मुझे स्त्री का ज्ञान नहीं। 🙂 🙂
महर्षि विभांडक एक ब्रह्म ग्यानी ऋषि थे। और ब्रह्मचारी थे। अविवाहित थे। एक दिन स्नान करते समय उनका उनका वीर्य पतित हो गया और उसको एक हिरनी ने पी लिया। हिरनी के गर्भ से एक मनुष्य* का जन्म हुआ। ऋषि विभांडक ने उसको अपना पुत्र समझ कर पाला पोसा और वेदों का ऐसा ज्ञान दिया की उनका पुत्र सिद्ध पुरुष बन गया। देवता भी उसके दर्शन को तरसते थे। ऋषि ने अपने पुत्र का नाम रिश्रिंग रखा।।
महर्षि रिश्रिंग। जो एक तेजस्वी पुरुष थे।
उसी राज्य में राजा दशरथ रहते थे जो उसी राज्य के राजा थे। राजा दशरथ की तीन पत्निया थी लेकिन पुत्र नहीं था। राजा दशरथ ने एक कन्या गॉद ली थी जिसका नाम था “शांता”” जो बहुत सुन्दर थी।
राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु महर्षि वशिष्ठ से अनुरोध किया। ऋषि वशिष्ट बोले–हे महाराज, मै पुत्रोयोस्टी यज्ञ की सलाह दूंगा मगर आज ये यज्ञ सिर्फ महर्षि कुमार रिश्रिंग करवा सकते है क्युकी वही इसके योग्य है। और रिश्रिंग कभी भी अपनी कुटिया और वन के बाहर नहीं आते। उनको खुश करके राजमहल तक लाना बहुत बड़ी चुनौती है।।
राजा दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को रिश्रिंग के पास भेजा। शांता बहुत सुन्दर थी और रिश्रिंग को तो स्त्री क्या होती है पता भी न था।
रिश्रिंग ने वन में शांता को देखा तो बोले–ये कौन सा जीव है,दिखता मेरे जैसा है मगर मुझे आपनी तरफ आकर्षित कर रहा है।
रिश्रिंग शांता के पास गए और बोले–तुम कौन हो,तुम्हारी छाती में और मेरी छाती में अंतर क्यों है, स्तन की तरफ इशारा करके बोले, ये दो गोल गोल क्या है।।
शांता बोली–मै स्त्री हु।
रिश्रिंग बोले–स्त्री क्या होती है।
शांता ये बात जानती थी की ऋषि कुमार को स्त्री का ज्ञान नहीं है क्युकी इनको किसी स्त्री ने जन्म नहीं दिया।। और न ही ये वन के बाहर कभी निकले।।
शांता ने ऋषि कुमार को स्त्री पुरुष का अर्थ समझाया।।
रिश्रिंग शांता को देखकर उसके रूप यौवन के अधीन हो गए।।
शांता चली गयी और अगले दिन फिर आने का वादा किया।।
जीवन में पहली बार किसी स्त्री के दर्शन करने वाले रिश्रिंग बहुत बेचैन हो गए। अगले दिन वो शांता के आने की प्रतीक्षा करने लगे।
शांता फिर वन में आई और रिश्रिंग को काम(sex) का ज्ञान दिया और अपने प्रेम का इजहार रिश्रिंग से कर दिया।
रिश्रिंग पहले तो नहीं माने लेकिन बाद में शांता ने कहा–मै आपकी तन मन धन से सेवा करुँगी कृपया मेरा विवाह प्रस्ताव स्वीकार करे।
रिश्रिंग राजी हो गए और राजा दशरथ ने दोनों का विवाह करवा दिया। इस तरह रिश्रिंग की वन से बाहर निकाला गया और राजा दशरथ ने रिश्रिंग से पुत्र यज्ञ की इच्छा व्यक्त की।
रिश्रिंग ने यज्ञ करवाया और यज्ञ से यज्ञ पुरुष प्रगट हुए उन्होने राजा दशरथ को खीर दी जिसे खाकर उनकी रानियों ने राम, लक्ष्मन, भरत, शत्रुघ्न को जन्म दिया।।
प्रश्न ये है की महर्षि विभंडक के वीर्य से हिरनी कैसे गर्भवती हो गयी, वो तो पशु है स्त्री नहीं..??
उत्तर ये है की उस समय की तकनीक आज से ज्यादा आगे थी । वेद व्यास ने गांधारी के 100 पुत्रो को टेस्ट tube बेबी वाली तकनीक से जन्म दिया था। उसी प्रकार प्राचीन काल के सिद्ध ऋषि मुनि किसी भी मादा जीव से पुत्र प्राप्त करने की क्षमता रखते थे।
ऋषि गोकर्ण का जन्म गाय के पेट से हुआ था।। ऐसी बहुत सी घटनाएं है, जिनमें वेद-पूरानों के अधिकांश देवी-देवता ऋषि-मुनि मनु राणा-राव अप्राकृतिक, असामाजिक तरीके से पैदा हुए या घडे गये हैं।
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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी
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मंगलवार, 30 जून 2020
महा ऋषि बाभण्डक की कथा। काल्पनिक कहानियां
मुझे स्त्री का ज्ञान नहीं। 🙂 🙂
महर्षि विभांडक एक ब्रह्म ग्यानी ऋषि थे। और ब्रह्मचारी थे। अविवाहित थे। एक दिन स्नान करते समय उनका उनका वीर्य पतित हो गया और उसको एक हिरनी ने पी लिया। हिरनी के गर्भ से एक मनुष्य* का जन्म हुआ। ऋषि विभांडक ने उसको अपना पुत्र समझ कर पाला पोसा और वेदों का ऐसा ज्ञान दिया की उनका पुत्र सिद्ध पुरुष बन गया। देवता भी उसके दर्शन को तरसते थे। ऋषि ने अपने पुत्र का नाम रिश्रिंग रखा।।
महर्षि रिश्रिंग। जो एक तेजस्वी पुरुष थे।
उसी राज्य में राजा दशरथ रहते थे जो उसी राज्य के राजा थे। राजा दशरथ की तीन पत्निया थी लेकिन पुत्र नहीं था। राजा दशरथ ने एक कन्या गॉद ली थी जिसका नाम था “शांता”” जो बहुत सुन्दर थी।
राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु महर्षि वशिष्ठ से अनुरोध किया। ऋषि वशिष्ट बोले–हे महाराज, मै पुत्रोयोस्टी यज्ञ की सलाह दूंगा मगर आज ये यज्ञ सिर्फ महर्षि कुमार रिश्रिंग करवा सकते है क्युकी वही इसके योग्य है। और रिश्रिंग कभी भी अपनी कुटिया और वन के बाहर नहीं आते। उनको खुश करके राजमहल तक लाना बहुत बड़ी चुनौती है।।
राजा दशरथ ने अपनी पुत्री शांता को रिश्रिंग के पास भेजा। शांता बहुत सुन्दर थी और रिश्रिंग को तो स्त्री क्या होती है पता भी न था।
रिश्रिंग ने वन में शांता को देखा तो बोले–ये कौन सा जीव है,दिखता मेरे जैसा है मगर मुझे आपनी तरफ आकर्षित कर रहा है।
रिश्रिंग शांता के पास गए और बोले–तुम कौन हो,तुम्हारी छाती में और मेरी छाती में अंतर क्यों है, स्तन की तरफ इशारा करके बोले, ये दो गोल गोल क्या है।।
शांता बोली–मै स्त्री हु।
रिश्रिंग बोले–स्त्री क्या होती है।
शांता ये बात जानती थी की ऋषि कुमार को स्त्री का ज्ञान नहीं है क्युकी इनको किसी स्त्री ने जन्म नहीं दिया।। और न ही ये वन के बाहर कभी निकले।।
शांता ने ऋषि कुमार को स्त्री पुरुष का अर्थ समझाया।।
रिश्रिंग शांता को देखकर उसके रूप यौवन के अधीन हो गए।।
शांता चली गयी और अगले दिन फिर आने का वादा किया।।
जीवन में पहली बार किसी स्त्री के दर्शन करने वाले रिश्रिंग बहुत बेचैन हो गए। अगले दिन वो शांता के आने की प्रतीक्षा करने लगे।
शांता फिर वन में आई और रिश्रिंग को काम(sex) का ज्ञान दिया और अपने प्रेम का इजहार रिश्रिंग से कर दिया।
रिश्रिंग पहले तो नहीं माने लेकिन बाद में शांता ने कहा–मै आपकी तन मन धन से सेवा करुँगी कृपया मेरा विवाह प्रस्ताव स्वीकार करे।
रिश्रिंग राजी हो गए और राजा दशरथ ने दोनों का विवाह करवा दिया। इस तरह रिश्रिंग की वन से बाहर निकाला गया और राजा दशरथ ने रिश्रिंग से पुत्र यज्ञ की इच्छा व्यक्त की।
रिश्रिंग ने यज्ञ करवाया और यज्ञ से यज्ञ पुरुष प्रगट हुए उन्होने राजा दशरथ को खीर दी जिसे खाकर उनकी रानियों ने राम, लक्ष्मन, भरत, शत्रुघ्न को जन्म दिया।।
प्रश्न ये है की महर्षि विभंडक के वीर्य से हिरनी कैसे गर्भवती हो गयी, वो तो पशु है स्त्री नहीं..??
उत्तर ये है की उस समय की तकनीक आज से ज्यादा आगे थी । वेद व्यास ने गांधारी के 100 पुत्रो को टेस्ट tube बेबी वाली तकनीक से जन्म दिया था। उसी प्रकार प्राचीन काल के सिद्ध ऋषि मुनि किसी भी मादा जीव से पुत्र प्राप्त करने की क्षमता रखते थे।
ऋषि गोकर्ण का जन्म गाय के पेट से हुआ था।। ऐसी बहुत सी घटनाएं है, जिनमें वेद-पूरानों के अधिकांश देवी-देवता ऋषि-मुनि मनु राणा-राव अप्राकृतिक, असामाजिक तरीके से पैदा हुए या घडे गये हैं।
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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी
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गुरुवार, 25 जून 2020
नालंदा संकिसा Nālandā - Insatiable in Offering
आम्रपाली की कहानी।। कहानी आम्रपाली की
लेखक राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
(कहानी आम्रपाली की)
: यह कहानी है भारतीय इतिहास की सबसे खूबसूरत महिला के नाम से विख्यात ‘आम्रपाली’ की, जिसे अपनी खूबसूरती की कीमत वेश्या बनकर चुकानी पड़ी। वह किसी की पत्नी तो नहीं बन सकी लेकिन संपूर्ण नगर की नगरवधू जरूर बन गई। आम्रपाली ने अपने लिए ये जीवन स्वयं नहीं चुना था, बल्कि वैशाली में शांति बनाए रखने, गणराज्य की अखंडता बरकरार रखने के लिए उसे किसी एक की पत्नी बनाकर नगर को सौंप दिया गया।उसने सालो तक वैशाली के धनवान लोगों का मनोरंजन किया लेकिन जब वह तथागत बुद्ध के संपर्क में आई तो सबकुछ छोड़कर बौद्ध भिक्षुणी बन गई।
आम्रपाली के जैविक माता-पिता का तो पता नहीं लेकिन जिन लोगों ने उसका पालन किया उन्हें वह एक आम के पेड़ के नीचे मिली थी, जिसकी वजह से उसका नाम आम्रपाली रखा गया। वह बहुत खूबसूरत थी, उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और काया बेहद आकर्षक थी। जो भी उसे देखता था वह अपनी नजरें उस पर से हटा नहीं पाता था. लेकिन उसकी यही खूबसूरती, उसका यही आकर्षण उसके लिए श्राप बन गया। एक आम लड़की की तरह वो भी खुशी-खुशी अपना जीवन जीना चाहती थी लेकिन ऐसा हो नहीं सका। वह अपने दर्द को कभी बयां नहीं कर पाई और अंत में वही हुआ जो उसकी नियति ने उससे करवाया।
आम्रपाली जैसे-जैसे बड़ी हुई उसका सौंदर्य चरम पर पहुंचता गया जिसकी वजह से वैशाली का हर पुरुष उसे अपनी दुल्हन बनाने के लिए बेताब रहने लगा। लोगों में आम्रपाली की दीवानगी इस हद तक थी की वो उसको पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। यही सबसे बड़ी समस्या थी। आम्रपाली के माता-पिता जानते थे की आम्रपाली को जिसको भी सौपा गया तो बाकी के लोग उनके दुश्मन बन जाएंगे और वैशाली में खून की नदिया बह जाएंगी। इसीलिए वह किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहे थे।
इसी समस्या का हल खोजने के लिए एक दिन वैशाली में सभा का आयोजन हुआ। इस सभा में मौजूद सभी पुरुष आम्रपाली से विवाह करना चाहते थे जिसकी वजह से कोई निर्णय लिया जाना मुश्किल हो गया था। इस समस्या के समाधान हेतु अलग-अलग विचार प्रस्तुत किए गए लेकिन कोई इस समस्या को सुलझा नहीं पाया।
लेकिन अंत में जो निर्णय लिया गया उसने आम्रपाली की तकदीर को अंधेरी खाइयों में धकेल दिया। सर्वसम्मति के साथ आम्रपाली को नगरवधू यानि वेश्या घोषित कर दिया गया। ऐसा इसीलिए किया गया क्योंकि सभी जन वैशाली के गणतंत्र को बचाकर रखना चाहते थे। लेकिन अगर आम्रपाली को किसी एक को सौंप दिया जाता तो इससे एकता खंडित हो सकती थी। नगर वधू बनने के बाद हर कोई उसे पाने के लिए स्वतंत्र था। इस तरह गणतंत्र के एक निर्णय ने उसे भोग्या बनाकर छोड़ दिया।
लेकिन आम्रपाली की कहानी यही समाप्त नहीं होती है। आम्रपाली नगरवधू बनकर सालो तक वैशाली के लोगों का मनोरंजन करती है लेकिन जब एक दिन वो भगवान बुद्ध के संपर्क में आती है तो सबकुछ छोड़कर एक बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। आइये आम्रपाली के भिक्षुणी बनने की कहानी भी जान लेते है।
आम्रपाली और बुद्ध
बुद्ध अपने एक प्रवास में वैशाली आये। कहते हैं कि उनके साथ सैकड़ों शिष्य भी हमेशा साथ रहते थे। सभी शिष्य प्रतिदिन वैशाली की गलियों में भिक्षा मांगने जाते थे।
वैशाली में ही आम्रपाली का महल भी था। वह वैशाली की सबसे सुन्दर स्त्री और नगरवधू थी। वह वैशाली के राजा, राजकुमारों, और सबसे धनी और शक्तिशाली व्यक्तियों का मनोरंजन करती थी। एक दिन उसके द्वार पर भी एक भिक्षुक भिक्षा मांगने के लिए आया। उस भिक्षुक को देखते ही वह उसके प्रेम में पड़ गयी। वह प्रतिदिन ही राजा और राजकुमारों को देखती थी पर मात्र एक भिक्षापात्र लिए हुए उस भिक्षुक में उसे अनुपम गरिमा और सौंदर्य दिखाई दिया।
वह अपने परकोटे से भागी आई और भिक्षुक से बोली – “आइये, कृपया मेरा दान गृहण करें” .
उस भिक्षुक के पीछे और भी कई भिक्षुक थे। उन सभी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। जब युवक भिक्षु आम्रपाली की भवन में भिक्षा लेने के लिए गया तो वे ईर्ष्या और क्रोध से जल उठे।
भिक्षा देने के बाद आम्रपाली ने युवक भिक्षु से कहा – “तीन दिनों के बाद वर्षाकाल प्रारंभ होनेवाला है, मैं चाहती हूँ कि आप उस अवधि में मेरे महल में ही रहें.”
युवक भिक्षु ने कहा – “मुझे इसके लिए अपने स्वामी तथागत बुद्ध से अनुमति लेनी होगी। यदि वे अनुमति देंगे तो मैं यहाँ रुक जाऊँगा।”
उसके बाहर निकलने पर अन्य भिक्षुओं ने उससे बात की। उसने आम्रपाली के निवेदन के बारे में बताया। यह सुनकर सभी भिक्षु बड़े क्रोधित हो गए। वे तो एक दिन के लिए ही इतने ईर्ष्यालु हो गए थे और यहाँ तो पूरे चार महीनों की योजना बन रही थी! युवक भिक्षु के बुद्ध के पास पहुँचने से पहले ही कई भिक्षु वहां पहुँच गए और उन्होंने इस वृत्तांत को बढ़ा-चढ़ाकर सुनाया – “वह स्त्री वैश्या है और एक भिक्षु वहां पूरे चार महीनों तक कैसे रह सकता है!?”
बुद्ध ने कहा – “शांत रहो, उसे आने दो। अभी उसने रुकने का निश्चय नहीं किया है, वह वहां तभी रुकेगा जब मैं उसे अनुमति दूंगा।”
युवक भिक्षु आया और उसने बुद्ध के चरण छूकर सारी बात बताई – “आम्रपाली यहाँ की नगरवधू है। उसने मुझे चातुर्मास में अपने महल में रहने के लिए कहा है। सारे भिक्षु किसी-न-किसी के घर में रहेंगे। मैंने उसे कहा है कि आपकी अनुमति मिलने के बाद ही मैं वहां रह सकता हूँ।”
बुद्ध ने उसकी आँखों में देखा और कहा – “तुम वहां रह सकते हो।”
यह सुनकर कई भिक्षुओं को बहुत बड़ा आघात पहुंचा। वे सभी इसपर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि बुद्ध ने एक युवक शिष्य को एक वैश्या के घर में चार मास तक रहने के लिए अनुमति दे दी। तीन दिनों के बाद युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में रहने के लिए चला गया। अन्य भिक्षु नगर में चल रही बातें बुद्ध को सुनाने लगे – “सारे नगर में एक ही चर्चा हो रही है कि एक युवक भिक्षु आम्रपाली के महल में चार महीनों तक रहेगा!”
बुद्ध ने कहा – “तुम सब अपनी चर्या का पालन करो। मुझे अपने शिष्य पर विश्वास है। मैंने उसकी आँखों में देखा है कि उसके मन में अब कोई इच्छाएं नहीं हैं। यदि मैं उसे अनुमति न भी देता तो भी उसे बुरा नहीं लगता। मैंने उसे अनुमति दी और वह चला गया। मुझे उसके ध्यान और संयम पर विश्वास है। तुम सभी इतने व्यग्र और चिंतित क्यों हो रहे हो? यदि उसका धम्म अटल है तो आम्रपाली भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। और यदि उसका धम्म निर्बल है तो वह आम्रपाली के सामने समर्पण कर देगा। यह तो भिक्षु के लिए परीक्षण का समय है। बस चार महीनों तक प्रतीक्षा कर लो, मुझे उसपर पूर्ण विश्वास है। वह मेरे विश्वास पर खरा उतरेगा।”
उनमें से कई भिक्षुओं को बुद्ध की बात पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने सोचा – “वे उसपर नाहक ही इतना भरोसा करते हैं। भिक्षु अभी युवक है और आम्रपाली बहुत सुन्दर है। वे भिक्षु संघ की प्रतिष्ठा को खतरे में डाल रहे हैं।” – लेकिन वे कुछ कर भी नहीं सकते थे।
चार महीनों के बाद युवक भिक्षु विहार लौट आया और उसके पीछे-पीछे आम्रपाली भी बुद्ध के पास आई।आम्रपाली ने बुद्ध से भिक्षुणी संघ में प्रवेश देने की आज्ञा माँगी। उसने कहा – “मैंने आपके भिक्षु को अपनी ओर खींचने के हर संभव प्रयास किये पर मैं हार गयी। उसके आचरण ने मुझे यह मानने पर विवश कर दिया कि आपके चरणों में ही सत्य और मुक्ति का मार्ग है। मैं अपनी समस्त सम्पदा भिक्षु संघ के लिए दान में देती हूँ। ”
आम्रपाली के महल और उपवनों को चातुर्मास में सभी भिक्षुओं के रहने के लिए उपयोग में लिया जाने लगा। आगे चलकर वह बुद्ध के संघ में सबसे प्रतिष्ठित भिक्षुणियों में से एक बनी।
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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला भरखनी
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मंगलवार, 16 जून 2020
विपस्सना पालि शब्द है यह गौतम बुद्ध द्वारा बताई गई एक बौद्ध योग साधना हैं। विपश्यना का अर्थ है – विशेष प्रकार से देखना…इसे मेडिटेशन भी कहते हैं जो व्यक्ति में एकग्रता, सकारात्मकता के साथ दया और प्रेम की भावना को बढ़ाता है ।
▪ विपस्सना पालि शब्द है यह गौतम बुद्ध द्वारा बताई गई एक बौद्ध योग साधना हैं। विपश्यना का अर्थ है – विशेष प्रकार से देखना…इसे मेडिटेशन भी कहते हैं जो व्यक्ति में एकग्रता, सकारात्मकता के साथ दया और प्रेम की भावना को बढ़ाता है ।
▪ विपश्यना भारत की एक प्राचीन ध्यान विधि है, जिसे 2500 वर्ष पूर्व इसी देश में भगवान गौतम बुद्ध ने की और लोगों के कल्याण के लिए इसे सर्वसुलभ बनाया । उन्होंने इसका खुद अभ्यास किया और लोगों को करवाया, यह उसका सार हैं। बुद्ध के समय उत्तर भारत के बहुतायात लोग विपश्यना के अभ्यास से दुःख मुक्त हुए और जीवन खुशियों से भर गया। समय के साथ-साथ यह विद्या बर्मा, थाइलैंड आदि देशों में फैल गई और लोगों का कल्याण करने लगी, लेकिन बुद्ध के निर्वाण के कोई पाँच सौ साल बाद विपश्यना विधि की शुद्धता नष्ट हो गई और यह भारत से लुप्त हो गई, परंतु बर्मा में इस विद्या के प्रति समर्पित आचार्यो ने इसे शुद्घ रूप में कायम रखा।
▪ भगवान बुद्ध ने ध्यान की ‘विपश्यना-साधना’ द्वारा बुद्धत्व प्राप्त किया था। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं में से एक विपश्यना भी है। यह वास्तव में सत्य की उपासना है। सत्य में जीने का अभ्यास है। विपश्यना इसी क्षण में यानी तत्काल में जीने की कला है। भूत की चिंताएं और भविष्य की आशंकाओं में जीने की जगह भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को आज के बारे में सोचने के लिए कहा। विपश्यना सम्यक् ज्ञान है। विपश्यना जीवन की सच्चाई से भागने की शिक्षा नहीं देता है, बल्कि यह जीवन की सच्चाई को उसके वास्तविक रूप में स्वीकारने की प्रेरणा देता है।
▪ मेडिटेशन मनोविज्ञान पर आधारित होता है, जिसके अभ्यास से व्यक्ति भावनात्मक रूप से शांत और सकारात्मक रहता है। इसमें व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा और प्रेम भाव बढ़ता है। इसको करने के लिए सबसे पहले आरामदायक मुद्रा में बैठ जाएं और अपने भीतर प्रेम भाव को महसूस करें और इस बात पर ध्यान दें कि आप स्वस्थ है। अपने भीतर आत्मविश्वास को जगाने के लिए यह मेडिटेशन काफी जरुरी माना जाता है। इसके बाद अगले चरण में अपने उस मित्र को याद करें और जो आपके सबसे करीब है और उसके साथ बिताये सभी अच्छे पलों को याद करें। इसके बाद उस व्यक्ति का ध्यान करें जिसके बारे में आप कभी भी कुछ नहीं सोचते हैं। उनके लिए अपने भीतर प्रेम जागृत करें। इससे आपके भीतर दूसरों के प्रति प्रेम और दया की भावना जागृत होगी और जिसके कारण आप आन्तरिक रूप से खुश रहते हैं।
▪ मेडिटेशन में व्यक्ति का सारा ध्यान उसकी सांसो पर होता है। इसमें व्यक्ति अपने श्वास की आवाजाही पर अपना ध्यान केन्द्रित करके अपने भीतर एकाग्रता की क्षमता को बढ़ाता है । जिससे आपके भीतर किसी भी काम पर ध्यान देने की क्षमता बढ़ेगी और एकाग्र मन से आप किसी भी काम और बेहतर तरीके से कर पाएंगे ।
▪ शरीर की रोग-प्रतिरोधी शक्ति में वृद्धिरक्तचाप में कमीतनाव में कमीस्मृति-क्षय में कमी (स्मरण शक्ति में वृद्धि)वृद्ध होने की गति में कमी
▪ मन शान्त होने पर उत्पादक शक्ति बढती है, लेखन आदि रचनात्मक कार्यों में यह विशेष रूप से लागू होता है।
▪ ध्यान से हमे अपने जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता मिलती है। इसी तरह किसी कार्य का उद्देश्य एवं महत्ता का सही ज्ञान हो पाता है।
▪ मन की यही आदत है कि वह छोटी-छोटी अर्थहीन बातों को बड़ा करके गंभीर समस्यायों के रूप में बदल देता है। ध्यान से हम अर्थहीन बातों की समझ बढ जाती है; उनकी चिन्ता करना छोड़ देते हैं , सदा बडी तस्वीर देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं।
▪ वैज्ञनिकों के अनुसार ध्यान से व्यग्रता का 40 प्रतिशत तक नाश होता है और मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ती है। बौद्ध धर्म में इसका उल्लेख मिलता है ।
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