मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

कुशवाहा वंश की वंशावली,, मौर्य वंश की वंशावली,,शाक्य वंश की वंशावली


शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा 


मौर्य वंश की उत्पत्ति एवं
कुशवाह कौन हैं ?
एक बात बहुत ही साभार के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ जिस पर बहुत ही अन्वेषण भी किया है मैंने

।बंधुओं के ज्ञान वर्धन और सम्यक दर्शन के लिए रहा नहीं जा रहा है तो कह रहा हूँ कि
कुशवाह और मौर्यों की पुरातन उत्पत्ति भगवान गोतम बुद्ध के पूर्व की क्या है ?

वास्तव में भारत अर्थात पुराना जम्मूद्वीप में अर्थात सिंधु देश में बहुत ही पुरातन सुव्यवस्थित संस्कृति रही है जिसका विनाश मूर्ख मनुष्यों ने जो अग्निपूजक जरथुस्त्र ईरानियन खाड़ी के सजायाफ्ता मुजरिम देशनिकाला लोगों ने किया ,; सिंधु उपत्यका में ही शरण लेकर , उसका वही स्वरुप हमें मुग़लों और अंग्रेजों द्वारा भारत में घुसपैठ कर राज्य किये इतिहास से तुलनात्मक अध्ययन से महसूस हो जाता है ।
तो कह मैं ये रहा था कि भारत में जो भी आज सम्प्रदाय दिखाई देते हैं जो भारतीय अध्यात्म पर आधारित हैं वे सब पुरातन समण परम्परा यानि आज की बौद्ध सम्प्रदाय से पुनरुत्पन्न हुए हैं , चाहे वे मूर्ख ब्राह्मणवादी पुरोहित संस्कृति के पोषक तत्वों के सम्प्रदाय हों या अन्य ही ।
परंतु सिंधु उपत्यका में अर्थात पुरातन सनातन काल से भारतीय भाषाएँ सभी प्राकृत की बेटियां हैं संस्कृत भी ।
तो जब भगवान गोतम बुद्ध ने अपने महापरिनिब्बान की घोषणा तीन माह पूर्व ही कर दी थी तो अपने शरीर को त्यागने अर्थात महानिब्बान करने के लिए कुशीनारा के जंगल में सो शाल वृक्ष के बीच पड़ी शिला को अपनी सिँह शैय्या बनाया था तो आनंद बोले भगवान ! भंते ! मत आप इस मलिन छोटे कुशीनारा में परिनिब्बुत होवें । भगवान बोले आनंद मत ऐसा कहो कि इस क्षुद्र जगह....आनंद यह कुशीनारा पूर्व काल में राजा सुदर्शन की
कुशावति
नामक राजधानी थी और मैं इसका राजा वही सुदर्शन था । जाओ जाकर
कुशीनारा के मल्लों (पहलवान लोग , बलिष्ठ और युद्ध प्रिय ) से कहो कि वशिष्ठों !आज रात के पिछले पहर में तथागत अपना परिनिब्बान करेंगे ....तो आनंद के कहने पर सुनकर सभी
कुशीनारा के मल्ल
भगवान के दर्शन के लिए रोते बिलखते गए ।
तब ....भगवान के संकल्पानुसार भगवान बुद्ध ने महापरिनिब्बान किया .....और फिर सभी ने भगवान को लेप गंघ माला विलेपन कर
कुशीनारा के मल्लों ने उत्तरी द्वार से बुद्ध शैय्या को लेजाकर अंत्येष्ठि हेतु रक्खा जहां
कुशीनारा के मल्लों का
मुकुट बंधन नामक चैत्य ( पूजा स्थल =देव स्थल ) था ....तब महाकश्यप और उनके पांच सौं शिष्यों के वंदन और परिक्रमा करते ही तथागत की चिता में स्वयं अग्नि जल उठी ...
बाद में
वेसाली के लिच्छवियों
कपिलवत्थु के साक्यों
अल्लकप्प के बुलियों
रामगाम के कोलियों
वेट्ठ द्वीप के ब्राह्मणों
ने भगवान के महापरिनिब्बान के बारे में सुना वे भी पहुंचे , तो कुशीनारा के मल्लों ने कहा भगवान हमारे यहां परिनिबुत्त हुए हैं हम किसी को उनके अस्थि पुष्प नहीं देंगे । वहां इस बात को लेकर तलवारें खिंच गयीं तब द्रोण नामक ब्राह्मण ने कहा भाइयों हमारे बुद्ध क्षान्तिवादि थे आप झगड़ा न करें आपस में बांटकर अपने अपने यहां चैत्य बनाकर पूजा करें ।
तो बाद में
पिप्पलिवन के मोरिय (आज के मौर्य ) बाद में पहुंचे तो वे चिता का अंगार ही ले गए और उस पर स्तूप (चैत्य ) बनाया ।

इस प्रकार कुल 10 स्तूप बने थे भगवान बुद्ध के विभिन्न चिता के बचे हुए भागों पर ।

तो अपने को पहचानों आप लोग जो
कुशवाह हैं वे
कुशीनारा के मल्ल लोगों के वंशज हैं
और मौर्य
उसकाल के
पिप्पलिवन के मोरियों
के वंशज
तो आप लोग कैसे पुरोहितवादी पाखंडियों को सिरोधार्य करोगे अपना ही और अपने पूर्वजों का अपमान करोगे ।।

कुशवाह कुशीनारा के मल्लों की संतान हैं
सीता पुत्रों कुश की नहीं और मौर्य
पूर्व काल के
पिप्पलिवन के मोरियों की संतान जिनके वंशज चन्द्रगुप्त मौर्य और महान सम्राट अशोक हुए ।।

नमो बुद्धाय ।।
नमो भारत ।।

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