Rahul Singh bauddha bharkhani

आयुष्मान !
प्रपन्ची, ढौंगी, पाखण्डी ,हत्यारे, कट्या तो सन्त शिरोमण केवल रवि (ज्ञान) के दास रविदास को ‘भगत’ कहने से भी नहीं
चूकते।
भगत का अर्थ ही ‘भग’को कूटने वाला है,
जैसे असंवैधानिक ‘हरिजन’
हरि का अर्थ ‘हरिजन’ यानी देवदासियों की औलाद होता है ।
मेरी दृष्टि में तो जो कथित
( काल्पनिक) ईश्वर मेंआस्था रखता है वही ‘हरिजन’ है,
तो जो-जो ‘सवर्ण’ हरि
यानी बन्दर, नाग , साँप आदि के पुजारी( आस्थावान) हैं उनमें जरा सी भी हया- शर्म वाकी है तो
वे आज से ही अपने नाम के आगे ‘हरिजन’ लगाना शुरू कर दैं ।
रही रविदास रचित कविता की बात तो जब जीवित ही कबीर साहिब का शिष्य भगवानदास उर्फ भग्गूदास ‘बीजक’ को चुरा कर ले गया तो कबीर को लिखना पडा़ कि,
“अब तो’बीजक’की प्रामाणिकता पर भी संदेह करना पड़ेगा।”
जो रविदेव ( रविदास) जीवन भर
पाखण्डवाद , राम, हरि के विरुद्ध
लिखता रहा उसकी हत्या
कतिपय बामान हत्यारेमिल कर
हत्या करके उन्हैं ‘भगत’ घोषित करके उन्हैं महिमा-मण्डित कर सकते हैं तो सब कुछ सम्भव है।
अब मैं ‘भगवान बुद्धऔर उनका धम्म ‘ रचित बाबा साहब अमेबेडकर की कृति का पद्यानुवाद कर रहाहूँ तो क्या मैं कालान्तर में बाबासाहब हो सकता हूँ बाबासाहब डॉ .भीमराव अम्बेडकर ही रहैंगे और मैं एक तुच्छ ‘ टुच्चा-मुच्चा ‘
भिक्षु ” शीलसागर ” ही रहूँगा।
एक बार मैं वैशाली बुद्धविहार आगरा से ऑटो रिक्शा में सफर कर रहा था तो एक ऐन्टीनाधारी कह रहा था कि हम तो बुद्ध को भी अवतार मानते हैं ।
मैंने कहा यह तो और भी बुरी बात है जो जीवनपर्यन्त भगवान, अवतार का खण्डन करते रहे कतिपय ‘बुद्ध’ को कुछ ऐण्टीनाधारी ही कुतर्क करते हैं।
फिर हे ! पूजनीय भूदेव किसी मन्दिर में राम ,कृष्ण,शिव आदि के मन्दिर में तथागत बुद्ध को बिठा दो तो जानूं।
उस तिलकधारी की बोलती बन्द हो गईं।
‘ चौबेजी चले तो छब्बे बनने पर दुबे ही रह गये ।’
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Rahul Singh bauddha
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