nothing but the sum total of and the result of your own accumulated past kamma.

The experience of the present moment is the sum total of all that is acquired, inherited—kammadāyādā.

🌷 3) Kammayonī:  born of their deeds.

One says, "I am the product of a womb, I have come out of the womb of my mother," but this is only apparent truth.

Actually, your birth is because of your own past kamma.

You come from the womb of your own kamma.

As you start understanding Dhamma at a deeper level, you realise this. This is kammayonī, the womb which every moment produces the fruit of the accumulated kamma.

🌷4) Kammabandhū:  kin of their deeds.

None other is your relative, not your father, your mother, your brother nor your sister.

In the worldly way we say, "This is my brother, my relative, or my near or dear one; they are so close to me."

Actually, no one is close to you; no one can accompany you or help you when the time comes. When you die, nothing accompanies you but your kamma.

Whomever you call your relatives remain here, but your kamma continues to follow you from one life to another. You are not in possession of anything but your own kamma.

It is your only companion.

🌷5) Kammapatisaranā:  their deeds are their refuge.

Refuge is only in one’s own kamma.

Wholesome kamma provides a refuge; unwholesome kamma produces more suffering.

(Vipassana newsletter. Apr' 98)

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🌷कर्म संस्कार 🌷

पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।
इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मांतरों तक चित्तधारा के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल देते हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं।

🍁इसी को किसी कवि ने ठीक ही कहा-
वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर अथवा सोये हुए असावधान रहते हुए अथवा विषम परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पूण्य रक्षा करते हैं।

🌻ये पूण्य अथवा पाप कर्मो के संस्कार साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो।
संस्कारो को जीवन की चित्तधारा अपने साथ लिये चलती है।
ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नही है।कर्म संस्कार तरंगो के रूप में चित्तधारा की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं और सम्पूर्ण चित्तधारा को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।
अच्छे-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।

🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा(energy) ही है जो जीवनधारा को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।
जब जीवन का अवसान(death) होता है तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है तो दोनों का अलगाव(separation) होता है। इसी को मृत्यु कहते हैं।

🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर विसरनखलित (decompose) होता रहता है।शरीर से अलग हुई चित्तधारा किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।

🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं।निसर्ग के यानि धर्म के नियम इतने परफेक्ट और वेल आर्गनाइज्ड है कि एकाउंटिंग सिस्टम के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के खाते में अपने आप निवेशित होते जाते है।और जीवन में जिस जिस कर्म का फल प्रकट होकर उसका भुगतान हो जाता है वह उस अकाउंट में डेबिट हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है।
प्रतिक्षण की बैलेंस शीट तैयार रहती है।इस जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्तधारा के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के प्रथम क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ चित्तधारा आगे बढ़ती है।
शरीर की चयुति हो गयी, किन्तु चित्तधारा चलती रही।
नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नही होता।

🌼पिछले जन्म की चित्तधारा का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-डेबिट होते रहते हैं।
यों जीवनधारा एक से दूसरे जन्म मे चलती रहती है।

💐वस्तुतः संस्कार है तो जीवनधारा है।चित्त सारे संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नया जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिये एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है।

🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नही हो जाते।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाय तो जीवनधारा समाप्त हो जाती है। अगला जन्म नही हो पाता।

http://www.vridhamma.org/

https://www.dhamma.org/en/courses/search

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🌹गुरूजी, आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है। यह बात समझ में नही आयी। क्योंकि संवेदना तो शरीर का स्वभाव है, कई कारणों से आ सकती है।तो फिर उनको पिछले कर्मो का फल क्यों मानें?

उत्तर--जरुरी नही है। सारी संवेदनाएँ कर्म-संस्कारो की द्योतक नही हैं।
भगवान बुद्ध ने संवेदनाओ की उत्पत्ति के कई कारण बताएं हैं, उनमे से एक ये कर्म-संस्कार हैं।
किन्तु जब आप ध्यान करते हो तब ज्यादातर कर्म-संस्कार संवेदनाओ के रूप में प्रकट होने के द्योतक हैं। अन्यथा तो जो आपने भोजन किया है या आपकी बीमारी के कारण कोई दर्द है या चलते हुए कहीं कोई ठोकर लग जाने से कोई पीड़ा हुई- इसमे पुराने संस्कारो से क्या मतलब है? यह सब नए संस्कार हैं।

🌻हम असावधानी से चले, ठोकर लग गयी। हमने कोई गलत भोजन कर लिया, उसकी वजह से पेट दुखने लगा; यह नया कर्म है हमारा।
तो सारी संवेदनाएँ हमारे पुराने संस्कारों की हों ऐसा मानकर नही चलें।

🌷हमें तो यह देखना है कि किसी भी कारण से संवेदना आयी, कारण कोई भी हो, किसी भी प्रकार की संवेदना महसूस कर रहें हो, हम तो समता में हैं, कोई नया संस्कार नही बना रहें हैं।

🌺नया नही बना रहें हैं तो पुराने का संवर्धन होना बंद हो गया, अन्यथा संवर्धन होता चला जाता है।

🌲संवेदना इस कारण से हो या उस कारण से- आप यदि समता में स्थित हो, कोई प्रतिक्रिया नही कर रहे, और नया कर्म-संस्कार नही बना रहे तो आपका उद्देश्य सध गया और आप प्रगति कर रहें हैं।

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Que : जो पुराने कर्म संस्कार हैं वे वास्तविक कर्मो के रूप में सामने आते हैं या संवेदना के रूप में?

Ans : --हम जो भी कर्म करते हैं वह चित्त में चेतना क्या जागी उससे होता है।

मन में द्वेष जागा, क्रोध जागा, वासना जागी, भय जागा तो ही शरीर या वाणी से कर्म हुआ।

ये विकार जागते हुए शरीर में क्या संवेदना हुई? जिस प्रकार की संवेदना से वह कर्म किया गया उसी प्रकार की संवेदना जागेगी।

हम ठंडे स्थानों में शिविर देतें हैं। लोग ठंड से थरथराते हैं, लेकिन जब विपश्यना के बाद गर्मी फूटती है तो कपडे फेंकने लगते हैं। यह गर्मी शरीर की गर्मी नहीं, मौसम की भी नहीं-- भीतर के संग्रहित (accumulated) संस्कार के कारण है।

क्रोध का जितना संस्कार इकट्ठा किया वह गर्मी पैदा करेगा।

ईर्ष्या (jealousy)का होगा- गर्मी पैदा करेगा।

🌷 और न  जाने कितने प्रकार के संस्कार हैं कोई गर्मी पैदा करेगा, कोई धड़कन पैदा करेगा।
जाते समय जो कुछ पैदा किया- उसी के साथ निकलेगा।

कांटा जैसे जितना कष्ट देकर घुसा था उसी तरह उतना कष्ट देकर ही निकलेगा।उसका स्वभाव है।

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🌷सही  सुख🌷

गुरूजी-- चित्तधारा को आगे बढ़ने के लिए प्रतिक्षण आहार चाहिए। नया संस्कार एक आहार है, पुराने संस्कारो का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई ना कोई आहार मिलता है तो यह चित्तधारा आगे बढ़ती है।

🌹बहुधा(mostly) होता यह है की चित्तधारा को जब हम एक आहार देतें है, एक नया संस्कार डालते हैं तो रुकते नही। अगले क्षण फिर वैसा ही आहार देतें हैं। यों क्षण प्रतिक्षण आहार देतें चलते हैं।
किसी बात को लेकर क्रोध आया तो बड़ा नन्हा सा क्षण होता है क्रोध का, पलक झपकने मात्र में कितने ही शत- सहस्त्र कोटि बार उत्पन्न होकर नष्ट होने वाला क्षण। लेकिन क्रोध का संस्कार पैदा करते ही अगले क्षण फिर क्रोध पैदा किया। अगले क्षण फिर क्रोध ही क्रोध के सँस्कार इस चित्तधारा को देर तक आगे बढ़ाते चलतें हैं। कभी तो घंटो क्रोध चलता रहता है।
क्रोध रुका तो कोई और संस्कार बनाना शुरू कर देंगे। वह चलेगा देर तक। फिर कोई और। कभी भय। कभी वासना। कभी कुछ और।
यों पुराने संस्कारो के नष्ट होने की बारी ही नही आती।
क्षण-क्षण नया ही बनाये जा रहें हैं।

🌼यदि  हम संवर कर लें यानी रोक लगा दें तो नए संस्कार नही बनते। तब चित्तधारा किसके बल पर चलती है? क्योंकि हमने नया संस्कार नही बनाया, तो कोई न कोई संस्कार- बीज जिसका  फल हो सकता है, कुछ देर बाद आने वाला हो, अब जल्दी पककर आएगा। इसे विपाक का त्वर्तिकरण कह सकते हैं। तुरंत कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्तधारा पर अपना फल लेकर आता ही है। यही उदिरणा है।

🌺आया कोई  पुराना कर्म-संस्कार चित्त-धारा पर अपना फल लेकर और उसके सहारे चित्त धारा आगे बढ़ने लगी। जैसा कर्म था वैसा ही फल आया। हम उसे समता से, प्रज्ञा से देखने लगे तो हुआ निरोध उसका। जितने जितने पुराने संस्कार क्षीण होते चले जायेंगे उतना उतना हल्कापन आएगा ही। सही माने में सुख आएगा। दुःखो से छुटकारा होगा।

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🌷कर्म- विपाक🌷

विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहां दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।

यों एक के बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का ताँता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती जाती है।यह क्रम जितनी देर तक चलता है, उतनी देर तक खिणन पुराणं होता रहता है।

परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है तो साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अम्मतव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले अनित्य अनित्य करता रहे, परंतु वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर होती नहीं। अतः लगता है की यह तो नित्य है।

उस स्थूल ठोस पीड़ा की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है, जैसे कोई धुनिया कपास(रुई) की ग्रंथि को अपने धुनके के तार से प्रकम्पित कर खोलता है, कपास का एक एक तार अलग अलग कर देता है।

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🌹गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नही मानना चाहिये तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नही बनाती? निसर्ग तो भेद भाव करती नही न।

उत्तर--नही, निसर्ग कोई भेदभाव नही करता।

प्रकर्ति हमारा स्वभाव नही बनाती।

हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम इसी एक जीवन का नही है, अनेक जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है।

🌷परंतु यदि समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी होकर अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है।

प्रकृति तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किये गए अच्छे बुरे कर्म का फल देती है। इसमे वह रंच मात्र भी भेदभाव नही करती।

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🌹गुरूजी, जब कर्म का फल आनेवाला होता है तो विपश्यना उसे कैसे काट सकती है?

उत्तर--कर्म आएगा फल लेकर तो पहले संवेदना आएगी। संवेदना देखने लगेंगे तो जो फल आएगा वह दुर्बल हो जायेगा।
पेड़ में फल तो आया पर बड़ा ही नही हुआ, छोटा सा होकर गिर गया।
यही तो भगवान् बुद्ध ने ढूंढ निकाला। यही विद्या तो उन्होंने सीखी और लोगो को सिखाई।

🌷जो भी हमने सत्कर्म दुष्कर्म किया है उसका फल तो आएगा ही। हमने संवेदना के रूप में उसे देखना शुरू कर दिया तो उसकी ताकत ख़त्म हो जायेगी।
मान लो बड़ा फल आया भी तो कुछ नही होगा।हम मुस्कराते रहेंगे, आ भई आ!
जैसे किसी ने हमारा कुछ छीन लिया, ले लिया, तो क्या हुआ!
हम तो मुस्कुराते रहेंगे।
हमारे अच्छे कर्मो के अच्छे फल भी तो मिलेंगे। तो दुखी न होकर हमेशा प्रसन्न रहो।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

नमो बुध्दाय खदिया नगला रूपापुर हरदोई



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🌷 Kamma — The Real Inheritance🌷
               S. N. Goenka.

(The following are excerpts from discourses given by S. N. Goenka for long course students.)

"Kammassakā, bhikkhvave, sattā kammadāyādā, kammayonī, kammabandhū, kammapatisaranā, yam kammamṃ karonti—kalyānaṃ vā pāpakaṃ vā—tassa dāyādā bhavanti".
A.X.206.

"Oh meditators, beings are the owners of their deeds, the heirs of their deeds, born of their deeds, kin to their deeds; their deeds are their refuge. Whatever actions they perform, whether good or evil, such will be their inheritance."

🌷 1)  Kammassakā:  beings are the owners of their deeds.

The law of paticca samuppāda (dependent origination) is the universal law of cause and effect: As the action is, so the result will be.

Mental volition is the driving force for action at the vocal or physical level.

If this driving force is unwholesome, the vocal and physical actions will be unwholesome.

If the seeds are unwholesome, then the fruits are bound to be unwholesome.

But if this driving force is wholesome, then the results of the actions are bound to be wholesome.

For a Vipassana student who develops the ability to observe this law at the level of direct experience, the answer to the question "Who am I?" becomes so clear. You are nothing but the sum total of your kamma, your samkhāra.

All your accumulated actions together equal "I" at the conventional level.

🌷2) Kammadāyādā:  the heirs of their deeds.

In the wordly, conventional sense, one says, "I received this inheritance from my mother or my father or my elders," and yes, at the apparent level this is true—but what is one’s real inheritance?

Kammadāyādā : One inherits one’s own kamma: the results, the fruits of one’s own kamma.

Whatever you are now, the present reality of this mind-matter structure is nothing but the sum total of and the result of your own accumulated past kamma.

The experience of the present moment is the sum total of all that is acquired, inherited—kammadāyādā.

🌷 3) Kammayonī:  born of their deeds.

One says, "I am the product of a womb, I have come out of the womb of my mother," but this is only apparent truth.

Actually, your birth is because of your own past kamma.

You come from the womb of your own kamma.

As you start understanding Dhamma at a deeper level, you realise this. This is kammayonī, the womb which every moment produces the fruit of the accumulated kamma.

🌷4) Kammabandhū:  kin of their deeds.

None other is your relative, not your father, your mother, your brother nor your sister.

In the worldly way we say, "This is my brother, my relative, or my near or dear one; they are so close to me."

Actually, no one is close to you; no one can accompany you or help you when the time comes. When you die, nothing accompanies you but your kamma.

Whomever you call your relatives remain here, but your kamma continues to follow you from one life to another. You are not in possession of anything but your own kamma.

It is your only companion.

🌷5) Kammapatisaranā:  their deeds are their refuge.

Refuge is only in one’s own kamma.

Wholesome kamma provides a refuge; unwholesome kamma produces more suffering.

(Vipassana newsletter. Apr' 98)

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🌷कर्म संस्कार 🌷

पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।
इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मांतरों तक चित्तधारा के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल देते हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं।

🍁इसी को किसी कवि ने ठीक ही कहा-
वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर अथवा सोये हुए असावधान रहते हुए अथवा विषम परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पूण्य रक्षा करते हैं।

🌻ये पूण्य अथवा पाप कर्मो के संस्कार साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो।
संस्कारो को जीवन की चित्तधारा अपने साथ लिये चलती है।
ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नही है।कर्म संस्कार तरंगो के रूप में चित्तधारा की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं और सम्पूर्ण चित्तधारा को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।
अच्छे-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।

🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा(energy) ही है जो जीवनधारा को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।
जब जीवन का अवसान(death) होता है तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है तो दोनों का अलगाव(separation) होता है। इसी को मृत्यु कहते हैं।

🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर विसरनखलित (decompose) होता रहता है।शरीर से अलग हुई चित्तधारा किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।

🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं।निसर्ग के यानि धर्म के नियम इतने परफेक्ट और वेल आर्गनाइज्ड है कि एकाउंटिंग सिस्टम के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के खाते में अपने आप निवेशित होते जाते है।और जीवन में जिस जिस कर्म का फल प्रकट होकर उसका भुगतान हो जाता है वह उस अकाउंट में डेबिट हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है।
प्रतिक्षण की बैलेंस शीट तैयार रहती है।इस जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्तधारा के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के प्रथम क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ चित्तधारा आगे बढ़ती है।
शरीर की चयुति हो गयी, किन्तु चित्तधारा चलती रही।
नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नही होता।

🌼पिछले जन्म की चित्तधारा का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-डेबिट होते रहते हैं।
यों जीवनधारा एक से दूसरे जन्म मे चलती रहती है।

💐वस्तुतः संस्कार है तो जीवनधारा है।चित्त सारे संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नया जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिये एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है।

🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नही हो जाते।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाय तो जीवनधारा समाप्त हो जाती है। अगला जन्म नही हो पाता।

http://www.vridhamma.org/

https://www.dhamma.org/en/courses/search

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🌹गुरूजी, आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है। यह बात समझ में नही आयी। क्योंकि संवेदना तो शरीर का स्वभाव है, कई कारणों से आ सकती है।तो फिर उनको पिछले कर्मो का फल क्यों मानें?

उत्तर--जरुरी नही है। सारी संवेदनाएँ कर्म-संस्कारो की द्योतक नही हैं।
भगवान बुद्ध ने संवेदनाओ की उत्पत्ति के कई कारण बताएं हैं, उनमे से एक ये कर्म-संस्कार हैं।
किन्तु जब आप ध्यान करते हो तब ज्यादातर कर्म-संस्कार संवेदनाओ के रूप में प्रकट होने के द्योतक हैं। अन्यथा तो जो आपने भोजन किया है या आपकी बीमारी के कारण कोई दर्द है या चलते हुए कहीं कोई ठोकर लग जाने से कोई पीड़ा हुई- इसमे पुराने संस्कारो से क्या मतलब है? यह सब नए संस्कार हैं।

🌻हम असावधानी से चले, ठोकर लग गयी। हमने कोई गलत भोजन कर लिया, उसकी वजह से पेट दुखने लगा; यह नया कर्म है हमारा।
तो सारी संवेदनाएँ हमारे पुराने संस्कारों की हों ऐसा मानकर नही चलें।

🌷हमें तो यह देखना है कि किसी भी कारण से संवेदना आयी, कारण कोई भी हो, किसी भी प्रकार की संवेदना महसूस कर रहें हो, हम तो समता में हैं, कोई नया संस्कार नही बना रहें हैं।

🌺नया नही बना रहें हैं तो पुराने का संवर्धन होना बंद हो गया, अन्यथा संवर्धन होता चला जाता है।

🌲संवेदना इस कारण से हो या उस कारण से- आप यदि समता में स्थित हो, कोई प्रतिक्रिया नही कर रहे, और नया कर्म-संस्कार नही बना रहे तो आपका उद्देश्य सध गया और आप प्रगति कर रहें हैं।

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Que : जो पुराने कर्म संस्कार हैं वे वास्तविक कर्मो के रूप में सामने आते हैं या संवेदना के रूप में?

Ans : --हम जो भी कर्म करते हैं वह चित्त में चेतना क्या जागी उससे होता है।

मन में द्वेष जागा, क्रोध जागा, वासना जागी, भय जागा तो ही शरीर या वाणी से कर्म हुआ।

ये विकार जागते हुए शरीर में क्या संवेदना हुई? जिस प्रकार की संवेदना से वह कर्म किया गया उसी प्रकार की संवेदना जागेगी।

हम ठंडे स्थानों में शिविर देतें हैं। लोग ठंड से थरथराते हैं, लेकिन जब विपश्यना के बाद गर्मी फूटती है तो कपडे फेंकने लगते हैं। यह गर्मी शरीर की गर्मी नहीं, मौसम की भी नहीं-- भीतर के संग्रहित (accumulated) संस्कार के कारण है।

क्रोध का जितना संस्कार इकट्ठा किया वह गर्मी पैदा करेगा।

ईर्ष्या (jealousy)का होगा- गर्मी पैदा करेगा।

🌷 और न  जाने कितने प्रकार के संस्कार हैं कोई गर्मी पैदा करेगा, कोई धड़कन पैदा करेगा।
जाते समय जो कुछ पैदा किया- उसी के साथ निकलेगा।

कांटा जैसे जितना कष्ट देकर घुसा था उसी तरह उतना कष्ट देकर ही निकलेगा।उसका स्वभाव है।

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🌷सही  सुख🌷

गुरूजी-- चित्तधारा को आगे बढ़ने के लिए प्रतिक्षण आहार चाहिए। नया संस्कार एक आहार है, पुराने संस्कारो का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई ना कोई आहार मिलता है तो यह चित्तधारा आगे बढ़ती है।

🌹बहुधा(mostly) होता यह है की चित्तधारा को जब हम एक आहार देतें है, एक नया संस्कार डालते हैं तो रुकते नही। अगले क्षण फिर वैसा ही आहार देतें हैं। यों क्षण प्रतिक्षण आहार देतें चलते हैं।
किसी बात को लेकर क्रोध आया तो बड़ा नन्हा सा क्षण होता है क्रोध का, पलक झपकने मात्र में कितने ही शत- सहस्त्र कोटि बार उत्पन्न होकर नष्ट होने वाला क्षण। लेकिन क्रोध का संस्कार पैदा करते ही अगले क्षण फिर क्रोध पैदा किया। अगले क्षण फिर क्रोध ही क्रोध के सँस्कार इस चित्तधारा को देर तक आगे बढ़ाते चलतें हैं। कभी तो घंटो क्रोध चलता रहता है।
क्रोध रुका तो कोई और संस्कार बनाना शुरू कर देंगे। वह चलेगा देर तक। फिर कोई और। कभी भय। कभी वासना। कभी कुछ और।
यों पुराने संस्कारो के नष्ट होने की बारी ही नही आती।
क्षण-क्षण नया ही बनाये जा रहें हैं।

🌼यदि  हम संवर कर लें यानी रोक लगा दें तो नए संस्कार नही बनते। तब चित्तधारा किसके बल पर चलती है? क्योंकि हमने नया संस्कार नही बनाया, तो कोई न कोई संस्कार- बीज जिसका  फल हो सकता है, कुछ देर बाद आने वाला हो, अब जल्दी पककर आएगा। इसे विपाक का त्वर्तिकरण कह सकते हैं। तुरंत कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्तधारा पर अपना फल लेकर आता ही है। यही उदिरणा है।

🌺आया कोई  पुराना कर्म-संस्कार चित्त-धारा पर अपना फल लेकर और उसके सहारे चित्त धारा आगे बढ़ने लगी। जैसा कर्म था वैसा ही फल आया। हम उसे समता से, प्रज्ञा से देखने लगे तो हुआ निरोध उसका। जितने जितने पुराने संस्कार क्षीण होते चले जायेंगे उतना उतना हल्कापन आएगा ही। सही माने में सुख आएगा। दुःखो से छुटकारा होगा।

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🌷कर्म- विपाक🌷

विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहां दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।

यों एक के बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का ताँता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती जाती है।यह क्रम जितनी देर तक चलता है, उतनी देर तक खिणन पुराणं होता रहता है।

परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है तो साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अम्मतव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले अनित्य अनित्य करता रहे, परंतु वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर होती नहीं। अतः लगता है की यह तो नित्य है।

उस स्थूल ठोस पीड़ा की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है, जैसे कोई धुनिया कपास(रुई) की ग्रंथि को अपने धुनके के तार से प्रकम्पित कर खोलता है, कपास का एक एक तार अलग अलग कर देता है।

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🌹गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नही मानना चाहिये तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नही बनाती? निसर्ग तो भेद भाव करती नही न।

उत्तर--नही, निसर्ग कोई भेदभाव नही करता।

प्रकर्ति हमारा स्वभाव नही बनाती।

हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम इसी एक जीवन का नही है, अनेक जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है।

🌷परंतु यदि समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी होकर अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है।

प्रकृति तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किये गए अच्छे बुरे कर्म का फल देती है। इसमे वह रंच मात्र भी भेदभाव नही करती।

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🌹गुरूजी, जब कर्म का फल आनेवाला होता है तो विपश्यना उसे कैसे काट सकती है?

उत्तर--कर्म आएगा फल लेकर तो पहले संवेदना आएगी। संवेदना देखने लगेंगे तो जो फल आएगा वह दुर्बल हो जायेगा।
पेड़ में फल तो आया पर बड़ा ही नही हुआ, छोटा सा होकर गिर गया।
यही तो भगवान् बुद्ध ने ढूंढ निकाला। यही विद्या तो उन्होंने सीखी और लोगो को सिखाई।

🌷जो भी हमने सत्कर्म दुष्कर्म किया है उसका फल तो आएगा ही। हमने संवेदना के रूप में उसे देखना शुरू कर दिया तो उसकी ताकत ख़त्म हो जायेगी।
मान लो बड़ा फल आया भी तो कुछ नही होगा।हम मुस्कराते रहेंगे, आ भई आ!
जैसे किसी ने हमारा कुछ छीन लिया, ले लिया, तो क्या हुआ!
हम तो मुस्कुराते रहेंगे।
हमारे अच्छे कर्मो के अच्छे फल भी तो मिलेंगे। तो दुखी न होकर हमेशा प्रसन्न रहो।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

बौद्ध स्थल संकिसा जिला फर्रुखाबाद बुद्ध विहार संकिसा मैनपुरी जसराजपुर राजघाट संकिसा उत्तर प्रदेश

शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला पोस्ट भरखनी थाना पाली तहसील सवायजपुर जिला हरदोई उत्तर प्रदेश 
9198979617 

आपने भगवान गौतम बुद्ध के विषय में सुनने के साथ-साथ उनसे संबंधित स्थानों जैसे कि ‘गया’ और ‘सारनाथ’ के विषय में भी सुना होगा किंतु भारत में भगवान बुद्ध से संबंधित एक स्थान ऐसा भी है जिसके विषय में लोगों को कम ही जानकारी है। यह बौद्ध-धर्म स्थान ‘संकिशा’ या ‘संकिसा’ नाम से जाना जाता है। उत्तर प्रदेश राज्य के फ़र्रूख़ाबाद जिले में पखना रेलवे स्टेशन से सात मील दूर काली नदी के तट पर स्थित यह स्थान रामपुर से अधिक दूर नहीं है। कहा जाता है कि भगवान बुद्ध सोने की सीढ़ियों से स्वर्ग से उतरकर इसी स्थान पर इंद्र और ब्रह्मा के साथ आये थे। इस स्थान को तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथजी का ज्ञान स्थान भी माना जाता है। महात्मा बुद्ध अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर यहां आये और उन्होनें भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर बौद्ध संघ का द्वार स्त्रियों के लिए सदा के लिये खोल दिया।
बौद्ध ग्रंथों में इस नगर की गणना उस समय के बीस प्रमुख नगरों में की गयी है। प्राचीनकाल में यह नगर निश्चय ही काफी बड़ा रहा होगा क्योंकि इसकी नगर भित्ति के अवशेष लगभग चार मील (लगभग 6.4 कि.मी.) की परिधि में फैले हुए हैं। इस नगर का महत्व रामायण काल से है। रामायण काल में यह नगर ‘संकस्य नगर’ के रूप में जाना जाता था जिसके राजा महाराजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे। कहा जाता है कि दुष्ट राजा सुधन्वा द्वारा सीता का हाथ मांगे जाने पर राजा जनक ने सुधन्वा को युद्ध में मार दिया और संकस्य नगर अपने छोटे भाई कुशध्वज को दे दिया।

गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण (निधन) के बाद राजा अशोक ने इस स्थान को विकसित किया और अपने प्रसिद्ध स्तम्भों में से एक स्त्म्भ और स्तूप को यहां स्थापित किया। महात्मा बुद्ध की याद में उन्होंने यहां एक मंदिर भी बनवाया। यह मंदिर आज भी वहां मौजूद है जबकि स्तूप के भग्नावेशों को विशारी देवी के मंदिर का रूप दे दिया गया है। कठिन मार्ग और कोई सुविधा न होने के कारण तीर्थयात्रिओं ने कभी यहां का दौरा नहीं किया है। इस जगह की खोज 1842 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने की जिन्हें यहां स्कंदगुप्त का चांदी का सिक्का मिला था। इसके 87 साल बाद सर अनागरिका धर्मपाल आध्यात्म की खोज के लिये श्रीलंका से यहां आये। 1957 में पंडित मदबाविता विजेसोमा थेरो ने श्रीलंका से संकिसा आकर गरीब लोगों के लिए एक बौद्ध विद्यालय (विजेसोमा विदयालय) खोला। पाँचवीं शताब्दी में यहां आये चीनी यात्री फ़ाह्यान ने संकिसा का उल्लेख सेंग-क्यि-शी नाम से किया है। उसने यहां हीनयान और महायान सम्प्रदायों के एक हज़ार भिक्षुओं को देखा था। जापान, म्यांमार, चीन, कंबोडिया जैसे देशों के मठ इस छोटे से गांव में बने हुए हैं। जिससे इन देशों से भी लोग यहां आते हैं।
वर्तमान समय में इस स्थान का माहौल प्राचीन काल से बिल्कुल भिन्न है। जहां एक पक्ष बुद्ध के नाम पर खून बहाने की बात करता है तो वहीं दूसरा पक्ष भी सनातन धर्म की सहिष्णुता की कसमें खाकर तोड़फोड़ और गाली गलौज करता है। यहां हर साल बुद्ध पूर्णिमा और शरद पूर्णिमा जैसे मौकों पर बिसारी देवी के भक्तों और बौद्ध अनुयायियों में कहासुनी और हाथापाई हो जाती है। कुछ साल पहले तक यहां पत्थरबाजी भी थी। 2014 में दोनों पक्षों ने धर्म की खातिर जान देने की बातें भी की थी। दुनिया के 8 महत्वपूर्ण बौद्ध धार्मिक स्थानों में शामिल ये जगह इन विवादों के कारण पूरी तरह से पिछड़ी हुई है। अंतर्राष्ट्रीय पर्यटकों के आने का कोई भी फायदा स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है। आज की तारीख में यहां अच्छी पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं है और न ही लोगों के पास रोजगार हैं मगर हर कोई धर्म के नाम पर लड़ने और जान देने के लिए तैयार है। इस बात से यह स्पष्ट हो जाता है कि चाहे किसी स्थान का कितना ही प्राचीन महत्त्व क्यों न हो, धार्मिक कट्टरता उसकी प्रगति में अवश्य ही बाधा डाल सकती है तथा इसमें घाटा दोनों ही पक्षों का होता है।

अकेली स्त्री चरित्रहीन कैसे हो सकती है लेखक राहुल शास्त्री खदिया नगला


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क्या स्त्री अकेले ही चरित्रहीन हो सकती है

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स्त्री और पुरूष के लिए बहुत ही सुन्दर रचना दो मिनट का समय निकालकर एक बार आवश्य पढ़े !

स्त्री तबतक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती जबतक कि पुरुष चरित्रहीन न हो। संन्यास लेने के बाद गौतमबुद्ध ने अनेक क्षेत्रों की यात्रा की। एक बार वे एक गांव गए। वहां एक स्त्री उनके पास आई और बोली आप तो कोई राजकुमार लगते हैं। क्या मैं जान सकती हूँ कि इस युवावस्था में गेरुआ वस्त्र पहनने का क्या कारण है ? बुद्ध ने विनम्रतापूर्वक उत्तर दिया कि तीन प्रश्नों के हल ढूंढने के लिए उन्होंने संन्यास लिया। बुद्ध ने कहा- हमारा यह शरीर जो युवा व आकर्षक है वह जल्दी ही वृद्ध होगा फिर बीमार व अंत में मृत्यु के मुंह में चला जाएगा। मुझे वृद्धावस्था, बीमारी व मृत्यु के कारण का ज्ञान प्राप्त करना है। बुद्ध के विचारो से प्रभावित होकर उस स्त्री ने उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित किया। शीघ्र ही यह बात पूरे गांव में फैल गई। गांववासी बुद्ध के पास आए और आग्रह किया कि वे इस स्त्री के घर भोजन करने न जाएं क्योंकि वह चरित्रहीन है। बुद्ध ने गांव के मुखिया से पूछा- क्या आप भी मानते हैं कि वह स्त्री चरित्रहीन है ? मुखिया ने कहा कि मैं शपथ लेकर कहता हूं कि वह बुरे चरित्र वाली स्त्री है।आप उसके घर न जाएं। बुद्ध ने मुखिया का दायां हाथ पकड़ा और उसे ताली बजाने को कहा। मुखिया ने कहा- मैं एक हाथ से ताली नहीं बजा सकता क्योंकि मेरा दूसरा हाथ आपके द्वारा पकड़ लिया गया है। बुद्ध बोले इसी प्रकार यह स्वयं चरित्रहीन कैसे हो सकती है जबतक कि इस गांव के पुरुष चरित्रहीन न हो। अगर गांव के सभी पुरुष अच्छे होते तो यह औरत ऐसी न होती इसलिए इसके चरित्र के लिए यहाँ के पुरुष जिम्मेदार हैं l यह सुनकर सभी लज्जित हो गये लेकिन आजकल हमारे समाज के पुरूष लज्जित नहीं गौरवान्वित महसूस करते है क्योंकि यही हमारे "पुरूष प्रधान" समाज की रीति एवं नीति है
 
कैसा लगा ये प्रसंग ? कॉमेंट कर के बताइएे और ज्यादा से ज्यादा लोगो को शेयर करे।

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
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बुधवार, 11 दिसंबर 2019

khadiya nagla



🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲Rahul Singh bauddha kushwaha khadiya nagla bharkhani Hardoi utter Pradesh 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
 बौद्ध कथा वाचक राहुल कुशवाहा
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खदिया नगला एक ऐसा गांव है जहां के लोग आधे से ज्यादा बौद्ध धर्म को मानते है । जिसकी ग्राम पंचायत भरखनी व थाना पाली तहसील सवायजपुर

जिला हरदोई है ।

🌹शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध ने

इस गांव को उठाने के लिए तरस तरह के प्रयास किए

तथा गांव के अंदर सद्बुद्धि जागृत हो इसके लिए देश बिदेश से भिक्षुओ को बुलवाकर समय-समय पर प्रवचन करवाने का कार्य किया है ।

मैंने अपने समाज के लिए बहुत कुछ सोचने की जरूरत की है ।



साथियो अगर हम कामयाब हुए तो एक दिन अवश्य ही सफलता मिलेगी ।





🍀कोई चलता पद चिन्हो पर

कोई पदचिन्ह बनाते है

जो पदचिन्ह बनाते है

वह बुद्धिमान कहलाते है🍀


🌹🌹 अत्ताहि अत्तानो नाथो कोहिनाथो परोसिया ।

अत्तनाहि सुदन्तेन नाथं लभति दुल्लभं - - -!!!
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🌿अपना दीपक स्वयं बनो🌿

🌿अपने पर भरोसा रखो🌿

🌻क्योंकि आप ही अपने मालिक हैं🌻



और आपका मालिक कोई नही हो सकता ।।




🙏  मंगम् अशोक लाटम् मंगलं चकृध्वजे ।
मंगलं भीमा बिधानम् मंगलं जय भारती ----!!!


नमो बुध्दाय

जय सम्राट अशोक मौर्य



शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा

ग्राम खदिया नगला

पोस्ट भरखनी

थाना पाली

तहसील सवायजपुर

जिला हरदोई

उत्तर प्रदेश।।

पिता श्री शम्भू सिंह कुशवाहा

माता निर्वाण प्राप्त श्रध्देय  सुदामा कुशवाहा

पत्नी रीना सिंह कुशवाहा

भाई मोती लाल कुशवाहा

      🌹🌹नमो बुध्दाय 🌹🌹

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सब्बे सत्ता सुखी होन्तु सब्बे होन्तु च खेमिनो सब्बे भद्राणि पश्यन्तु मां कन्चि दुक्ख मां गमा।।
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सोमवार, 9 दिसंबर 2019

गौतम बुद्ध और ब्राह्मण लेखक राहुल शास्त्री





रविवार, 10 नवंबर 2019

तथागत बुध्द और ब्राह्मण के बीच तर्क


शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला ।।

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.*_¶  ब्राह्मण : मै जन्म से श्रेष्ठ हूँ।
.*_¶  बुध्द     : कैसे ?
.*_¶  ब्राह्मण : क्योंकि मै ब्राह्मण हूँ।
.*_¶  बुद्ध     : ठीक है, अच्छा एक बात बताइए आपके घर की महिलाए गर्भवती होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ होती है।
.*_¶  बुद्ध     : वैसे हि होती है, जैसे अन्य महिलाए होती है, या फिर कुछ अगल से ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ वैसे हि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : आपकी महिलाओं की गर्भावस्था उतने हि समय कि होती है, जितने समय कि, अन्य महिलाओं की होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ उतने हि समय कि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : बच्चे के जन्म लेने कि प्रक्रिया अर्थात प्रसूति भी लगभग वैसे हि होती है, जैसे अन्य महिलाओ के जरिए होती है ?
.*_¶  ब्राह्मण : हांँ वैसे हि होती है।
.*_¶  बुद्ध     : जब गर्भवती होने का तरीका, गर्भावस्था का समय और बच्चा प्रसूति का भी तरीका, ये सभीं प्रक्रियाएंँ एक हि समान है,
.*_¶  तो आप ब्राह्मण अपने आप को, किस आधार पर कहते है, कि हम ब्राह्मण पैदा होते, हि अर्थात जन्म से हि सर्व श्रेष्ठ होते है ......???
.*_¶  बुद्ध के इस प्रश्न का, ब्राह्मण के पास कोई उत्तर नही था .....
.*_¶  बुद्ध     : मतलब यह है, कि मानव अपने ऊच्च कर्म से श्रेष्ठ है अपने ऊच्चकर्म से हि महान है, ना कि जन्म से कोई भी सर्वश्रेष्ठ है.....

.*_¶  ब्राह्मण का राज उनके ज्ञान पर नहीं बल्की तुम्हारी अज्ञानता पर टिका है।
.*_¶  ब्राह्मण तुमसे पेड़ पुजवा सकता है,
पत्थर पुजवा सकता है, धरती, आकाश, जल, अग्नि, वायु, देहरी (चौखट), तस्वीर, लोहा, ईंट, पशु, पक्षी या जो कुछ भी उसे दिखाई दिया।
.*_¶  उसने तुमसे खुले आम पुजवा दिया।
और ये सब एक अनपढ़ ब्राह्मण ने, आपके पढ़े लिखे IAS, IPS, वक़ील, मजिस्ट्रेट, इंजीनियर, डॉक्टर शिक्षित लोगों से करवाया है।
.*_¶  फिर भी आप कैसे कह सकते हैं, कि आप ब्राह्मण के ग़ुलाम नही हैं ??

.*_¶  ब्राह्मणों की कहानी :
.*_¶  जब भूकम्प आने वाला हो तो उनको कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब हुदहुद तूफान आने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब ट्रेन पलटने वाली या लड़ने वाली हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब नोट बदलने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब अपने देश पर हमला होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब देश मे बंम बिस्फोट होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब केदार नाथ बाढ़ मे बह जाने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब भारत की राजधानी में किसी बस में लड़की का रेप होने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब देश मे आतंकवादी घूम रहे होते तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब सीमा के सैनिकों का गला कटने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नही होता,
.*_¶  जब चारों धाम जाते समय यात्री बस खाई मे गिरने वाला हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब कोई प्लेन लुप्त होने वाली हो तो ऊन को कुछ भी पता नहीं होता,
.*_¶  जब बारिश होने पर बिजली कड़कने वाली हो और किसी के ऊपर बिजली गिरने वाली हो तो इन्हें कुछ भी पता नहीं होता।

.*_¶  इनको केवल वह जरुर पता होता है, जो वास्तविकता में सम्भव हि नहीं है।
.*_¶  जैसे,.............
.*_¶  किसी पर ग्रह नक्षत्र दोष, पिछले जन्म का पाप, मरने के बाद स्वर्ग दिलाना,
.*_¶  माता-पिता को मरने के बाद बैठाना, बच्चे को सत्तईसा में पड़ना, आदि सभीं प्रकार कि अन्ध विश्वास और मनगढंत बातें।
.*_¶  जिनको पिछले जन्म की और स्वर्ग की जानकारी हो, वे ये सब क्यों नहीं जानते ?
.*_¶  इसलिए नहीं जानते है, क्योंकि ये सब देखे जा सकते हैं, हक़ीकत जाना जा सकता है।
.*_¶  अंधविश्वास या अंधश्रद्धा समाज और देश के लिये, एक विकृत कलंकित अभिशाप है,
.*_¶  अर्थात सर्व सामान्य समाज के लोग कोई भी जन्म से नही, बक्लि कर्म से श्रेष्ठ होते है।

KHADIYA NAGLA BHARKHANI

Rahul Singh bauddha kushwaha
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यदि मैं कहूँ कि
* एक आदमी 20 लीटर पानी एक बार मे पी गया
* एक #मेढक हाथी को निगल गया
*  भालू हवा में उड़ता है
* हलवा खा कर #महिला_गर्भवती  हो गई
* मगरमच्छ ने #इन्सान के बच्चे को जन्म दिया
* एक व्यक्ति ने अपनी एक उंगली  से ट्रक को उठा लिया ....

तो आपको इन बातों पर #यकीन नही होगा । चलिए अब इन सब #असंभव_घटनाओं को धर्म का चोला पहना देते हैं उसके बाद आपको फ़ौरन यह घटनाएं सच लगने लगेंगी ....

* एक ऋषि थे जो समुद्र का सारा पानी पी गए और समुद्र को सुखा दिया  था
* हनुमान ने अपने से खरबो गुना बड़े सूर्य को निगल लिया था
* हनुमान (एक बंदर)  हवा में बिना पंखों के उड़ लेते थे
* ऋषि का प्रसाद खा कर दशरथ की रानियां गर्भवती हो गई थी
* मछली के पेट से मकरध्वज (हनुमान का बेटा) पैदा हुआ था।
* कृष्ण ने अपनी एक उंगली पर गोवेर्धन पर्वत रख लिया था

क्यो, है न मज़ेदार । जो बात आपको हज़म न हो उसे धर्म का चोला पहना दो फिर देखो  कमाल , एक डॉक्टर, पीएचडी व MA/MBA वाला भी तुरंत यकीन कर लेगा