🔸मृत्यु भोज एक कुप्रथा 🔸
{कविता }
मै मूरख अज्ञान साथियो हमे न दोष लगइयो ।
धर्म यही कहे रहा तुम्हे तुम मरे न भोजन खइयो ।।
बड़े दुक्ख की बात साथियो कविता सुनो हमारी ।
चली गई स्वर्ग धाम हमारे होरी की महारी ।।
फूंकिदयी सम्पदा पुरानी इतनी करी दवाई ।
पैसा रहो न पास हमारे बहुत मुसीबत आई ।।
काम काज करिदेउ परोसी अपनी अपनी ताने ।
इसी बात पर लई लेखनी कविता लगे बनाने ।।
कौन बेद मा लिखी तेरही सो तुम हमे बतइयो ।
धर्म यही __________________
जिनके घरमा पुत्र शोक से बिलखि रही महतारी ।।
गइया सी डकराइ पति बिना रोवे बिधवा नारी ।।
मूड पकडि के बहना रोवे करना करिके भइया ।
बड़े दुक्ख से माता रोवे घरमा मची हदैया ।।
एक ओर कोहराम मचो है ठौरइ चढ़ी करहैया ।
तहूं अधर्मी मानत नाहीं हैं बेशरम खबैया ।।
बूढ़ो पिता द्वारे बिलखै घर मे रोवै माता ।
तिनके घर मे बैठि मूर्खों भोजन तुम्हें सुहाता ।।
राजाराम लेखनी लेकर कविता रोज बनइयो ।
धर्म यही कहे रहा साथियो मरे न भोजन खइयो ।।।।
🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌺🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾🌾
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला ।।
🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
अंधविश्वास का जड़ से विनाश हो।
मनुष्य बुद्धिमान तथा विज्ञान वादी हो।
साधु । साधु ।। साधु ।।।
{कविता }
मै मूरख अज्ञान साथियो हमे न दोष लगइयो ।
धर्म यही कहे रहा तुम्हे तुम मरे न भोजन खइयो ।।
बड़े दुक्ख की बात साथियो कविता सुनो हमारी ।
चली गई स्वर्ग धाम हमारे होरी की महारी ।।
फूंकिदयी सम्पदा पुरानी इतनी करी दवाई ।
पैसा रहो न पास हमारे बहुत मुसीबत आई ।।
काम काज करिदेउ परोसी अपनी अपनी ताने ।
इसी बात पर लई लेखनी कविता लगे बनाने ।।
कौन बेद मा लिखी तेरही सो तुम हमे बतइयो ।
धर्म यही __________________
जिनके घरमा पुत्र शोक से बिलखि रही महतारी ।।
गइया सी डकराइ पति बिना रोवे बिधवा नारी ।।
मूड पकडि के बहना रोवे करना करिके भइया ।
बड़े दुक्ख से माता रोवे घरमा मची हदैया ।।
एक ओर कोहराम मचो है ठौरइ चढ़ी करहैया ।
तहूं अधर्मी मानत नाहीं हैं बेशरम खबैया ।।
बूढ़ो पिता द्वारे बिलखै घर मे रोवै माता ।
तिनके घर मे बैठि मूर्खों भोजन तुम्हें सुहाता ।।
राजाराम लेखनी लेकर कविता रोज बनइयो ।
धर्म यही कहे रहा साथियो मरे न भोजन खइयो ।।।।
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शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा ग्राम खदिया नगला ।।
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अंधविश्वास का जड़ से विनाश हो।
मनुष्य बुद्धिमान तथा विज्ञान वादी हो।
साधु । साधु ।। साधु ।।।

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