महान वीरांगना झलकारीबाई जयंती : 22 नवंबर
(22.11.1830--4.6.1858)
वीरांगना झलकारी बाई के बारे में डॉ.प्रदीप कुमार “दीप” की कविता...
झलकारी की झलक देखकर, वो बुन्देले भी हाँफ गये……
जब उतरी वो समरभूमि में, गौरे भी थर-थर काँप गये।
जमुना-कोख से पैदा हुई, भोजला गाँव में बड़ी हुई।
जब आया संकट, झाँसी पर, लक्ष्मी के आगे खड़ी हुई।
रानी को रण से भेज दिया, निज बौद्धिक-बल के बूते से।
दुश्मन को धूल चटाई थी, अपने पैरों के जूते से।
समर में थी वो रूकी हुई…अंग्रेज रोज को डाटा था।
निज अश्व हुआ जख्मी तो, कृपाण से दुश्मन काटा था।
वो अबला थी, पर यौद्धा थी, और वीरांगना कहलाई।
मनु के वेश में लड़ी वो तब, फिर लौट के न वो घर आई।
रानी झाँसी को बचा गई, ऐसी नारी थी झलकारी….
“प्रदीप” कवि का प्रणाम उन्हें, है धन्य झलक की महतारी।
रानी की हमशक्ल
देश की महान वीरांगनाओं में एक प्रमुख नाम झलकारी बाई का है। इतिहासकारों के अनुसार झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की नियमित सेना में, महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति थीं। लक्ष्मीबाई की हमशक्ल होने के कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं।
बचपन
झलकारी बाई का जन्म बुंदेलखंड के भोजला गांव में 22 नवंबर, 1830 को एक निर्धन कोली परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम सदोवा (उर्फ मूलचंद कोली) और माता जमुनाबाई (उर्फ धनिया) था। झलकारी बाई बचपन से ही साहसी और दृढ़ प्रतिज्ञ लड़की थी। जब झलकारी बाई बहुत छोटी थीं तब उनकी माँ की मृत्यु हो गयी थी और उसके पिता ने उन्हें एक लड़के की तरह पाला था। उन्हें घुड़सवारी और हथियारों का प्रयोग करने में प्रशिक्षित किया गया था।
साहसी
झलकारी घर के काम के अलावा पशुओं की देखरेख और जंगल से लकड़ी इकट्ठा करने का काम भी करती थी। एक बार जंगल में झलकारी की मुठभेड़ एक तेंदुए से हो गई थी और उन्होंने अपनी कुल्हाड़ी से उसको मार डाला था। वह एक वीर साहसी महिला थी।
विवाह
झलकारी का विवाह झांसी की सेना में सिपाही रहे पूरन कोली नामक युवक के साथ हुआ। पूरे गांव वालों ने झलकारी बाई के विवाह में भरपूर सहयोग दिया। विवाह पश्चात वह पूरन के साथ झांसी आ गई।
सेना में भर्ती
एक बार गौरी पूजा के अवसर पर झलकारी गाँव की अन्य महिलाओं के साथ महारानी को सम्मान देने झाँसी के किले मे गयीं, वहाँ रानी लक्ष्मीबाई उन्हें देख कर अवाक रह गयी क्योंकि झलकारी बिल्कुल रानी लक्ष्मीबाई की तरह दिखतीं थीं। अन्य औरतों से झलकारी की बहादुरी के किस्से सुनकर रानी लक्ष्मीबाई बहुत प्रभावित हुईं। रानी ने झलकारी को दुर्गा सेना में शामिल करने का आदेश दिया। वह लक्ष्मीबाई की हमशक्ल भी थीं, इस कारण शत्रु को धोखा देने के लिए वे रानी के वेश में भी युद्ध करती थीं।
महानता
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेंजी सेना से रानी लक्ष्मीबाई के घिर जाने पर झलकारी बाई ने बड़ी सूझबूझ परिचय दिया था। रानी के वेश में युद्ध करते हुए वे अपने अंतिम समय अंग्रेजों के हाथों पकड़ी गईं और रानी को किले से भाग निकलने का अवसर मिल गया। जिसके बाद वह किले के बाहर निकल ब्रिटिश जनरल ह्यूग रोज़ के शिविर मे उससे मिलने पहँची। ब्रिटिश शिविर में पहुँचने पर उसने चिल्लाकर कहा कि वो जनरल ह्यूग रोज़ से मिलना चाहती है। रोज़ और उसके सैनिक प्रसन्न थे कि न सिर्फ उन्होने झांसी पर कब्जा कर लिया है बल्कि जीवित रानी भी उनके कब्ज़े में है। जनरल ह्यूग रोज़ जो उसे रानी ही समझ रहा था, ने झलकारी बाई से पूछा कि उसके साथ क्या किया जाना चाहिए? तो उसने दृढ़ता के साथ कहा, मुझे फाँसी दो। जनरल ह्यूग रोज़ झलकारी का साहस और उसकी नेतृत्व क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ और झलकारी बाई को रिहा कर दिया गया। इसके विपरीत कुछ इतिहासकार मानते हैं कि झलकारी इस युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुई। एक बुंदेलखंड किंवदंती है कि झलकारी के इस उत्तर से जनरल ह्यूग रोज़ दंग रह गया और उसने कहा कि
“यदि भारत की 1% महिलायें भी उसके जैसी हो जायें तो ब्रिटिशों को जल्दी ही भारत छोड़ना होगा।"
ऐसी महान वीरांगना थीं झलकारी बाई। झलकारी बाई की गाथा आज भी बुंदेलखंड की लोकगाथाओं और लोकगीतों में सुनी जा सकती है। झलकारी बाई के सम्मान में 2001 में डाक टिकट भी जारी की है ।।
शास्त्री राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
9198979617


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