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शास्त्री शाक्य राहुल सिंह बौद्ध कुशवाहा
आदरणीय स्वामी साक्षी महाराज जी राम जी के बारे मे भी यही है।बाल्मीकि रामायण मे भी लिखा है इक्ष्वाकु बंश समुत्पननो रामो नाम नाम जनै:श्रुता :।इक्ष्वाकु बंश मे उत्पन्न राम का नाम लोगो के द्वारा सुना जाता है। अर्थात राम ऐतिहासिक पुरूष नही है। दूसरा पहलू यह भी है श्री लंका का नाम 1975 श्री लंका पडा अर्थात बर्तमान श्री लंका का पूर्ब नाम सीलोन है। इससे पहले इसका सिंहल द्वीप था। फिर सबाल खडा होता है आखिर राम कंहा का रहने बाले थे? थाईलैंड मे एक और अयोध्या है जंहा का राजा आज भी राम ही कहा जाता है।।थाईलैंड की अयोध्या को संयुक्त राष्ट्र ने भी मान्यता देदी है। क्या संयुक्त राष्ट्र मे बैठे लोग मूर्ख है। यदि लंका का ही अभी तक निर्धारण नही हो पाया तो रामायण एक कपोल कल्पित कहानी सिद्ध होती है। महाराज जी एक सबाल और खड़ा होता है राम आजादी के बाद बाबरी मस्जिद मे क्यो प्रकट हो गये? इस देश पर आठ सौ बर्षों तक मुसलमानों ने शासन किया राम जी प्रकटनही हुए। शक हूणों बर्बरो का शासन किया। राम जी प्रकट नही हुए। अंग्रेजो ने दो सौ बर्षों तक शासन किया। राम जी प्रकट नही हुए। न जाने कितने क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर चले गये लेकिन राम जी प्रकटनही हुए। तुलसीदास जी ने रामचरित मानस अयोध्या मे लिखी। तुलसीदास जी ने लिखा है। मांगकै खइवो मसीत को सोइवो। अर्थात तुलसीदास मांगकर भिक्षाटन करके भोजन करते थे और मस्जिद मे सोते थे। उस समय तक अयोध्या मे केबल बाबरी मस्जिद ही एक मात्र मस्जिद जिसमे तुलसीदास सोते थे। तुलसी दास ने किसी ग्रंथ मे बाबरी मस्जिद के बिबाद का उल्लेख नही किया। चौदह राजाओं ने मुगलों से अपने रिश्ता सम्बंध जोड लिए। अकबर के चौदह रत्न थे इनमे से ज्यादा हिंदू थे। इन हिंदू नवरत्नो ने कभी भी अकबर से राममंदिर का जिक्र नही किया। अकबर मानसिंह का फूफा था। जोधाबाई अकबर की पत्नी। मानसिंह अपने फूफा से कहकर इस समस्या का समाधान करवा सकता था। रामराज्य मे दलितों पिछडो को कोई अधिकार नही था। राम ने ब्राह्मणो के कहने पर तपस्या करते शूद्र शम्भूक ऋषि की गरदन काट दी क्योंकि शम्भूक ऋषि शूद्र थे। बाल्मीकि रामायण मे लिखा है सतयुग मे ब्राह्मणों के अलावा
किसी को भी तपस्या का अधिकार नही था। स्वामी जी यह कैसा धर्म है जिसमें सतयुग मे क्षत्रियों को भी तपस्या का अधिकार नही था। त्रेता मे ब्राह्मण और क्षत्रियों को तपस्या का अधिकार हुआ। वैश्य और शूद्रों को राम राज्य मे तपस्या का अधिकार नही था। बाल्मीकि रामायण का यह श्लोक देखे
त्रेतायुगे च वर्तंते ब्राह्मणा:क्षत्रियाश्च :ये।
तपो:तपयन्त ते सर्वे शुश्राम् अपरे जना :।
त्रेतायुग मे केबल ब्राह्मण और क्षत्रिय ही तपस्या कर सकते है। अन्य वर्ण अर्थात वैश्य और शूद्र के लोगो का धर्म केबल ब्राह्मणों और क्षत्रियों की सेबा ही धर्म है। राम के काल मे एक ब्राह्मण का लडका मर गया। ब्राह्मण उस मृत लडके को राम दरवार मे ले जाता है और नारद से कहते हैं राम तुम्हारे राज्य मे कोई शूद्र तपस्या कर रहा है। राम बिमान पर बैठकर उस तपस्या करने बाले शूद्र की खोज करते हैं और दक्षिण भारत में शैवाल पर्बत पर गये वंहा
एक शम्भूक ऋषि जो कि शूद्र थे तपस्या कर रहे थे। उससे राम ने परिचय पूछा। उसने कहा
शूद्रोयोन्याम् प्रजातो अस्मि तप उग्र समास्थि:।
देवत्वम् प्राथये राम सशरीरो महाशय :।
महायशस्वी राम मै शूद्र योनि मे उत्पन्न हुआ और मै संदेह स्वर्ग लोक मे जाकर देवत्व प्राप्त करना चाहता हूं। इसीलिये यह मै उग्र तप कर रहा हूं।
भाषातस्य शूद्रस्य खड्गम् सुरूचिर प्रभवम्।
निष्कृष्य कोशाद् विमलं शिरश्च्छेद राघव :।
वह शूद्र शम्भूक ऋषि कह ही रहे थे श्री रामचंद्र जी ने म्यान से चमचमाती हुई तलवार निकाली और उसी से गरदन काट ली।
स्वामी जी हिंदू धर्म मे क्षत्रियों वैश्यों और शूद्रों को शिक्षा का अधिकार नही था। स्वामी विवेकानंद की पुस्तक Caste Culture and sociolism में स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है
कि ऐ मेरे ब्राह्मण भाइयों ज्ञान जीबन की सुरभि है तुमने क्षत्रियों को इतनी शिक्षा दी जिससे बे केबल लड भिड़ सके और बनियों को इतनी शिक्षा दी जिससे बे केबल व्यापार कर सके और शूद्र इनके पास तो तुमने ज्ञान की एक बूंद नही पहुंचने दी। चौका तुम्हारा धर्म है चूल्हा तुम्हारा भगवान मत छुओ मत छुओ यही तुम्हारा दर्शन। नये भारत का उदय होने दो नये भारत का उदय किसान कीकुटिया और मोची की दुकान से होगा।
हिंदू धर्म मे बडे बडे ऊंचे आदर्शों की बात कही गयी है।
अयं निज :परोवेति इति गणना लघुचेतषाम्।
उदार चरिताम् तु बसुधैव कुटुम्बकम्।
यह अपना है यह पराया है ऐसी गणना संकीर्ण बुद्धि बाले करते है जो उदार हृदय के पुरूष सम्पूर्ण पृथ्वी को ही अपना परिबार मानते है।
हिंदू धर्म चींटी से हाथी तक मे परमात्मा के दर्शन करता है लेकिन इतने ऊंचे आदर्शों की बात करने बाला हिंदू धर्म दलितों पिछडो को इंसान भी नही मानता है। इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी ने लिखा
ऐ हिंदुओं तुम्हारा धर्म गिद्ध की तरह है जो उड़ता तो बहुत ऊंचाई पर है लेइउसकी निगाह पृथ्वी पर पडे सडे मांस पर रहती है।
घृतम् दुग्धम् ताम्बूलम् श्रेष्ठ अन्नम् तथैव च।
एतान्न शूद्रा बर्जिता कारणुस्तु विप्रम् दुखम् भवति।
पेरियार ललई सिंह यादव की शूद्रों पर धार्मिक डकैती
शूद्रों को घी दूध पान श्रेष्ठ अन्न अर्थात गेहू और चाबल मत खाने दो। इन सारी चीजो को शूद्रों को खाने से रोको। क्योकि इन चीजो के खाने से ब्राह्मणों को दुख होता है।
यह अजीब धर्म है हम गाय भैस पालते है हम उन्हें घास चारा खिलाते है पानी पिलाते है ब्राह्मण के पेट मे प्रसव पीडा क्यो हो रही है? यही ब्राह्मण दलितों पिछडो के घर मे आकर कथा भागवत के माध्यम से घर मे रखा घी के आहुति देकर मंत्र पढता है
ओम भूभुव:स्व:। तत्सवितुर् वरेण्यम् भर्गो देवस्म धीमहि धियो न प्रचोदयात्। इदन्नमम् इदम् सूर्याय् स्वाहा।
तैतीस करोड देबता। ब्राह्मण तब तक स्वाहा करता है जब तक पांच किलो लटुरिया का जजमान का घी स्वाहा नही हो जाता।
जय राबण नामक कबिता मे हमने लिखा है। राबण राम से कहता है
राम तुम्हारे रामराज्य मे कोई दलितों का अधिकार नही।
धन बैभव का अधिकार नही फिर पढने का अधिकार नही।
राम तुम्हारे रामराज्य में शूद्र सताये जाते हैं।
निर्दोष जंहा शम्भूको के फिर गले कटाये जाते हैं।
तालाबों का नीर राम यंहा श्वान सुअर पी सकते है।
पर दलित नही पी सकते है फिर कैसे वे जी सकते है।
अहम ब्रह्म बसुधैव कुटुम्ब का कितना सुंदर नारा है।
पर छुआछूत औ ऊंच-नीच का बिष रस पिटारा है।
भेद भाव की राजनीति से राम देश मिट सकता है।
सबको मिले समान सुअवसर तभी देश बढ सकता है।
राम तुम्हारा धर्म गिद्ध सा ऊंचे पर उड़ता है।
पर पृथ्वी के पडे मांस पर दृष्टि स्वयं की रखता है।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था ऐ हिंदुओं तुम्हारा धर्म गिद्ध की तरह है जो उड़ता तो बहुत ऊंचाई पर है लेकिन उसकी निगाह पृथ्वी पर पडे सडे मांस पर रहती है।


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