गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

शीलसागर भरतपुर राजस्थानी हाल दौसा राजस्थान ।

“औषधि होत नहीं गुणकारी

ठीक यदि अनुपान नहीं ।

बोले मुख से करे न कर से

वह नर बुद्धिमान नहीं…….।

‘अवतारवाणी’ में शहन्शाह “अवतारसिंह”

निरंकारी बाबा ने स्पष्ट किया

जिसका कविवर पूर्णपकाश “साकी” ने पद्यानुवाद

किया है ।

यह बात ‘सोलह आने’ सटीक है,

कबीर साहब ने सत्य कहा कि

“कहनी के शूरा घने थोथे

बाँधैं तीर।

वे घायल वा नाम के जिनके विकल शरीर।।”

“कथनी मीठी खाँड़ सी करनी विष की लोय।

कथनी तज करनी करै विष से

अमृत होय।।”

अर्थात् कहनी के शूरवीर घने, (फैंकू) मिल जायैंगे किन्तु वे थोथे गाल बजाने वाले हैं

जैसे ‘पौंगा’ काल्पनिक ईश्वर के लिये शूर बना फिरता है वअन्धे

भक्त भय वश वैसे ही विकल ( दु:खी) तन के लिए भटकते हैं ।

कथनी तो चाशनी में सरावोर वाणी है , करनी आग पर धावने जैसी है , जो कथनी को तज कर करनी करता है वह अमृत पान करता है ।

इसीलिये भगवान बुद्ध ने शीलाचरण पर बलदिया कि श्रमण हो या उपासक चरित्रवान सदा सुख भोगता है ।

आपने कहा है कि तगर-चन्दन की गन्ध हवा के साथ बहती है

लेकिन शीलाचरण की सुगन्ध

विपरीत दिशा यानी चतुर्दिक जाती है ।

इसीलिये यदि औषधि अनुपान से समय-समय पर नित्यप्रति ली जाये तभी रोग दूर हो सकता है ।

गुड़-गुड़ चल्लाने मात्र से

कबीरानुसार मुँह मीठा नहीं हो सकता ।

अस्तु।

भिक्षु

शीलसागर

भरतपुर

राजस्थानी

हाल

दौसा

राजस्थान ।

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शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध खदिया नगला हरदोई

उत्तर प्रदेश भारत

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