शनिवार, 14 दिसंबर 2019

नमो बुध्दाय खदिया नगला रूपापुर हरदोई



https://rahusinghbauddha.WordPress.com




🌷 Kamma — The Real Inheritance🌷
               S. N. Goenka.

(The following are excerpts from discourses given by S. N. Goenka for long course students.)

"Kammassakā, bhikkhvave, sattā kammadāyādā, kammayonī, kammabandhū, kammapatisaranā, yam kammamṃ karonti—kalyānaṃ vā pāpakaṃ vā—tassa dāyādā bhavanti".
A.X.206.

"Oh meditators, beings are the owners of their deeds, the heirs of their deeds, born of their deeds, kin to their deeds; their deeds are their refuge. Whatever actions they perform, whether good or evil, such will be their inheritance."

🌷 1)  Kammassakā:  beings are the owners of their deeds.

The law of paticca samuppāda (dependent origination) is the universal law of cause and effect: As the action is, so the result will be.

Mental volition is the driving force for action at the vocal or physical level.

If this driving force is unwholesome, the vocal and physical actions will be unwholesome.

If the seeds are unwholesome, then the fruits are bound to be unwholesome.

But if this driving force is wholesome, then the results of the actions are bound to be wholesome.

For a Vipassana student who develops the ability to observe this law at the level of direct experience, the answer to the question "Who am I?" becomes so clear. You are nothing but the sum total of your kamma, your samkhāra.

All your accumulated actions together equal "I" at the conventional level.

🌷2) Kammadāyādā:  the heirs of their deeds.

In the wordly, conventional sense, one says, "I received this inheritance from my mother or my father or my elders," and yes, at the apparent level this is true—but what is one’s real inheritance?

Kammadāyādā : One inherits one’s own kamma: the results, the fruits of one’s own kamma.

Whatever you are now, the present reality of this mind-matter structure is nothing but the sum total of and the result of your own accumulated past kamma.

The experience of the present moment is the sum total of all that is acquired, inherited—kammadāyādā.

🌷 3) Kammayonī:  born of their deeds.

One says, "I am the product of a womb, I have come out of the womb of my mother," but this is only apparent truth.

Actually, your birth is because of your own past kamma.

You come from the womb of your own kamma.

As you start understanding Dhamma at a deeper level, you realise this. This is kammayonī, the womb which every moment produces the fruit of the accumulated kamma.

🌷4) Kammabandhū:  kin of their deeds.

None other is your relative, not your father, your mother, your brother nor your sister.

In the worldly way we say, "This is my brother, my relative, or my near or dear one; they are so close to me."

Actually, no one is close to you; no one can accompany you or help you when the time comes. When you die, nothing accompanies you but your kamma.

Whomever you call your relatives remain here, but your kamma continues to follow you from one life to another. You are not in possession of anything but your own kamma.

It is your only companion.

🌷5) Kammapatisaranā:  their deeds are their refuge.

Refuge is only in one’s own kamma.

Wholesome kamma provides a refuge; unwholesome kamma produces more suffering.

(Vipassana newsletter. Apr' 98)

---------------------------------------

🌷कर्म संस्कार 🌷

पाप के गहरे संस्कार जन्म जन्मांतरों तक हमारे शत्रु की तरह साथ लगे रहते हैं, और दुखद स्थितियां पैदा करते रहते हैं।
इसी प्रकार गहरे पूण्य संस्कार हमारे मित्र की तरह जन्म जन्मांतरों तक चित्तधारा के साथ लगे रहते हैं और हमारी सहायता करते हैं, सुखद फल देते हैं। संकट में हमारी रक्षा करते हैं।

🍁इसी को किसी कवि ने ठीक ही कहा-
वन में, रण में, शत्रुओ में, जल या अग्नि के बीच में, समुद्र में या पर्वत शिखर पर अथवा सोये हुए असावधान रहते हुए अथवा विषम परिस्थिति में पड़े हुए व्यक्ति की पूर्व जन्म के पूण्य रक्षा करते हैं।

🌻ये पूण्य अथवा पाप कर्मो के संस्कार साथ कैसे रहते हैं, इसे भी समझो।
संस्कारो को जीवन की चित्तधारा अपने साथ लिये चलती है।
ये कर्म संस्कार कोई ठोस पदार्थ नही है।कर्म संस्कार तरंगो के रूप में चित्तधारा की तरंगो से सम्मिश्रित हो जातें हैं और सम्पूर्ण चित्तधारा को प्रभावित करते रहतें हैं।शरीर को प्रभावित करते रहते हैं।शरीर और चित्त की मिली-जुली जीवनधारा को प्रभावित करते रहते हैं।
अच्छे-बुरे कर्म संस्कार चित्त का अच्छा या बुरा स्वभाव बनाते हैं।

🌺यह कर्म संस्कारो की ऊर्जा(energy) ही है जो जीवनधारा को अच्छाई या बुराई की और धकेलती हुई आगे बढ़ाती है।
जब जीवन का अवसान(death) होता है तब शरीर चित्त की धारा के साथ चलने में असमर्थ हो जाता है तो दोनों का अलगाव(separation) होता है। इसी को मृत्यु कहते हैं।

🌷चित्त की चेतना से अलग हुआ मुर्दा शरीर विसरनखलित (decompose) होता रहता है।शरीर से अलग हुई चित्तधारा किसी अन्य शरीर से तत्काल जुड़कर प्रवाहमान होने लगती है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं।

🌼प्रत्येक जीवन में हलके और भारी, अच्छे और बुरे संस्कार बनते ही रहते हैं।निसर्ग के यानि धर्म के नियम इतने परफेक्ट और वेल आर्गनाइज्ड है कि एकाउंटिंग सिस्टम के सॉफ्टवेयर की तरह अच्छे या बुरे कर्म संस्कार पूण्य और पाप के खाते में अपने आप निवेशित होते जाते है।और जीवन में जिस जिस कर्म का फल प्रकट होकर उसका भुगतान हो जाता है वह उस अकाउंट में डेबिट हो जाता है। यानी समाप्त हो जाता है।
प्रतिक्षण की बैलेंस शीट तैयार रहती है।इस जीवन के अंतिम क्षण के समय चित्तधारा के पाप-पूण्य की जो बैलेंस शीट है, अगले जीवन के प्रथम क्षण में इसी बैलेंसशीट के साथ चित्तधारा आगे बढ़ती है।
शरीर की चयुति हो गयी, किन्तु चित्तधारा चलती रही।
नए शरीर के साथ जुड़ते ही तत्काल चल पड़ी। बीच में एक क्षण का भी गैप नही होता।

🌼पिछले जन्म की चित्तधारा का प्रवाह नए जन्म में वैसे ही चलना आरम्भ हो जाता है और उसके साथ आ रही पाप-पूण्य की बैलेंसशीट में उसी प्रकार पाप-पूण्य क्रेडिट-डेबिट होते रहते हैं।
यों जीवनधारा एक से दूसरे जन्म मे चलती रहती है।

💐वस्तुतः संस्कार है तो जीवनधारा है।चित्त सारे संस्कारो से मुक्त हो जाए तो नया जीवन ही न हो सके।जन्म मरण के चक्कर से छुटकारा हो जाए। पर संस्कार कायम है इसलिये एक जन्म के बाद दूसरा जन्म होता है।

🌸जीवन के साथ ख़त्म होते ही उसके साथ संस्कार ख़त्म नही हो जाते।परंतु संस्कार ख़त्म हो जाय तो जीवनधारा समाप्त हो जाती है। अगला जन्म नही हो पाता।

http://www.vridhamma.org/

https://www.dhamma.org/en/courses/search

---------------------------

🌹गुरूजी, आप अपने प्रवचनों में बतलाते हैं कि कर्मफल संवेदना के रूप में आता है। यह बात समझ में नही आयी। क्योंकि संवेदना तो शरीर का स्वभाव है, कई कारणों से आ सकती है।तो फिर उनको पिछले कर्मो का फल क्यों मानें?

उत्तर--जरुरी नही है। सारी संवेदनाएँ कर्म-संस्कारो की द्योतक नही हैं।
भगवान बुद्ध ने संवेदनाओ की उत्पत्ति के कई कारण बताएं हैं, उनमे से एक ये कर्म-संस्कार हैं।
किन्तु जब आप ध्यान करते हो तब ज्यादातर कर्म-संस्कार संवेदनाओ के रूप में प्रकट होने के द्योतक हैं। अन्यथा तो जो आपने भोजन किया है या आपकी बीमारी के कारण कोई दर्द है या चलते हुए कहीं कोई ठोकर लग जाने से कोई पीड़ा हुई- इसमे पुराने संस्कारो से क्या मतलब है? यह सब नए संस्कार हैं।

🌻हम असावधानी से चले, ठोकर लग गयी। हमने कोई गलत भोजन कर लिया, उसकी वजह से पेट दुखने लगा; यह नया कर्म है हमारा।
तो सारी संवेदनाएँ हमारे पुराने संस्कारों की हों ऐसा मानकर नही चलें।

🌷हमें तो यह देखना है कि किसी भी कारण से संवेदना आयी, कारण कोई भी हो, किसी भी प्रकार की संवेदना महसूस कर रहें हो, हम तो समता में हैं, कोई नया संस्कार नही बना रहें हैं।

🌺नया नही बना रहें हैं तो पुराने का संवर्धन होना बंद हो गया, अन्यथा संवर्धन होता चला जाता है।

🌲संवेदना इस कारण से हो या उस कारण से- आप यदि समता में स्थित हो, कोई प्रतिक्रिया नही कर रहे, और नया कर्म-संस्कार नही बना रहे तो आपका उद्देश्य सध गया और आप प्रगति कर रहें हैं।

------------------------------------

Que : जो पुराने कर्म संस्कार हैं वे वास्तविक कर्मो के रूप में सामने आते हैं या संवेदना के रूप में?

Ans : --हम जो भी कर्म करते हैं वह चित्त में चेतना क्या जागी उससे होता है।

मन में द्वेष जागा, क्रोध जागा, वासना जागी, भय जागा तो ही शरीर या वाणी से कर्म हुआ।

ये विकार जागते हुए शरीर में क्या संवेदना हुई? जिस प्रकार की संवेदना से वह कर्म किया गया उसी प्रकार की संवेदना जागेगी।

हम ठंडे स्थानों में शिविर देतें हैं। लोग ठंड से थरथराते हैं, लेकिन जब विपश्यना के बाद गर्मी फूटती है तो कपडे फेंकने लगते हैं। यह गर्मी शरीर की गर्मी नहीं, मौसम की भी नहीं-- भीतर के संग्रहित (accumulated) संस्कार के कारण है।

क्रोध का जितना संस्कार इकट्ठा किया वह गर्मी पैदा करेगा।

ईर्ष्या (jealousy)का होगा- गर्मी पैदा करेगा।

🌷 और न  जाने कितने प्रकार के संस्कार हैं कोई गर्मी पैदा करेगा, कोई धड़कन पैदा करेगा।
जाते समय जो कुछ पैदा किया- उसी के साथ निकलेगा।

कांटा जैसे जितना कष्ट देकर घुसा था उसी तरह उतना कष्ट देकर ही निकलेगा।उसका स्वभाव है।

--------------------------

🌷सही  सुख🌷

गुरूजी-- चित्तधारा को आगे बढ़ने के लिए प्रतिक्षण आहार चाहिए। नया संस्कार एक आहार है, पुराने संस्कारो का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई ना कोई आहार मिलता है तो यह चित्तधारा आगे बढ़ती है।

🌹बहुधा(mostly) होता यह है की चित्तधारा को जब हम एक आहार देतें है, एक नया संस्कार डालते हैं तो रुकते नही। अगले क्षण फिर वैसा ही आहार देतें हैं। यों क्षण प्रतिक्षण आहार देतें चलते हैं।
किसी बात को लेकर क्रोध आया तो बड़ा नन्हा सा क्षण होता है क्रोध का, पलक झपकने मात्र में कितने ही शत- सहस्त्र कोटि बार उत्पन्न होकर नष्ट होने वाला क्षण। लेकिन क्रोध का संस्कार पैदा करते ही अगले क्षण फिर क्रोध पैदा किया। अगले क्षण फिर क्रोध ही क्रोध के सँस्कार इस चित्तधारा को देर तक आगे बढ़ाते चलतें हैं। कभी तो घंटो क्रोध चलता रहता है।
क्रोध रुका तो कोई और संस्कार बनाना शुरू कर देंगे। वह चलेगा देर तक। फिर कोई और। कभी भय। कभी वासना। कभी कुछ और।
यों पुराने संस्कारो के नष्ट होने की बारी ही नही आती।
क्षण-क्षण नया ही बनाये जा रहें हैं।

🌼यदि  हम संवर कर लें यानी रोक लगा दें तो नए संस्कार नही बनते। तब चित्तधारा किसके बल पर चलती है? क्योंकि हमने नया संस्कार नही बनाया, तो कोई न कोई संस्कार- बीज जिसका  फल हो सकता है, कुछ देर बाद आने वाला हो, अब जल्दी पककर आएगा। इसे विपाक का त्वर्तिकरण कह सकते हैं। तुरंत कोई पुराना कर्म-संस्कार चित्तधारा पर अपना फल लेकर आता ही है। यही उदिरणा है।

🌺आया कोई  पुराना कर्म-संस्कार चित्त-धारा पर अपना फल लेकर और उसके सहारे चित्त धारा आगे बढ़ने लगी। जैसा कर्म था वैसा ही फल आया। हम उसे समता से, प्रज्ञा से देखने लगे तो हुआ निरोध उसका। जितने जितने पुराने संस्कार क्षीण होते चले जायेंगे उतना उतना हल्कापन आएगा ही। सही माने में सुख आएगा। दुःखो से छुटकारा होगा।

--------------------

🌷कर्म- विपाक🌷

विपश्यना साधना में जहाँ एक कर्म-विपाक का समूह उदीर्ण हुआ और प्रज्ञापूर्वक उसे क्षय कर लिया, वहां दूसरे कर्म- फलो का समूह तत्क्षण प्रकट होगा।

यों एक के बाद एक पुराने कर्मो के विपाक का ताँता लग जाता है। विपश्यना के प्रज्ञा- यज्ञ में उनकी आहुति लगती जाती है।यह क्रम जितनी देर तक चलता है, उतनी देर तक खिणन पुराणं होता रहता है।

परंतु जब कोई कर्म- विपाक अत्यंत घनीभूत पीड़ा के रूप में प्रकट होता है तो साधक की सारी सिट्टी- पिट्टी गुम हो जाती है, विद्या विलीन हो जाती है, प्रज्ञा क्षीण हो जाती है। पीड़ा के प्रति अम्मतव- भाव रख ही नहीं पाता। बौद्धिक स्तर पर भले अनित्य अनित्य करता रहे, परंतु वास्तविक स्तर पर ममत्व आ जाने के कारण उसे दूर करना चाहता है, और चाहने से वह दूर होती नहीं। अतः लगता है की यह तो नित्य है।

उस स्थूल ठोस पीड़ा की घनसंज्ञा नष्ट कर, सूक्ष्म प्रकम्पन की अनुभूति प्रज्ञामयी विपश्यना साधना के अभ्यास द्वारा ही होती है, जैसे कोई धुनिया कपास(रुई) की ग्रंथि को अपने धुनके के तार से प्रकम्पित कर खोलता है, कपास का एक एक तार अलग अलग कर देता है।

---------------

🌹गुरूजी, अगर आदमी आदमी में भेद नही मानना चाहिये तो एक व्यक्ति दूसरे से दिखने में, स्वभाव आदि में अलग अलग क्यों होता है? निसर्ग सबको एक जैसा क्यों नही बनाती? निसर्ग तो भेद भाव करती नही न।

उत्तर--नही, निसर्ग कोई भेदभाव नही करता।

प्रकर्ति हमारा स्वभाव नही बनाती।

हर व्यक्ति अपनी समझदारी या नासमझी से अपना अच्छा या बुरा स्वभाव बनाता है।और स्वभाव बनाने का यह क्रम इसी एक जीवन का नही है, अनेक जन्मों से चला आ रहा है। पूर्व जन्मों का स्वभाव इस जन्म के स्वभाव को प्रभावित करता है।

🌷परंतु यदि समझदार व्यक्ति अंतर्मुखी होकर अपने स्वभाव की जड़ो तक पहुँच कर अपने स्वभाव को बदलने का प्रयत्न करे तो बदल सकता है।

प्रकृति तो प्रत्येक व्यक्ति द्वारा अपने स्वभाव के अनुसार किये गए अच्छे बुरे कर्म का फल देती है। इसमे वह रंच मात्र भी भेदभाव नही करती।

------------------------

🌹गुरूजी, जब कर्म का फल आनेवाला होता है तो विपश्यना उसे कैसे काट सकती है?

उत्तर--कर्म आएगा फल लेकर तो पहले संवेदना आएगी। संवेदना देखने लगेंगे तो जो फल आएगा वह दुर्बल हो जायेगा।
पेड़ में फल तो आया पर बड़ा ही नही हुआ, छोटा सा होकर गिर गया।
यही तो भगवान् बुद्ध ने ढूंढ निकाला। यही विद्या तो उन्होंने सीखी और लोगो को सिखाई।

🌷जो भी हमने सत्कर्म दुष्कर्म किया है उसका फल तो आएगा ही। हमने संवेदना के रूप में उसे देखना शुरू कर दिया तो उसकी ताकत ख़त्म हो जायेगी।
मान लो बड़ा फल आया भी तो कुछ नही होगा।हम मुस्कराते रहेंगे, आ भई आ!
जैसे किसी ने हमारा कुछ छीन लिया, ले लिया, तो क्या हुआ!
हम तो मुस्कुराते रहेंगे।
हमारे अच्छे कर्मो के अच्छे फल भी तो मिलेंगे। तो दुखी न होकर हमेशा प्रसन्न रहो।

🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा खदिया नगला
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें