शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध
2 अक्टूबर
गांधी जयंती पर विशेष----
गांधी जी के तमाम विचारों में से भाजपा-आरएसएस ने सिर्फ स्वच्छता को चुना है और गांधी को लगभग सफाई कर्मचारी बना दिया है. आरएसएस को गांधी में इसके अलावा काम का कुछ नहीं मिला.
बीआर आंबेडकर और महात्मा गांधी |
मोहनदास करमचंद गांधी, केशव बलिराम हेडगेवार और बी.आर. आंबेडकर तीनों की जीवन यात्राओं में ऐसा साझा समय काफी है, जब वे सक्रिय थे. तीनों का शुरुआती कार्यक्षेत्र अविभाजित मुंबई स्टेट था. माना जा सकता है कि तीनों को एक दूसरे के बारे में मालूम था और एक, दूसरे और तीसरे के विचारों से वे वाकिफ रहे होंगे.
दक्षिण अफ्रीका से लौटकर गांधी जी ने कांग्रेस की कमान संभाल ली थी और 1920 में शुरू हुए असहयोग आंदोलन के बाद उनकी राष्ट्रीय नेता की छवि बन चुकी थी.
आंबेडकर जी ने उससे तीन साल पहले 1917 में भारतीय जाति व्यवस्था पर अपनी पहली थीसिस कोलंबिया यूनिवर्सिटी में पेश करके छपवा ली थी. 1925 आते-आते वे डिप्रेस्ड क्लासेस यानी उस समय अछूत कहे जाने वालों की आवाज़ के तौर पर स्थापित हो चुके थे. इसी नाते 1932 में सेकेंड राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस में उन्हें गांधी जी के साथ लंदन आमंत्रित किया गया था. हेडगेवार ने कांग्रेस को अलविदा कहकर 1925 में ही आरएसएस का गठन कर लिया था. उनकी मौत 1940 में हुई.
गांधी जी और हेडगेवार में अबोलापन
भारत के इतिहास में कम से कम 15 साल का समय ऐसा है, जब गांधीजी, आंबेडकर जी और हेडगेवार साथ-साथ सक्रिय थे. ये एक दिलचस्प तथ्य है कि जहां गांधीजी और आंबेडकर जी एक दूसरे के साथ तमाम असहमतियों के बावजूद लगातार संवाद में थे और एक दूसरे के विचारों से सहमत-असहमत हो रहे थे, वहीं इन दोनों नेताओं ने हेडगेवार के साथ कोई संवाद नहीं किया. गांधी और हेडगेवार के बीच सिर्फ एक मुलाकात हुई, लेकिन सहमति का कोई बिंदु बन नहीं पाया. गांधी ने हेडगेवार को हिंसा छोड़ने की नसीहत दी थी, जिस पर हेडगेवार ने कहा कि उनका संगठन हिंसा नहीं करता.
यह दिलचस्प है कि बीजेपी और उसका पितृ संगठन आरएसएस आज गांधीजी की बात करता है और उनकी विरासत में अपने लिए एक कोना तलाश रहा है. लेकिन गांधीजी के जीते जी इस साम्य या साझा यात्रा की कहीं कोई गुंजाइश नहीं थी. बल्कि गांधी की हत्या में जिस विचारधारा से प्रभावित युवक शामिल थे, वे वही विचारधारा है, जिसे आरएसएस ने आगे बढ़ाया. ये भी रोचक है कि गांधीजी के तमाम विचारों में से बीजेपी-आरएसएस ने सिर्फ स्वच्छता को चुना है और गांधीजी को लगभग सफाई कर्मचारी बना दिया है. उदारवादी लोकतंत्र, सर्वधर्म सम्भाव (जिसे भारत में धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है), अहिंसा, ग्राम स्वराज, नैतिकता जैसे गांधीवादी मूल्यों की बात करने से भी बीजेपी कतराती है.
हिंदू राष्ट्र के विचारों से टकराते आंबेडकर
हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर एक बार आंबेडकर जी से मिलने जरूर गए थे. लेकिन आंबेडकर जी अपने लाखों शब्दों के भाषण और लेखन के 21 खंडों में संकलित रचनाओं में कहीं हेडगेवार का जिक्र भी नहीं करते हैं. यह इस बात का प्रमाण है कि आंबेडकर जी जिस लक्ष्य के लिए जुटे थे, उसमें हेडगेवार, उनके विचार और उनका संगठन बिल्कुल अप्रासंगिक है. लेकिन यही बात गांधीजी के बारे में नहीं कही जा सकती, जिनसे आंबेडकर जी बार-बार संवाद करते हैं.
जहां तक आंबेडकर जी की बात है तो उनका ऐतिहासिक प्रोजेक्ट भारत में सामाजिक-आर्थिक भेदभाव रहित सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना था, जिसका आरएसएस की हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से कोई मेल ही नहीं था. आंबेडकर अपनी किताब पाकिस्तान एंड पार्टिशन ऑफ इंडिया (1945) में साफ लिखते हैं कि- ‘अगर हिंदू राष्ट्र बनता है तो ये इस देश के लिए सबसे बड़ी आपदा होगी. हिंदू चाहें जो भी कहें, हिंदूवाद स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का दुश्मन है. हिंदू राष्ट्र को हर कीमत पर रोकना होगा.’
गांधीजी और आंबेडकर जी में समानता और द्वंद्व
जिस समय आंबेडकर जी जाति मुक्ति की अवधारणा पर काम कर रहे थे, उस समय गांधी भारत की राजनीतिक आजादी को सबसे महत्वपूर्ण मानकर स्वतंत्रता संग्राम में जुटे थे. उनका मानना था कि भारतीय समाज के आपसी अंतर्विरोधों को आजादी के बाद हल किया जा सकता है. छुआछूत को वे हिंदू समाज का अपराध मानते थे और इसका पश्चाताप करने के लिए उन्होंने अपना मैला खुद उठाने की परंपरा शुरू करने की कोशिश की. हालांकि भारतीय समाज इसके लिए तैयार नहीं था. गांधी के तमाम प्रयासों के बावजूद छुआछूत 21वीं सदी में भी कायम है, जो ये साबित करती है कि आंबेडकर जी की इतिहास दृष्टि ज्यादा वैज्ञानिक थी.
लेकिन एक बात ध्यान रखने योग्य है कि आंबेडकर जी,, गांधी जी को इस लायक मानते थे, या इतना जरूरी मानते थे कि उनसे बातचीत की जाए. दोनों के बीच लगातार संवाद होता रहा. दोनों एक दूसरे से टकराते रहे, पर बातचीत जारी रखखी. राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस और पूना पैक्ट से शुरू हुई उनकी बातचीत एनिहिलेशन ऑफ कास्ट में जारी रहती है और आजादी के बाद भी संविधान सभा में बाबा साहेब की हिस्सेदारी तक उसमें कभी व्यवधान नहीं आता. नेहरू कैबिनेट में बाबा साहेब का शामिल होना भी गांधी की सहमति के बिना संभव नहीं था.
अपनी किताब गांधीजी, राणाडे और जिन्ना में आंबेडकर दोनों धाराओं के बारे में लिखते हैं कि – ‘उस समय का बौद्धिक वर्ग दो धाराओं में बंटा था. पहला वर्ग कट्टरवादी था, लेकिन अराजनैतिक था. दूसरा वर्ग अपने विचारों में आधुनिक था, लेकिन उसके लक्ष्य राजनैतिक थे. पहले वर्ग का नेतृत्व चिपलूणकर और तिलक कर रहे थे.’ आंबेडकर की राय में ये दोनों धाराएं समाज सुधार के खिलाफ काम कर रही थीं क्योंकि दूसरी धारा राजनीतिक आजादी को ज्यादा महत्व देकर समाज सुधार के कार्यों को स्थगित करना चाहती थी. दूसरे वर्ग का नेतृत्व आगे चलकर गांधी के हाथ में आ गया. लेकिन उन्हें ज्यादा शिकायत पहली धारा से है, जो पुरातन विचारों के हिसाब से भारत बनाना चाह रही थीं.
अगर हम गांधी जी और अम्बेडकर जी की के बीच तुलना करे तो हम पाएंगे कि अम्बेडकर जी ने सबकुछ अपने दम पर पाया है उन्हे वो चीजे नही मिली जो गांधी जी को जाती के आधार पर मिली फिर भी वो काफी ज्ञानी बने। खुद ये बात गांधी जी ने भी कहि थी संविधान कमेटि के गठन के समय की अगर अम्बेडकर को न लेने से उसका कोई नुक़सान नही होगा बल्कि हमारा, हमारे देश का होगा जो हम उन्हके गुण का इस्तेमाल न कर पाए।
पूना पेक्ट मैं गांधी जी तो मारे जाते अगर अम्बेडकर जी न सोचते।
मनु स्मृति जलाने के समय जब लोग सरदार जी के पास पंहुचे ओर सिकायत की ओर कोर्ट में केस करने की बात की तो सरदार जी ने बोला कि ये करने से पहले इतना सोच लेना कि वो प्रख्यात वकील भी है कहि ये ना हो अभी मनु स्मृति जाली है कहि वो कुछ न छोड़े। ओर आज दुनिया उन्हें ज्ञान का प्रतीक मानती है। दुनिया भर मैं उन्हके नाम की चर्चा हो रही है उन्हे पुरस्कृत किया जा रहा है।। मूर्तिल्या लगये जा रही है। मगर एक देश भारत मे उसी के लोग भारत देश के नायक को देखकर जलते है।डुब मरो ऐसे लोगो।
इस पेज की पोस्ट्स किसी जाती को ऊचा निचा दिखाने की तरफ कोई इशारा नहीं करती
देश में हो रही चीजों की तरफ इशारा करती है और लोगो को जागरूक करने की एक कोशिस है
ताकि लोग तर्कवादी बने किसी चीज पर फैसले लेने से पहले उसे समझे किसी अंधविश्वास मे न फसे सोच समझ कर तर्क के साथ फैसला ले (किसी ने कह दिया मुर्गी सोने के अंडे देती है तो ऐसी काल्पनिक बातो पर भरोसा न करें, वैज्ञानिक दौर है समझे )
-जात पात से ऊपर उठे
-लड़कियों को बराबरी का सम्मान दे किसी की बातो मे न आये
-देश मे समानता लाने की कोशिस करे
जय भीम जी भारत।।


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