गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

हिंदु मंदिर में नारियल क्यो फोड़ा जाता है?

हिंदु मंदिर में नारियल क्यो फोड़ा जाता है?
?इसके बारे में यह ऐतिहासिक जानकारी होना जरूरी है.......

मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चक्रवर्ति सम्राट अशोक के वंशज मोर्य वंश के बौद्ध सम्राट राजा बृहद्रथ मोर्य की हत्या उसी के सेनापति ब्राह्मण पुष्यमित्र शुंग ने धोखे से की थी और खुद को मगध का राजा घोषित कर लिया था ।
उसने राजा बनने पर पाटलिपुत्र से श्यालकोट तक सभी बौद्ध विहारों को ध्वस्त करवा दिया था तथा अनेक बौद्ध भिक्षुओ का कत्लेआम किया था।पुष्यमित्र शुंग, बौद्धों पर बहुत अत्याचार करता था और ताकत के बल पर उनसे ब्राह्मणों द्वारा रचित मनुस्मृति अनुसार वर्ण (हिन्दू) धर्म कबूल करवाता था।
*इसके बाद ब्राह्मण* *पुष्यमित्र शुंग ने अपने समर्थको के साथ मिलकर पाटलिपुत्र और श्यालकोट के मध्य क्षेत्र पर अधिकार किया और अपनी राजधानी साकेत को बनाया।
पुष्यमित्र शुंग ने इसका नाम बदलकर अयोध्या कर दिया। अयोध्या अर्थात-बिना युद्ध के बनायीं गयी राजधानी*…
*राजधानी बनाने के बाद पुष्यमित्र शुंग ने घोषणा की कि जो भी व्यक्ति, भगवाधारी बौद्ध भिक्षु का सर(सिर) काट कर लायेगा, उसे 100 सोने की मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी।

*इस तरह सोने के सिक्कों के लालच में पूरे देश में बौद्ध भिक्षुओ का कत्लेआम हुआ।

राजधानी में बौद्ध भिक्षुओ के सर आने लगे ।

इसके बाद कुछ चालक व्यक्ति अपने लाये सर को चुरा लेते थे और उसी सर को दुबारा राजा को दिखाकर स्वर्ण मुद्राए ले लेते थे। राजा को पता चला कि लोग ऐसा धोखा भी कर रहे है तो राजा ने एक बड़ा पत्थर रखवाया और राजा ,बौद्ध भिक्षु का सर देखकर उस पत्थर पर मरवाकर उसका चेहरा बिगाड़ देता था* । इसके बाद बौद्ध भिक्षु के सर को घाघरा नदी में फेंकवा दता था*।
*राजधानी अयोध्या में बौद्ध भिक्षुओ के इतने सर आ गये कि कटे हुये सरों से युक्त नदी का नाम सरयुक्त अर्थात “सरयू” हो गया*।
*इसी “सरयू” नदी के तट पर पुष्यमित्र शुंग के राजकवि वाल्मीकि ने “रामायण” लिखी थी।* *जिसमें राम के रूप में पुष्यमित्र शुंग और रावण के रूप में मौर्य सम्राट का वर्णन करते हुए उसकी राजधानी अयोध्या का गुणगान किया था और राजा से बहुत अधिक पुरस्कार पाया था।
*इतना ही नहीं, रामायण, महाभारत, स्मृतियां आदि बहुत से काल्पनिक ब्राह्मण धर्मग्रन्थों की रचना भी पुष्यमित्र शुंग की इसी अयोध्या में “सरयू” नदी के किनारे हुई।
*बौद्ध भिक्षुओ के कत्लेआम के कारण सारे बौद्ध विहार खाली हो गए।तब आर्य ब्राह्मणों ने सोचा’ कि इन बौद्ध विहारों का क्या करे की आने वाली पीढ़ियों को कभी पता ही नही लगे कि बीते वर्षो में यह क्या थे* ?*
*तब उन्होंने इन सब बौद्ध विहारों को मन्दिरो में बदल दिया और इसमे अपने पूर्वजो व काल्पनिक पात्रो को भगवान बनाकर स्थापित कर दिया और पूजा के नाम पर यह दुकाने खोल दी*।
*ध्यान रहे उक्त ब्रह्दथ मोर्य की हत्या से पूर्व भारत में मन्दिर शब्द ही नही था ना ही इस तरह की संस्क्रति थी।वर्तमान में ब्राह्मण धर्म में पत्थर पर मारकर नारियल फोड़ने की परंपरा है ये परम्परा पुष्यमित्र शुंग के बौद्ध भिक्षु के सर को पत्थर पर मारने का प्रतीक है*।
*पेरियार रामास्वामी नायकर ने भी ” सच्ची रामायण” पुस्तक लिखी जिसका इलाहबाद हाई कोर्ट केस नम्बर* *412/1970 में वर्ष 1970-1971 व् सुप्रीम कोर्ट 1971 -1976 के बिच में केस अपील नम्बर 291/1971 चला* ।
*जिसमे सुप्रीमकोर्ट के जस्टिस पी एन भगवती जस्टिस वी आर कृषणा अय्यर, जस्टिस मुतजा फाजिल अली ने दिनाक 16.9.1976 को निर्णय दिया !
की सच्ची रामायण पुस्तक सही है और इसके सारे तथ्य वेध है*।
*सच्ची रामायण पुस्तक यह सिद्ध करती है!
कि ” रामायण नामक देश में जितने भी ग्रन्थ है वे सभी काल्पनिक है और इनका पुरातातविक कोई आधार नही है*।
*अथार्त् फर्जी है*।

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

हिन्दू धर्म बिवाह संस्कार




भाँग धतुरा पी पी कर
    तुम हुडदंग खूब मचाओगे ll

जितना चाहो भक्ति कर लो
        शूद्र ही कहलाओगे  l

सम्मान नही मिलना तोले भर
    मंदिर से निकाले जाओगे ll

भूल गये पिछले वर्षों की
   मंदिरों से तुम्हे भगाया था l

अछूत बता कर पूर्वजों को
    स्कूल के बाहर बैठाया था ll

 इतिहास के पन्ने याद करो
     मैला तुम से ढुलवाया था l

जोर जुल्म कर देव भक्तों ने
    हरिजन तुम्हे बनाया था  ll

इतने अपमान के बावजूद भी
     भजन कीर्तन गाते हो l

 पुजारी के पीछे हो कर खड़े
      आरती खूब सुनाते हो ll

दलित पशु बताया "तुलसी"  ने
फ़िर भी घंटा खूब बजाते हो ll

न तुम सुधरे न सुधरोगे
  अपमान अपना कराओगे l

*जितना चाहो भक्ति करलो *
 *शूद्र , अछूत ही कहलाओगे ll*

🍁🙏🏻जय भीम जय भारत 🙏🏻

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

शीलसागर भरतपुर राजस्थानी हाल दौसा राजस्थान ।

“औषधि होत नहीं गुणकारी

ठीक यदि अनुपान नहीं ।

बोले मुख से करे न कर से

वह नर बुद्धिमान नहीं…….।

‘अवतारवाणी’ में शहन्शाह “अवतारसिंह”

निरंकारी बाबा ने स्पष्ट किया

जिसका कविवर पूर्णपकाश “साकी” ने पद्यानुवाद

किया है ।

यह बात ‘सोलह आने’ सटीक है,

कबीर साहब ने सत्य कहा कि

“कहनी के शूरा घने थोथे

बाँधैं तीर।

वे घायल वा नाम के जिनके विकल शरीर।।”

“कथनी मीठी खाँड़ सी करनी विष की लोय।

कथनी तज करनी करै विष से

अमृत होय।।”

अर्थात् कहनी के शूरवीर घने, (फैंकू) मिल जायैंगे किन्तु वे थोथे गाल बजाने वाले हैं

जैसे ‘पौंगा’ काल्पनिक ईश्वर के लिये शूर बना फिरता है वअन्धे

भक्त भय वश वैसे ही विकल ( दु:खी) तन के लिए भटकते हैं ।

कथनी तो चाशनी में सरावोर वाणी है , करनी आग पर धावने जैसी है , जो कथनी को तज कर करनी करता है वह अमृत पान करता है ।

इसीलिये भगवान बुद्ध ने शीलाचरण पर बलदिया कि श्रमण हो या उपासक चरित्रवान सदा सुख भोगता है ।

आपने कहा है कि तगर-चन्दन की गन्ध हवा के साथ बहती है

लेकिन शीलाचरण की सुगन्ध

विपरीत दिशा यानी चतुर्दिक जाती है ।

इसीलिये यदि औषधि अनुपान से समय-समय पर नित्यप्रति ली जाये तभी रोग दूर हो सकता है ।

गुड़-गुड़ चल्लाने मात्र से

कबीरानुसार मुँह मीठा नहीं हो सकता ।

अस्तु।

भिक्षु

शीलसागर

भरतपुर

राजस्थानी

हाल

दौसा

राजस्थान ।

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शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध खदिया नगला हरदोई

उत्तर प्रदेश भारत

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बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

ज्योतिबा राव फुले के विचार







मैं भी मंदिर बहुत गया हूँ।
मंदिर में रखी मूर्ति के भोग भी बहुत लगाये हैं।
भगवान के चरणों में रूपये भी बहुत रखे हैं।

परंतु कभी किसी भगवान को मैंने भक्त के लिए मंदिर के बंद दरवाजें खोलते हुए नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को मेरे द्वारा चढ़ाये गये भोग को सेवन करते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को पानी पीते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को नहाते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को कपड़ें लेकर पहनते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को टॉयलेट जाते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान को उसके हाथ से पैसे पकड़ते नहीं देखा।
कभी किसी भगवान ने आशीर्वाद देने के लिए मेरे सिर पर हाथ नहीं रखा।
कभी किसी भगवान ने मुझे गले नहीं लगाया।
कभी किसी भगवान को मैंने मुझे दु:ख-दर्द, परेशानी में मुझे संभालते नहीं देखा।

*क्या देखा ?*
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भगवान के नाम पर भोग खाते पुजारी को देखा।
भगवान के नाम पर पैसे लेते पुजारी को देखा।
भगवान के नाम पर कपड़ें लेते और पहनते पुजारी को देखा।
भगवान के मंदिर में से पैसे उठाते पुजारी को देखा।
भगवान के मंदिर में चढाये पैसों से मालामाल होते पुजारी को देखा।

मैं बेवकूफ मंदिर गया भगवान को मानने और मान बैठा इंसान को।
आस्था का सैलाब तो देखों कि जब पुजारी  को भगवान को लूटते देखा तो खुश हुआ,
परंतु भगवान के चढ़ावें को खुद उठाने से डरता था कि भगवान पर चढ़ाया हुआ लेना पाप है। भगवान नाराज होकर श्राप दे देगा।
क्या मानसिकता थी कि भगवान के नाम का तो पुजारी ही ले सकता हैं, मैं ले लूँ तो चोर, लुटेरा, अधर्मी कहलाउंगा।

वाह रे इंसान, तू भगवान की मूर्ति के चक्कर में एक नालायक, चोर, लुटेरे इंसान  को भगवान मान बैठा।

इंसान को भगवान मानने की गलती करने के लिये मुझे क्षमा करें  ।
ढोंग ,पाखण्ड , आडम्बर , भाग्य और भगवान , अन्धविश्वास भगाओ अभियान
दिमाग की बत्ती जलाओ
अपना दिपक खुद बनो

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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
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शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2020

गर्गी कॉलेज की घटना से पिछले वर्ष NCERT


गा

र्गी कॉलेज की घटना से पिछले वर्ष NCERT के सिलेबस से केरल की दलित महिलाओं के अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को ढकने के अधिकार को लेकर लड़ी गई लड़ाई की गाथा को निकाल देने की खबर याद आ गई.

जी हां! विश्वगुरुओं के देश में स्तन को ढकने का अधिकार!

इसके बदले में अटल बिहारी वाजपेयी की कविता सिलेबस में शामिल की गई है.

ऐसा क्यों हुआ ? आप खुद सोचियेगा.

इस पर कपार फोड़ने के बजाय आइये जानते है उन महिलाओं के मर्मान्तक संघर्ष को.

केरल के त्रावणकोर के ब्राह्मण राज्य में गैरब्राह्मण महिलाओं को स्तन ढकने की मनाही थी, साथ ही महिलाओं पर स्तन टैक्स लगाया जाता था. वे बिना टैक्स चुकाए अपने नवजात शिशु को अपने ही स्तन से दूध नही पिला सकतीं थीं.

केरल के चेर्थाला की दलित महिला नांगेली, जब माँ बनी तो उसके पास टैक्स चुकाने को पैसे नहीं थे. लिहाजा उसे उसके नवजात बच्चे से दूर कर दिया गया.

इस बात से नांगेली इतनी आहत हुई कि उसने विरोध स्वरुप अपने स्तन काटकर टैक्स अधिकारियों को दे दिये.

इसके बाद उनकी मौत हो गई.

उनके पति चिरुकंडन जब घर लौटकर आये तो उन्होंने भी आत्महत्या कर ली.

इसके बाद इस कुप्रथा के खिलाफ तीव्र आंदोलन हुआ.

1812 में ब्राह्मण राजा को टैक्स की यह कुप्रथा बंद करने के लिए बाध्य होना पड़ा लेकिन इसके बाद भी गैरब्राहमण महिलाओं को स्तन ढंकने के अधिकार से वंचित रखा गया.

स्तन ढकने के लिए अंग वस्त्र पहनने के अधिकार के लिए अय्यंकाली के नेतृत्व में लंबी लड़ाई चली, अगले चार दशकों तक यह लड़ाई चली , तब जाकर ब्राह्मण राजा से यह अधिकार पाया जा सका.

केरल में उस समय न सिर्फ अवर्ण बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे.

नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था. वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं.

लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था.

नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था.

सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी.

पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी.

इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं.

इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कोशिश करती रहीं. यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ. ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे.

जो भी इस नियम की अवहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता.

अवर्ण औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते.

यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें.

Post ko share jaroor Karen jisase…sabhi ko pata chal sake ki brahmano ne kitani havaniyat ki huden paar ki……

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2020

शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा






गौतम बुद्ध को भगवान बुद्ध व महात्मा बुद्ध आदि नामों से भी जाना जाता है। वे विश्व प्रसिद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक माने जाते हैं। गौतम बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व लुम्बिनी में हुआ था। उनका नाम सिद्धार्थ रखा गया। उनके पिता का नाम शुद्धोधन था। सिद्धार्थ ने गुरू विश्वामित्र के पास वेद और उपनिषद्‌ तो पढ़े ही, राजकाज और युद्ध-विद्या की भी शिक्षा ली। सिद्धार्थ के मन में बचपन से ही करुणा भरी थी। उनसे किसी भी प्राणी का दुख नहीं देखा जाता था। महात्मा बनने से पहले बुद्ध एक राजा थे। वो बचपन से ही ऐसे प्रश्नों के उत्तर की तलाश में खोए रहते थे जिनका जवाब बड़े- बड़े संत और महात्माओं के पास भी नहीं था। बुद्ध विवाह के बाद ही अपने परिवार को छोड़कर सत्य की तलाश में निकल पड़े थे और ज्ञान की प्रप्ति की। बुद्ध के उपदेश आज भी लोगों का मार्गदर्शन कर रहे हैं।
प्रस्तुत है गौतम बुद्ध की बीस प्रमुख शिक्षाएं-  
  • यदि आप वास्तव में ही अपने आप से प्रेम करते हैं,तो आप कभी भी दूसरों को दुःख नहीं पहुंचा सकते।
  • अपना रास्ता स्वयं बनाएंहम अकेले पैदा होते हैं और अकेले मृत्यु को प्राप्त होते हैं, इसलिए हमारे अलावा कोई और हमारी किस्मत का फैसला नहीं कर सकता। 
  • स्वास्थ्य सबसे बड़ा उपहार है,संतोष सबसे बड़ा धन है और वफादारी सबसे बड़ा सम्बन्ध है। 
  • अच्छी चीजों के बारे में सोचें– हम वही बनते हैं जो हम सोचते हैं। इसलिए सकारात्मक बातें सोचें और खुश रहें। 
  • आकाश में पूरब और पश्चिम का कोई भेद नहीं है,लोग अपने मन से भेदभाव को जन्म देते हैं और फिर विश्वास करते हैं कि यह सच है। 
  • आपको क्रोधित होने के लिए दंड नहीं दिया जायेगा,बल्कि आपका क्रोध खुद आपको दंड देगा। 
  • इंसान के अंदर ही शांति का वास होता है,उसे बाहर ना तलाशें। 
  • एक जलते हुए दीपक से हजारों दीपक रौशन किए जा सकते हैं,फिर भी उस दीपक की रौशनी कम नहीं होती। उसी तरह खुशियां बांटने से बढ़ती हैं, कम नहीं होतीं।  
  • क्रोधित रहना,जलते हुए कोयले को किसी दूसरे व्यक्ति पर फेंकने की इच्छा से पकड़े रहने के समान हैयह सबसे पहले आप को ही जलाता है। 
  • दूसरों के सामने कुछ भी साबित करने से पहले यह जरूरी है कि हम खुद को साबित करें। हर इंसान की प्रतिस्पर्धा पहले खुद से होती है।
  • खुशी हमारे दिमाग में है- खुशी,पैसों से खरीदी गई चीजों में नहींबल्कि इस बात में है कि हम कैसा महसूस करते हैं। वास्तव में खुशी हमारे मस्तिष्क में है।
  • घृणा से घृणा कभी खत्म नहीं हो सकती। घृणा को केवल प्रेम द्वारा ही समाप्त किया जा सकता है। यह शास्वत सत्य है।
  • जिस तरह एक मोमबत्ती बिना आग के खुद नहीं जल सकती,उसी तरह एक इंसान बिना अध्यात्म के जीवित नहीं रह सकता। 
  • तीन चीजों को लम्बी अवधि तक छुपाया नहीं जा सकता,सूर्य, चन्द्रमा और सत्य। 
  • भूतकाल में मत उलझो,भविष्य के सपनों में मत खो जाओवर्तमान पर ध्यान दोयही खुश रहने का रास्ता है। 
  • मैं कभी नहीं देखता की क्या किया जा चुका है;मैं हमेशा देखता हूँ कि क्या किया जाना बाकी है। 
  • हजारों लड़ाइयां जीतने से बेहतर है आप खुद को जीत लें।फिर वो जीत आपकी अपनी होगीजिसे कोई आपसे नहीं छीन सकता। 
  • हर अनुभव कुछ न कुछ सिखाता हैहर अनुभव महत्वपूर्ण है, क्योंकि हम अपनी गलतियों से ही सीखते हैं। 
  • हर इंसान को यह अधिकार है कि वह अपनी दुनिया की खोज स्वयं करे।
  • हर दिन की अहमियत समझें इंसान हर दिन एक नया जन्म लेता है एक नए मकसद को पूरा करने के लिए है,इसलिए एक- एक दिन की अहमियत समझें।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2020

बुद्ध सरोवर शिलान्यास समारोह ग्राम भिलौलिया

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एतिहासिक कार्य की ओर अग्रसर भिलौलिया…

आपको जानकर खुशी होगी कि बुद्ध तीर्थ स्थल भिलौलिया में बुद्ध सरोवर बनेगा जिसमें भगवान बुद्ध की 24 फुट ऊंची प्रतिमा एवं फ़ूब्बारे लगाए जाएंगे जिसका शिलान्यास 14 मार्च को मुख्य अतिथि आदरणीय डॉ नवल किशोर शाक्य जी के द्वारा किया जाएगा l जिसको लेकर कमेटी के लोगों ने तैयारी शुरू कर दी है l

आप सभी इस एतिहासिक कार्यक्रम में सादर आमंत्रित हैं l

आपका छोटा भाई

Er jayprakash shakya

9761481923

जिला बदायूं

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Shastri Rahul Singh bauddha kushwaha

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